jagadeesh chandra shrivastava

Tragedy


4.1  

jagadeesh chandra shrivastava

Tragedy


प्रताड़ना

प्रताड़ना

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फूलों से सजे हुए गमले,फूलों की मनहर सुगन्ध और बालकनी में बेंत की झुलेवाली कुर्सी पर झक सफेद कुर्ता पायजामा बैठा सुशांत आज की ताजा खबरों का अदरक वाली गर्म चाय की चुस्कियों के साथ आनंद ले रहा था।खबरों के अनुसार उसकी चुस्कियां होतीं,रोमांचक खबरों पर चुस्की तेज हो जाती तो द्रवित करने वाली खबरों पर बेहद हल्की अनमनी सी।तभी एक खबर पढ़कर उसने चाय का प्याला बगल टेबल पर सरका दिया और कुछ सोचने लगा;वो अपनी सोच से निकलकर दूसरी खबर पढ़ने ही वाला था कि नारंगी साड़ी में खूबसूरत आँखों और घुंघराले लटों वाली,अपने गीले बालों में तौलिया लपेटे और हाथों में अगरबत्ती लिए उसकी पत्नी सृष्टि आ गई;बालकनी में थोड़ी सी जगह में रखे एक छोटे से केले के पौधे की तरफ सिर झुका वो शायद पूजा कर रही थी;और वो हर बृहस्पतिवार को ईश्वर की आराधना करती और व्रत रखती;पर आज उसका ध्यान पूजा करते हुए जब अपने पति पर गई तो आँखों से प्रश्नवाचक हो उसे ही देखने लगी।पूजा करने के बाद उसने किशमिश का प्रसाद सुशांत के हाथों में रख दिया और फिर बगल ही कुर्सी पर बैठते हुए पूछा

"क्या हुआ जी? ऐसी कौन सी खबर आपने पढ़ ली आज?"

"अरे ! देखती हो कितने कायर और जाहिल इंसान हैं इस दुनिया में!पत्नी ने सब्जी अच्छी नही बनाई तो पति ने झगड़ा कर लिया और बर्तन से मारकर पत्नी का सर फोड़ दिया"

"ये गंवार !ये जाहिल ऐसा ही करते हैं !स्त्रियों के लिए कोई सम्मान कोई इज्जत है ही नहीं और वो औरतें जो इनको रात दिन चुपचाप सहती हैं उनका भी इसमे बराबर दोष है !नेताजी सुभाषचंद्र बोष ने कहा था-अन्याय सहना अन्याय करने से भी बड़ा पाप है! पर ऐसे जाहिलों को कौन समझाए?"

"इनको ये भी नही पता-यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमन्ते तत्र देवता"

बताओ कितनी पीड़ा और प्रताड़ना देते हैं ये पुरुष!शारीरिक और मानसिक दोनों तरीके से बेचारी औरतों को तोड़ कर रख देते हैं।

सृष्टि भी पति के इन विचारों से सहमत थी और साथ ही उसे इस बात पर स्वयं को गर्वित और सौभाग्यशाली महसूस कर रही थी कि उसे इतनी अच्छी सोच का पति मिला है; जो रहन-सहन से ही नही बल्कि आचरण से भी कुलीन है।वो और कुछ अच्छा सोच पाती तभी सुशांत ने उससे कहा

"सुनो! मैं नहाने जा रहा हूँ तुम ब्रेक फास्ट रेडी कर दो आज थोड़ा जल्दी निकलूंगा।"

और पत्नी के माथे को चूमते पुचकारते वाशरूम की तरफ चल पड़ा।

सृष्टि भी पेपर की हेड लाइन को देख रही थी कि पास ही पड़े सुशांत के फोन की स्क्रीन पर मैसेज का कोई नोटिफिकेशन आया।वह इसे रूटीन मॉर्निंग मेसेज समझ कर किचन में जाती उससे पहले ही 5-7 मैसेज घनघनाने लगे;वैसे तो सृष्टि कभी सुशांत का मोबाइल नही देखती न उसके किसी काम मे दखल देती पर आज वह इन मेसेज के बहाने से ही सुशांत के मोबाइल को देखने लगी,एक बारगी मेसेज देखे और स्क्रीन स्लाइड करने लगी और फोन में कई एक सोशल साइट देख वो थोड़ा असहज हो गयी और विचारमग्न भी "कि सुशांत कब से इतना सोशल हो गया?मुझसे तो कम ही बात करते हैं अक्सर काम की वजह से थके ही होते हैं फिर इनको इन सबकी क्या जरूरत?"

जिज्ञासावश वह व्हाट्सएप टटोलने लगी जिसमे कई फालतू चैट थीं जो उसके जैसी स्वाभिमानी और धर्मपरायण स्त्री के लिए जरा भी सहनीय न थीं।वह जल्दी जल्दी सुशांत के मोबाइल को खंगाल लेना चाहती थी तभी सुशांत तैयार होकर आ गया।

"अरे!तुम अभी यहीं हो?मेरा ब्रेकफास्ट नही बनाया?एंड हेलो हाऊ डेयर यू टू टच माय मोबाइल?"

"गिव इट टू मी"

"नहीं"

सुशांत गुस्से से तमतमा उठा और दांत पीसकर बोला-

"गिव इट टू मी.... अदरवाइज...."

"नहीं दूंगी और तुम्हारी माँ को भी सब बताऊंगी"

"सृष्टि"

चीख़ते हुए सुशांत ने अपनी मोबाइल सृष्टि के हाथों से छीना ली और उसको लगभग धकेल दिया।सृष्टि टेबल से जा टकराई और सिसक सिसक कर रोने लगी।सुशांत चीख चीख कर उसे उसके परिवार को उसके संस्कार को मनभर कोसने और गाली देने के बाद आफिस के लिए जा चुका था;पेपर अब भी अपनी काली मोटी हेडलाइन के साथ टेबल पर पड़ा था जिसपर सुशांत की शेष चाय धब्बा बनकर लगी थी;सृष्टि टेबल के सहारे निढाल सी होकर

"दागदार

"हेडलाइन को ही एकटक देखे जा रही थी और उसके कानों में सुशांत की बाते गूंज रही थी

"कितने कायर और जाहिल होते हैं ये लोग जो जरा सी बात पर झगड़ा कर लेते हैं।नेताजी सुभाषचन्द्र बोस ने कहा है अन्याय सहना अन्याय करने से भी बड़ा पाप है!..यत्र नार्यस्तु......."

सृष्टि का सर दर्द से फटा जा रहा था और सुशांत की एक एक गालियां जो उसने उसको और उसके परिवार को दी थी सब कील की तरह उसके दिमाग मे चुभ रहीं थी उसके आंसू उसकी कोरों से ढरक रहे थे और शायद वो अखबार की उस औरत को यह जताना चाह रहे थे कि तुम्हारी चोटों के निशान ने तो तुम्हारे दोषी को समाज मे नँगा कर दिया पर मेरे ये घाव जो मेरे हृदयतल को समय समय पर अपनी शब्दबाणों से बेधित करेंगे उनका क्या?मैं अपने अपराधी को कैसे जग के सामने दिखाउंगी?उसके शब्द जो तीर बनकर मेरी आत्मा को छलनी करेंगे उन घावों को कैसे किसे दिखाउंगी?

मुझे पता है

हर स्त्री प्रताड़ित है कहीं ओहदे से,कहीं गुरुर से,कहीं जिम्मेदारियो से,कहीं धर्म संस्कार की आड़ से,कहीं कपड़ों से कहीं नज़रियों से! कुलीन हो या मलिन किसी न किसी रूप में वह प्रताड़ित ही है कहीं शारीरिक तो कही मानसिक"


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