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Sudhir Srivastava

Tragedy Inspirational

3  

Sudhir Srivastava

Tragedy Inspirational

समय रुकता नहीं

समय रुकता नहीं

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   बचपन में पिता, तरुणावस्था में माँ को खोने के बाद

शीला ने खुद को संभालने का हर जतन किया। मगर शायद उसकी किस्मत भी उससे खिलवाड़ कर रही थी। 

   चाचा चाची ने उसे बड़े लाड़ प्यार से रखा था, मगर वह जैसे टूट सी चुकी थी।

   उसकी बुआ थोड़े दिन के लिए अपने साथ अपने घर लिवा ले गयीं कि शायद जगह माहौल बदलने से उसे संभालने में मदद मिल सके।

   बुआ की युवा बेटी रिया शादी के तीन माह बाद ही विधवा हो गई थी, और ससुराल वालों ने मनहूस कहकर उसे मायके भेज दिया था।

   रिया हर समय शीला के साथ ही रहती, उसे समझाती, पढ़ाई में ध्यान लगाने और कुछ करने को उत्साहित करती। क्योंकि वो स्वयं भी अपने पैरो पर खड़ा होने के लिए कटिबद्ध थी।

    वो शीला को बार बार समझाती कि समय रुकता नहीं है, ये भी समय चला जायेगा। दुख सुख जीवन का हिस्सा है, इससे कोई बचा नहीं है। इसीलिए हर समय रोना धोना छोड़कर अपने भविष्य को संवारने की दिशा में आगे बढ़ो। यदि तुम मामा मामी की आत्मा की शांति चाहती हो, तो कुछ ऐसा करो कि वे जहां भी हो, अपनी बेटी पर गर्व कर सकें।

     मुझे देखो। नियति को जो मंजूर था वो तो हो गया, लेकिन जीना है, तो सच स्वीकारना ही होगा। मैं विधवा होकर यदि हर समय विधवा विलाप ही करती रहूँ, तो क्या मेरा पति जीवित हो जायेगा। नहीं, लेकिन मेरे मम्मी पापा घुट घुटकर जरूर मर जायेंगे।

    समय के साथ चलना सीखना पड़ता है, खुद चलना पड़ता है, समय किसी का इंतजार नहीं करता। न समय कभी रुका है, न ही रुकेगा। पिछला समय भी तो आखिर चला ही गया न। तो ये समय भी चला जायेगा।

     अब ये तुम्हें सोचना है कि रो रोकर जीना है या समय के साथ आगे बढ़ना है।

    शीला की आंखों से आँसुओं की गंगा जमुना बह रही थी।

     उसने लिया को आश्वस्त किया कि अब वह समय के साथ ही आगे बढ़ेगी। और जल्दी से अपने आँसू पोंछ लिए। 


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