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Akanksha Gupta

Drama Horror Thriller


3.4  

Akanksha Gupta

Drama Horror Thriller


रहस्यमयी दुल्हन-2

रहस्यमयी दुल्हन-2

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पिछले भाग में अब तक आपने पढ़ा- चंद्रिका अपने ससुराल में अपने पति शेखर के साथ गृहप्रवेश करती हैं जहां उसकी सास दर्शना उसका स्वागत करती हैं। उसके घर में आते ही कुछ आश्चर्यजनक घटनाएं शुरू हो जाती हैं। ससुराल की कुलपरंपरा के अनुसार चंद्रिका अपने कमरे में अकेले ही रह रही होती हैं कि उसे अपने कमरें में एक और घूंघट वाली दुल्हन दिखाई देती हैं जो उसके आवाज़ देते ही वहाँ से भाग जाती हैं। उसका पीछा करते हुए चंद्रिका को पता चलता है कि वह एक बहुमंजिला हवेली में है जहां की हर एक मंजिल हूबहू एक जैसी ही बनाई गई थी। वह यह देखकर चौक जाती हैं। उसे हवेली कुछ जानी पहचानी लग रही थीं। अब आगे-

“ मैं यहां कैसे आई ? मैंने तो सीढ़ियां चढ़ी ही नहीं और जब मैं इस घर के बाहर खड़ी थी तो यह कोई हवेली नही बल्कि एक छोटा सा मकान था लेकिन अब यहाँ पर एक हवेली हैं। यह सब क्या हो रहा है, मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा है। मुझे यह जगह इतनी देखी हुई सी क्यों लग रही हैं ?” चंद्रिका ने खुद से ही पूछा।

चंद्रिका यह सब सोच ही रही थी कि उसे याद आया कि वह अपने ही जैसी किसी दुल्हन का पीछा कर रही थीं। इतना याद आते ही उसने इधर उधर देखा लेकिन उसे वहां पर कोई दिखाई नहीं दिया। शायद जब चंद्रिका हवेली को देखकर सोच में पड़ गई थी तभी अवसर पाकर वो वहाँ से भाग निकली थी।

चंद्रिका उसे ढूंढने के लिए अपने कदम आगे बढ़ाने ही वाली थी कि तभी उसके पीछे से कोई उसके कंधे पर हाथ रख देता है। वह घबरा कर पीछे की ओर देखती हैं तो वहाँ उसकी सास दर्शना देवी खड़ी मुस्करा रही थी। उन्हें देखते ही चंद्रिका सकपका जाती हैं और सिर पर पल्लू करने के लिए अपनी चुनरी पकड़ने के लिए हाथ पीछे करती हैं। तभी उसे याद आता है कि उस दुल्हन का पीछा करने के चक्कर में वो ऐसे ही बाहर निकल आई थी। इतना ध्यान आते ही उसकी नजर झुक जाती हैं।

“यहाँ क्या कर रही हो बहु रानी?” दर्शना देवी तिरछी नजरो से देखते हुए पूछती है।

“माँजी मैने अपने कमरे में किसी और दुल्हन को देखा था। मैने जैसे ही उससे बात करने की कोशिश की वो भागते हुए यहाँ आई थीं।” इतना कहते हुए जब चंद्रिका दर्शना देवी को पीछे मुड़कर वह जगह दिखाने की कोशिश करती हैं तो उसके आश्चर्य की कोई सीमा नही थी। उसने देखा कि वह किसी हवेली में नहीं बल्कि उसी छोटे से मकान में खड़ी थी जिसमें वह कुछ देर पहले ही आई थी। वह मकान के पिछले हिस्से में खड़ी थी। जो कुछ भी उसने अभी देखा था वहाँ वैसा कुछ भी नही था।

“क्या हुआ बहुरानी? आप इतनी रात गए यहाँ पर क्या कर रही हैं?” जैसे दर्शना देवी ने कुछ सुना ही नहीं था।

कुछ नही माँजी बस थोड़ी गर्मी लग रही थी इसलिए यहां चली आई थी। माफ़ कीजिए माँजी, आगे से ऐसी गलती नहीं होगी।” चंद्रिका ने सिर झुका कर कहा। उसे समझ नही आ रहा था कि वो आगे और क्या कहे। 

“ठीक है। यह तुम्हारी पहली गलती है इसलिए तुम्हें माफ कर देती हूँ लेकिन याद रहे, आइंदा ऐसी गलती दोबारा नहीं होनी चाहिए। आगे से तुम्हें जिस भी चीज की जरूरत होगी, तुम इनसे कहोगी।” दर्शना देवी के इतना कहते ही एक बूढ़ी औरत लाठी का सहारा लेकर चलती हुई आगे आती हैं। उस बूढ़ी औरत ने काले रंग का लिबास पहन रखा था। उसके हाथों की खाल सिकुड़ कर उसकी हड्डियों से चिपक गई थी जिससे उनके बूढ़े होने का अंदाजा लगाया जा सकता था क्योंकि उन्होंने अपने चेहरे पर एक लंबा घूंघट डाल रखा था। उनके हाथों की दसो उंगलियों में बड़े बड़े पत्थर अंगूठी के रूप में सजे हुए थे।

”इनका नाम त्रिपाला है। इन्होंने वर्षों तक हमारे परिवार की सेवा की है और अभी भी कर रही हैं। आज से ये आपके साथ ही रहेंगी। चलिए अब अपने कमरे में चल कर आराम कीजिए। कल सुबह बाकी की रस्में भी करनी है। जल्दी उठिएगा।” इतना कहते हुए दर्शना देवी वापस कमरे की ओर मुड़ती है और चली जाती हैं। चंद्रिका और त्रिपाला भी उनके पीछे चल पड़ते है तभी वो घूंघट वाली दुल्हन उन्हें जाते हुए देख रही होती हैं।


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