सारा जहाँ तुम्हारा

सारा जहाँ तुम्हारा

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आज डुमरी गांव में ईश्वरचंद जी के घर के सामने लोगों का मेला लगा हुआ है।

लोग घर के बाहर मातम मना रहे हैं। ईश्वरचंद जी का बेटा हेमंत कुमार "नक्सली मुठभेड़" में " शहीद "हो गया है।

देवर जी तो चल बसे, अब "बाबा" की जाने की बारी है !

कहकर भानूमती (बड़ी बहू) मुँह बिचका के वहां से चली गई।

अचानक गाड़ी की आवाज सुनाई देने लगी ! मंत्री जी पीड़ित परिवार को सांत्वना देने पधार रहे थे।

गाड़ियों का काफिला धूल उड़ाती हुई चली आ रही थी। मंत्री जी के स्वागत की तैयारी पूरी कर ली गई थी।

गद्दी वाली कुर्सी, कुलर, कोका-कोला, प्रेस रिपोर्टर सभी उस छोटे से मकान में भरे हुए थे।

सरकार की तरफ से बीस हजार का एक चेक भी सुनयना (शहीद की विधवा) को प्रदान किया गया।

सभी ताम -झाम के बाद कार्यकर्ता मंत्री सह पार्टी का नारा लगाते हुए चले गए। इन सब के बीच सुनयना घर के एक कोने में गुमसुम, चुपचाप सर झुकाये बैठी थी। अंदर के कमरे में ईश्वर चंद्र बिस्तर पर पड़े हुए छत को निहार रहे थे। जवान बेटे की मौत ने उनकी कमर ही तोड़ दी थी।

तीन बेटों का बाप ईश्वर चंद्र नादिया जिले का निवासी था। खेती बाड़ी से अपने परिवार का पालन पोषण किया। छोटे बेटे को पुलिस की नौकरी लग गई और वह दरोगा बन गया। जब से बेटे की पोस्टिंग सारडा के जंगलों के पास नक्सली क्षेत्र में हुई थी तब से ईश्वरचंद को एक अनजान सा भय सताता था।

होनी को कौन टाल सकता है ? ईश्वर चंद्र की आखों से आंसू टपक पड़े। घर से भीड़ के छटते ही भानुमती सुनयना को फिर से ताने मारने लगी।

"आमी तो आगेइ बोलेछिलुम आमादेर बाड़ीर छोटो बोऊ अपया"

(मैंने तो पहले ही कहा था, हमारे घर की छोटी बहू अशुभ है ।)

मझली ने सुर मिलाते हुए कहा "अब तो यह यहाँ बैठे- बैठे हमारी छाती में मूँग दलेगी"।

सुनयना चुपचाप ईश्वर चंद्र को दवा देने चली गई। उसकी आँखों के आंसू सूख गए थे। उसके जीने का मकसद ही खत्म हो चुका था। अब उसे इन तानों के साथ ही जीना था। वह तो अपने मायके लौट भी नहीं सकती थी। गरीब पिता ने उसकी विदाई कर अपने बोझ से मुक्ति पायी थी, वह फिर से अपने पिता पर बोझ बनना नहीं चाहती थी।

छह महीने गुजर गए । ईश्वर चंद्र और कमजोर हो गये थे। घर की स्थिति से वह अनभिज्ञ न थे। वह समझ गये थे कि वह अब ज्यादा दिनों के मेहमान नहीं है। सुनयना की चिंता उन्हें खाये जा रही थी।

एक सुबह सुनयना के मना करने के बावजूद वह अपनी लाठी का सहारा लेकर बाहर चले गए।

शाम को लौट कर सब बेटों और बहुओं को अपने पास बुलाया। बोले-- "मैंने वकील से कहकर अपनी वसीयत बना ली है।"

सब खेती बाड़ी सुनयना के नाम कर दिया है, अगर शांतिपूर्ण तरीके से रहना चाहते हो तो इस घर में रह सकते हो ! वरना आगे तुम्हारी मर्जी !

उन्होंने सुनयना को अपने पास बुलाया और हाथ फैलाने को कहा, फिर अपने थैले से चार छोटे-छोटे नारियल के पौधे निकाल कर सुनयना के हाथों में रखते हुए कहा "बेटी इन पौधों को खेत में रोप देना। अब ये तुम्हारे बच्चे हैं।" अब ये खेती बाड़ी सब तुम्हारी है, इन्हें ठीक से संभालो और घबराना नहीं,

देखना सारा जहाँ तुम्हारा अपना हो जाएगा !"

कहकर ईश्वर चंद्र बिस्तर पर लेट कर गहरी सांसें लेने लगे- -------'

बाबा ऽऽऽऽऽ कहते हुए सब उनकी ओर दौड़ पड़े।


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