समझौता
समझौता
रचनाओं, फिल्मों और मीडिया में मर्दों को ऐसे पेश किया गया है जैसे कि वे नृशंस, क्रूर, अमानवीय, असंवेदनशील, पत्थर दिल , अत्याचारी , शोषक और न जाने क्या क्या होते हैं । लेकिन ऐसा भी नहीं है कि सारे मर्द शरीफ , सहयोगी और नर्म दिल ही हों । सिक्के के सदैव दो पहलू होते हैं । ये अलग बात है कि किसी के हिस्से में "चित" आता है और किसी के हिस्से में "पट" । आइए , आज एक ऐसे शख्स की वास्तविक जिंदगी की किताब पढ़ते हैं जिसने अपने प्यार के लिए क्या क्या न सहा ! उसने जीते जी "बेहयाई का विषपान" किया । अपनी वैवाहिक जिन्दगी बचाने के लिए उसने उत्सर्ग की इन्तेहा कर दी लेकिन इसके बावजूद वह जिंदगी की जंग हार गया । स्त्री को साहित्य में बहुत कोमल भावों वाली बताई जाती है लेकिन प्रियंका जैसी भी होगी यह अकल्पनीय सी बात लगती है । चलिए एक वास्तविक घटना के बारे में जानने का प्रयास करते हैं ।
शिवम् एक गरीब लड़का था । ऑटो चलाकर अपनी रोजी रोटी चलाता था । अभावों में भी वह जीना जानता था । जिंदगी आदमी को जीना सिखाती है । जिस तरह पानी अपना रास्ता खुद बना लेता है , उसी तरह एक इंसान भी अपनी मंजिल खुद तय कर लेता है । इंसान भी वही कहलाता है जो हर हाल में खुश रहना जानता हो । शिवम् सुबह ऑटो लेकर घर से निकलता और देर रात को ही घर लौटता था । दिन भर की थकान के कारण उसे जल्दी ही नींद आ जाती थी । वह थोड़ी देर अपनी बेटी के साथ खेलता, खाना खाता और सो जाता था । दिन रात मेहनत करके भी वह खुश रहता था ।
एक दिन शिवम् थोड़ा जल्दी घर आ गया । उस दिन उसकी बेटी का जन्म दिन था । दो साल की हो गई थी पिंकी । कितना खुश था वह उस दिन । उसके जन्मदिन पर वह एक बढ़िया सा केक लेकर आया था । एक चाबी से चलने वाली मोटर कार और ढेर सारे गुब्बारे भी लाया था । उसके चेहरे के भाव बता रहे थे कि वह कितना खुश था ।
"पिंकी ! देखो कौन आया है ? और क्या क्या लाया है" ? शिवम् बाहर से ही चिल्लाया ।
घर का दरवाजा बंद था इसलिए वह जोर जोर से कुंदी खड़काने लगा
"प्रियंका, अरे दरवाजा खोलो । देखो हम अपनी पिंकी के लिए क्या लाये हैं ? आज उसका जन्मदिन है ना । धूमधाम से मनाएंगे हमारी पिंकी का जन्म दिन" । शिवम् धड़ाधड़ दरवाजा पीट रहा था । लेकिन दरवाजा बेशर्म इंसानों की तरह निर्लज्जता के साथ पहले की ही तरह खड़ा रहा । घर के अंदर से भी कोई आवाज नहीं आई । तब शिवम् ने जोर से आवाज लगाई
"प्रियंका, डार्लिंग ! दरवाजा खोलो । कब तक दरवाजा पीटेंगे हम ? अब और ना सताओ , जल्दी से दरवाजा खोल दो" ।
अंदर से उसकी आवाज का कोई उत्तर नहीं आया । शिवम् को बड़ा आश्चर्य हुआ कि आखिर प्रियंका दरवाजा खोल क्यों नहीं रही है ? उसने अब दरवाजे को गौर से देखा तो उसकी आंखें चौंधिया गईं । दरवाजा बंद था और उस पर ताला लटक रहा था । शिवम् ने दरवाजे को देखकर अपनी मूर्खता पर अपना सिर पीट लिया।
"मूर्ख आदमी ! पहले देख तो लेता कि दरवाजे पर ताला लटका हुआ है" । उसे अपनी मूर्खता पर हंसी आ गई लेकिन अगले ही पल उसका दिमाग घूम गया "प्रियंका आखिर कहां चली गई है" ? उसने अपने घर के आसपास निगाहें दौड़ाईं मगर वहां कोई नहीं था । शिवम् सोच में पड़ गया । "प्रियंका ने उसे कुछ बताया भी नहीं था । आखिर कहां गई होगी वह ? शायद पिंकी के लिए कुछ खिलौने लेने गई होगी । और तो कहां जाएगी" ?
उसने अपनी जेब से चाबी निकाली और दरवाजा खोलकर अंदर आ गया । वह चाहता था कि प्रियंका जल्दी से आ जाये और सब मिलकर पिंकी का जन्मदिन मनायें । लेकिन प्रियंका और पिंकी का कोई अता पता नहीं था । वह अधीर हो उठा । उसने प्रियंका को फोन लगाया तो वह स्विच्ड ऑफ आ रहा था
"पता नहीं ये प्रियंका अपना फोन अधिकतर स्विच्ड ऑफ क्यों रखती है ? पूछता हूं तो कह देती है कि बैटरी ऑफ हो जाती है । इतना किससे बात करती है , पता नहीं । वह तो दिन भर बाहर रहता है लेकिन उसके फोन की बैटरी तो कभी ऑफ नहीं होती" । उसे प्रियंका पर हल्का गुस्सा आने लगा । वह अपनी बेटी से अब और अधिक दूरी बर्दाश्त करने की स्थिति में नहीं था । इंतजार करते करते रात के दस बज गए मगर ना तो प्रियंका आई और न उसका फोन लगा ।
उसे कुछ समझ नहीं आया कि आखिर प्रियंका पिंकी को लेकर कहां चली गई है । वह घर से बाहर निकला और उसने पड़ोस में रहने वाले श्याम बिहारी के घर का दरवाजा खटखटाया ।
"कौन है " ? अंदर से आवाज आई
"भैया हम हैं आपके पड़ोसी शिवम्" ।
शहरों में पड़ोसियों में कोई बहुत ज्यादा बात चीत नहीं होती है इसलिए पता भी नहीं चलता है कि पड़ोस में कौन रहता है ? श्याम बिहारी और उसकी पत्नी दोनों बाहर निकल कर आये और शिवम् को देखा तो पहचान गये ।
"क्या बात है" ?
"भाभी, वो प्रियंका और पिंकी घर पर नहीं हैं । आपने उन्हें कहीं आते जाते देखा है क्या" ? बड़ी आशा से शिवम् ने पूछा
"नहीं भैया, हमने तो नहीं देखा उन्हें । पर ..." वह कुछ कहते कहते रुक गई
"पर क्या भाभी" ? शिवम् ने चौंककर पूछा
राधा ने एक बार श्याम बिहारी की ओर देखा और कहा "बता दूं क्या" ?
अब शिवम् का माथा चकरा गया । "कैसी पहेली बुझा रही हैं भाभी आप ? खुलकर कहिए ना" ? अधीर शिवम् झुंझला कर बोला
"वो बात कुछ ऐसी है भैया कि तुम्हें अच्छी नहीं लगेगी , इसलिए कहते हुए थोड़ा संकोच हो रहा है"
"भाभी, आप तो निसंकोच कहें । हमें भी तो पता चले कि आखिर बात क्या है"
"पिछले कुछ दिनों से एक गबरू जवान आपके घर आ रहा था । वह घंटों घंटों घर में रहता था और शाम होते ही चला जाया करता था" ।
"कौन था वह जवान" ? हकलाते हुए शिवम् बोला ।
"उसका नाम पता तो नहीं जानते भैया लेकिन आपकी महरारू उससे बड़ी मीठी मीठी बातें करती थीं । हमें तो लगा कि वह आपका रिश्तेदार होगा इसलिए हमने कुछ नहीं कहा" ।
शिवम् के पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई । उसका कोई रिश्तेदार इस शहर में नहीं था । फिर वह गबरू जवान कौन था ? वह हमारे घर में क्यों आता था ? प्रियंका ने उसके बारे में उसे क्यों नहीं बताया था" ? ऐसे अनेक प्रश्न थे जो शिवम् के मस्तिष्क में कौंध रहे थे । मगर किसी प्रश्न का कोई जवाब उसके पास नहीं था ।
वह निराश सा अपने कमरे पर आ गया । उसे अब न तो भूख लग रही थी और न प्यास । जो उल्लास अभी थोड़ी देर पहले उसके चेहरे पर चमक रहा था वह पल भर में ही रफूचक्कर हो गया था । उसने फिर से प्रियंका को फोन लगाया । इस बार घंटी जा रही थी । उसके दिल में सैकड़ों सितार एक साथ बज उठे । लेकिन प्रियंका ने फोन नहीं उठाया । शिवम् को थोड़ी निराशा अवश्य हुई लेकिन उसने हिम्मत नहीं हारी । पुनः फोन लगा दिया । इस बार प्रियंका ने फोन उठा लिया
"कहां हो तुम ? हम कबसे फोन मिला रहे हैं ? फोन स्विच्ड ऑफ आ रहा था तुम्हारा और हमारी जान हलक में अटक रही थी । हम पिंकी के जन्मदिन के लिए एक बढ़िया सा केक लेकर आये हैं और चाबी से चलने वाली कार भी लाये हैं । आपके लिए भी एक साड़ी लेकर आये हैं । अब और इंतज़ार ना कराओ , पिंकी को लेकर जल्दी आ जाओ । हम इंतजार कर रहे हैं" । शिवम् एक ही सांस में सारी बात कह गया ।
"नहीं, हम नहीं आ सकते । हमने तुम्हारा घर छोड़ दिया है । अब हमारा तुम्हारा कोई वास्ता नहीं है । हमारा इंतजार ना करो । केक खुद ही काट लो और खाकर सो जाओ" । प्रियंका ने रूखे स्वर में कहा ।
"ऐसा क्या हो गया है जो तुम हमें अकेला छोड़कर चली गई हो । हमने तो कुछ कहा नहीं है कभी । तुमने भी कोई शिकायत नहीं की आज तक । फिर बात क्या है" ?
"कुछ भी नहीं है । बस, हमें तुम्हारे साथ नहीं रहना । बात खत्म" । प्रियंका ने फोन काट दिया
शिवम् ने फिर फोन लगाया "अरे ऐसे कैसे बात खत्म ? तुम मेरी ब्याहता पत्नी हो कोई उठाकर नहीं लाया हूं मैं तुम्हें जो ऐसे खत्म हो जायेगा हमारा रिश्ता ? तुम अभी हो कहां ? मैं तुम्हें लेने आ रहा हूं"
"हम जहां भी हैं, ठीक हैं । और हमें लेने आने की जरूरत नहीं है। हम तुम्हारे साथ नहीं रहेंगे अब । अब हम जीवन जी के साथ रहेंगे" ।
"तुम अभी हो कहां" ?
"हम अभी जीवन जी के साथ हैं और इन्हीं के साथ रहेंगे" ।
"पर हमने किया क्या है जो तुम हमें छोड़ रही हो"
"तुमने कुछ नहीं किया पर हमारा मन अब जीवन जी से मिल गया है इसलिए उनके साथ आ गये"
"देखो प्रियंका, एक बार तसल्ली से हमारी बात सुन लो । फिर जो तुम्हें सही लगे कर लेना । हमें पिंकी से भी तो मिलना है । तो बताओ, तुम हो कहां" ?
"हम अभी अलीगढ़ में "राज लॉज" में हैं"
"ठीक है । मैं कल आ रहा हूं । फ़ुरसत से बात करेंगे" ।
प्रियंका ने फोन काट दिया । शिवम् के तोते उड़े हुए थे । "ये क्या हुआ ? उसने कोई कोर कसर नहीं रखी छोड़ी थी प्रियंका को खुश रखने में । लेकिन प्रियंका ने ये क्या किया ? उसकी शराफत का ये सिला दिया ! न जाने कबसे वह जीवन रूपी जोंक से चिपकी हुई है और उसे भनक तक नहीं लगने दी ! कहीं पिंकी भी उसी की तो नहीं है ? नहीं नहीं ! ये क्या सोच रहा हूं मैं ? चाहे कुछ भी हो , चाहे वास्तव में पिंकी जीवन की हो , लेकिन अब वह मेरी बेटी है और मैं उसके लिए तथा अपने प्यार और अपने गृहस्थ जीवन को बचाने के लिए कुछ भी करूंगा" ।
शिवम् अतीत के पन्नों में खो गया । उसकी शादी बड़ी धूमधाम से सरोज के संग हुई थी । उसे तब पता नहीं था कि उसकी शादी सरोज के घरवालों ने उसकी मर्जी के खिलाफ उसके साथ की थी । उसका कहीं प्रेम प्रसंग चल रहा बताया । ये बात शिवम् को तब पता चली जब शादी के छः महीने बाद सरोज एक दिन अपने प्रेमी के साथ भाग गई थी । लोगों ने उसे क्या क्या नहीं कहा था ? "छक्का" शब्द सुनकर उसकी आत्मा रो पड़ी थी । पर लोग तो दूसरों को रुलाने में आनंद अनुभव करते हैं । सरोज का दिया घाव वह आज तक नहीं भूला है ।
जब प्रियंका की शादी का प्रस्ताव आया था तब उसने छानबीन भी की थी लेकिन तब तो प्रियंका का कोई प्रेम प्रसंग नहीं था । सुहागरात को भी उसकी निर्दोषता सिद्ध हो गई थी । उसने प्रियंका की खुशी के लिए क्या क्या नहीं किया । कपड़े लत्ते, गहने सब उसकी पसंद के दिलवाये । अच्छा से अच्छा खान पान रखा । इसके लिए उसने दिन रात मेहनत भी की थी । मगर उसने क्या इनाम दिया उसकी वफ़ा का ? पता नहीं उसने जीवन में ऐसा क्या देखा जो लोक लाज छोड़कर उसके साथ चली गई । अब वह गांव में क्या मुंह दिखायेगा ? गांव वाले पहले ही उसे छक्का कहते थे , अब तो न जाने क्या क्या कहेंगे ? नहीं नहीं , मुझे हर हाल में प्रियंका को लाना ही होगा" । सोचते सोचते कब उसकी आंख लग गई, पता ही नहीं चला शिवम् को ।
अगले दिन एक कार किराए की लेकर वह अलीगढ़ चल दिया । दोपहर तक वह राज लॉज में पहुंच गया । प्रियंका जीवन के साथ वहीं ठहरी हुई थी । पिंकी सो रही थी । उसने पहली बार जीवन को देखा । न चेहरा न मोहरा । एक मजदूर सा लग रहा था जीवन । प्रियंका बहुत सुंदर थी । "हे भगवान ! हूर को लंगूर ही पसंद आते हैं क्या" ? उसने मन ही मन सोचा । शिवम् ने जीवन को बाहर जाने के लिए कहा जिससे वह प्रियंका से अकेले में बात कर सकें । लेकिन प्रियंका ने साफ कह दिया "ये यहीं रहेंगे । जो भी कहना हो इनके सामने ही कहो" ।
शिवम् के पास अब कोई विकल्प नहीं था । उसने प्रियंका के पैर पकड़ लिए और बोला "ये पैर मैं तब तक नहीं छोडूंगा जब तक तुम मेरे साथ चलने के लिए हां न कह दो" ।
प्रियंका ने बहुत कोशिश की कि वह अपने पैर छुड़ा ले लेकिन शिवम् की पकड़ इतनी भयंकर थी कि प्रियंका और जीवन दोनों मिलकर भी उसे छुड़ा न सके । अंत में प्रियंका उसके साथ चलने के लिए तैयार हो गई तब शिवम् ने उसके पैर छोड़ दिये । लेकिन प्रियंका ने शिवम् के सामने एक शर्त रख दी "ये भी मेरे साथ चलेंगे । हमारे साथ ही रहेंगे और हमारे साथ ही सोयेंगे । अगर मंजूर हो तो वह साथ जायेगी नहीं तो वह यहीं रहेगी"
शिवम् उसकी शर्त सुनकर दंग रह गया । ये कैसी पत्नी है जो इतनी निर्लज्जता के साथ अपने प्रेमी को अपने साथ सुलाने की बात अपने ही पति से कर रही है । घोर कलयुग इसे ही कहते हैं शायद ! शिवम् की सांस उसके गले में ही अटक गई । क्या करें ? समझौता या ताने ! बेहयाई या इज्जत ! अपनी बेटी और बीवी के लिए यदि इतना अपमान झेलना पड़े तो भी मंजूर था शिवम् को । उसने स्वीकृति दे दी । चलने की तैयारी हो गई । पिंकी भी जग गई थी । पापा को देखकर वह उसकी गोदी में छुप गई । इससे शिवम् को बड़ा सूकून मिला । लॉज का किराया भी शिवम् से ही दिलवाया प्रियंका ने । शाम होते होते वे लोग अपने घर आ गए ।
प्रियंका ने तीनों के लिए खाना बनाया और पहले जीवन को खिलाया । बाद में शिवम् को । शिवम् खून के घूंट पीकर रह गया । पिंकी को सुला दिया गया । क़मरा एक ही था तो कैसे सोना है ये सोच विचार कर रहा था शिवम् । इतने में प्रियंका की कठोर आवाज सुनाई दी
"सुनो जी , आप थोड़ी देर के लिए बाहर घूम आओ । जब तक हम लोग अपना "काम" निबटा लेते हैं । जब मैं दरवाजा खोल दूं तो अंदर आ जाना" ।
इतनी घोर बेइज्जती की कल्पना नहीं की थी शिवम् ने । लेकिन तकदीर न जाने क्या क्या खेल खेल रही थी उसके साथ ! शिवम् परिस्थितियों को देखकर चुपचाप बाहर निकल आया और प्रियंका ने दरवाजा बंद कर लिया । थोड़ी देर में कमरे से अजीब सी आवाजें आने लगीं तो शिवम् से वे आवाजें सहन नहीं हुई और वह वहां से चल दिया ।
करीब आधे घंटे बाद जब वह वापस आया तो दरवाजा खुला हुआ था । प्रियंका और जीवन एक चारपाई पर लेटे थे और उसका बिस्तर नीचे लगा हुआ था । शिवम् चुपचाप उस बिस्तर पर जाकर लेट गया ।
अब तो रोज का ही यह सिलसिला हो गया था । प्रियंका दरवाजा खोल देती तो शिवम् बाहर चला जाता फिर लगभग आधा पौन घंटा बाद वह वापस आता था । लेकिन समय धीरे धीरे बदल रहा था । अब प्रियंका और जीवन शिवम् के सामने ही शुरू हो जाते थे । शिवम् को एक दिन गुस्सा आ गया और उसने प्रियंका के गाल पर एक थप्पड़ जड़ दिया । प्रियंका और जीवन दोनों टूट पड़े शिवम् पर ।
अगले दिन शिवम् की लाश शहर के बाहर एक खंडहर में पाई गई थी । प्रियंका और जीवन अभी जेल में बंद हैं । केस चल रहा है । पिंकी अपने दादा दादी के पास रह रही है । बेचारा शिवम् । अपने प्यार, इज्जत और गृहस्थी को बचाने के लिए उसने इतना बड़ा समझौता किया था , लेकिन वह समझौता भी कुछ बचा नहीं पाया था उसका । ना गृहस्थी , ना इज्जत और ना जीवन । जब स्त्री के पग डगमगाते हैं तब उसे गिरने से कोई रोक नहीं सकता है । पेट और पेट के नीचे की आग इंसान को कहीं का नहीं छोड़ती है । यह बात इस घटना से एक बार पुनः स्थापित हो गई ।

