रिश्तों का नमकीन अहसास
रिश्तों का नमकीन अहसास
रीमा ये क्या है मेरा हाथ छोड़ो, कहते हुये सीता ने अपना हाथ छुड़ाया और छुड़ाते ही रीमा धक्का खाकर नीचे गिर पड़ी। अरे- अरे! रीमा उठो मैंने ये जान बुझकर नहीं किया।अब रहने भी दो भाभी! रीमा की चीखें सुनकर घर के बाकी लोग भी आ गये।
बड़े भाई ने आते ही कहा, ओहहहहो! अब तुम तीनों की कहा-सुनी हाथापाई पर उतर आई है।ये क्या हो रहा है? देवर ने भाभी को कहा भाभी आपने रीमा पर हाथ उठाया। भाभी बोली नहीं देवर जी, पर तभी रीमा बोली सुनो ना !मैं तो भाभी को मनाने की कोशिश कर रही थी पर भाभी है कि बात बढ़ाने पर तुली है, तभी सबने छोटी बहु सरिता की तरफ देखा तो उसने कहा की मुझे कुछ नहीं कहना कहकर वो वहां से चली गयी।
बातें बहुत बढ़ गयी थी, दोनों भाई भी अपनी-अपनी पत्नी की तरफदारी किये जा रहे थे,तभी छोटा भाई(हरीश) आकर बोला सबको बाऊजी बुला रहे है।बाऊजी ! इस समय वो तो सो गये होंगे।कैसे सोते ? आप लोग सोने दो तब ना सोयेंगे, रोज रात को आप सबके झगड़े,उफ्फ़! कहता हुआ हरीश चला गया।
सब डरते हुये बाऊजी के कमरे में आये,वैसे बाऊजी कुछ कहते नहीं थे। पर, सभी उनका बहुत ही सम्मान करते थे। बाऊजी ने बहुओं को पास बुलाया और कहा तुम तीनों गृहणियां हो तुम्हें नमक की कीमत पता है। पता है ना ,नमक का उपयोग बहुत ही सावधानी से करना चाहिए ज्यादा होकर भी स्वाद बिगाड़ देता है और कम होकर भी और नहीं होने से तो पूरा जायका ही खराब कर देता है।
बहुओं सुनो ये जो रिश्ते हैं ना इनकी डोर बहुत ही नाजुक होती है।फिर, चाहे वो कोई भी रिश्ता हो,इनमें अपनापन और लगाव बस इस नमक की तरह ही होता है,हद से ज्यादा लगाव भी अच्छा नहीं तो कम भी अच्छा नहीं बस अपने स्वाद और सुविधानुसार रिश्तों में नमक मिलाओ और जिंदगी भर रिश्तों का साथ पाओ।
