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Sunil Sangwan

Tragedy

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Sunil Sangwan

Tragedy

पथराई आंखें

पथराई आंखें

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मेरे गांव से जब शहर जाना होता है तो मैं पास के गांव तक जो लगभग २ किलोमीटर के करीब पड़ता है पैदल ही जाता हूं क्यूंकि वो प्रमुख राजमार्ग पर पड़ता है जहां से शहर के लिए आसानी से वाहन मिल जाते हैं जबकि मेरा गांव राजमार्ग से हट कर होने की वजह से वाहनों की आवाजाही कम है तो वहां से काफी देर लगती है शहर पहुंचने में।

रास्ते में दोनों तरफ खेत ही खेत ही हैं जब तक मैं प्रमुख राजमार्ग तक पहुंचता हूं कई लोगों से बात हो जाती है जो वहीं गांव से ही हैं, बड़ा अच्छा लगता है अच्छे लोग अच्छा वातावरण और इस वक़्त तो ओर भी खूबसूरत सरसों के फूल ओर गेंहु की लहलाती फसल मानो जन्नत यही है। आज बोझिल क़दमों से शहर जाने के लिए उसी सड़क के किनारे किनारे प्रमुख राजमार्ग की तरफ जा रहा था कि अचानक मेरे सामने ही एक तेज रफ्तार गाड़ी ने एक आवारा जानवर को टक्कर मार दी, जानवर कुछ दूर जा गिरा सड़क पर खून के कतरे चारों तरफ यूं बिखर गए मानों किसी काले पन्ने पर चित्रकार ने लाल रंग छिड़क दिया हो।

चूंकि जानवर आवारा था तो किसी ने जल्दबाजी नहीं दिखाई, फिर जैसा की अक्सर होता है एक हुजूम जुड़ गया वहां पर और जानवर से सहानुभूति दिखाते हुए एक दो ने तो ये भी कह दिया कि गलती गाड़ी वाले की है गाड़ी वाला जो पहले से गाड़ी से उतर कर एक तरफ़ खड़ा था जो अपनी गाड़ी का मुआयना कर चुका था कहीं गाड़ी को तो कोई नुकसान नहीं हुआ है उसे जानवर की हालत का तो रत्ती भर भी ख्याल ना था उसने उच्चकर कहा नहीं मेरी कोई गलती नहीं है।

इसी बीच मेरी नजर उस जानवर पड़ी जो टक्कर से लगभग अधमरा हो गया था अब बहोत तेज सांसें ले रहा था जैसी किसी दिए की लौ हो बुझने से पहले। धीरे धीरे उसकी सांसे कमजोर होने लगी आंखे पथराने लगी,उन्हीं आंखों को देखकर गाड़ी वाला सहमा सा खड़ा था मानो जानवर उठेगा ओर उसका गिरेबान पकड़कर उससे पूछेगा कि बता किसकी थी गलती।

धीरे धीरे सांसों की रफ्तार कम हो गई उसकी पीड़ा को समझने वाला कोई नहीं था ओर उसने अपनी उन्हीं पथराई खुली आंखों के साथ इस भावना विहीन संसार से विदा ले ली।

पहले गाड़ी वाला चला गया उसके बाद एक एक करके सब लोग, मैं वहीं खड़ा रहा उसकी पथराई आंखें मुझे दर्पण लग रही थी जो उसकी पीड़ा का एहसास करा रही रही थी अभी कुछ दिन पहले मेरे साथ भी तो ऐसा ही हुआ जब मुझे उसका आखिरी संदेश मिला था भूल जाओ मुझे, मुझे तुमसे ना प्रेम था ना है। उसी एक लम्हें में इतने आसूं बह गए जितने आज तक नहीं बहे, वो पीड़ा मानो किसी ने जलते तवे पर दिल को सेंक दिया हो वो भी बार बार पलट कर, वो जो जन्नत देखने का दावा करते हैं मैंने भी उसी पल नरक देखने का दावा कर दिया।

वो पीड़ा वो क्रंदन वो शरीर का साथ देने से मना कर देना। शायद पहली बार जिंदा मौत का आभास हुआ था। मैं तब तक वहां खड़ा रहा जब तक कुछ लोगों ने आकर उसके मर्त शरीर को वहां से हटा नहीं दिया। वहां से चल पड़ा ये कहते हुए मेरे दोस्त मुझमें ओर तुझमें कोई खास फर्क नहीं है फर्क है तो इतना कि मेरी लाश हटाना बाकी है।


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