गुमशुदा
गुमशुदा
हर रोज की ही तरह आज भी वो बुजुर्ग दंपत्ति मेरे बगल वाली दुकान पर आये और अखबार को ऊलट-पुलट कर देखने लगे। ऐसा वो अक्सर ही किया करते हैं, कभी-कभार अखबार खरीद भी लिया करते थे।
ये वही बुजुर्ग दंपति है जो अभी कुछ दिन पहले यहाँ आकर रहने लगे हैं, बुजुर्ग काका यहीं पास के मंदिर में पूजा करके अपना और पत्नी का पेट पालते हैं। मैंने इनके साथ और किसी को कभी नहीं देखा।
आज मुझसे रहा नहीं गया और मैंने उन बुजुर्ग दंपति से पूछ ही लिया कि काका आप रोज अखबार लेते हैं और उम्मीद भरी निगाहों से इसे उलट -पुलट कर देखते हैं फिर बड़ी ही हताशा से इसे वापस रख देते हैं। आप इसमें आखिर ऐसा क्या देखते हैं या ढूंढते हैं।
थोड़ी देर वो बुजुर्ग दंपति चुपचाप खड़े रहे फिर काका ने कहा बेटा मैं अखबार में गुमशुदा वाला स्तंभ देखता हूँ। मैंने बड़े ही आश्चर्य से उनको देखा तो उन्होंने कहा कि मैं बड़ी उम्मीद से रोज अखबार देखता हूँ कि आज तो हमारे बेटों ने हमारी गुमशुदगी का इश्तहार अखबार में दिया होगा।
पर, हमारी गलतफहमी है शायद उन्हें हमारी अब कोई जरूरत ही नहीं है क्योंकि ढूंढा उनको जाता है जिनकी जरूरत हो कहकर वो बुजुर्ग दंपति वहाँ से चले गये।
