धरोहर; राजस्थान

Tragedy


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धरोहर; राजस्थान

Tragedy


“प्रकृति से खिलवाड़ बंद करो”

“प्रकृति से खिलवाड़ बंद करो”

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दोस्तों, आँखों में आँसू और दिल में दर्द लिए मैं इस मार्मिक पंक्तियों को साझा कर रहा हूँइस भयानक स्थिति में किसी की ज़रूरत तो किसी की मजबूरी को कलम से लिख रहा हूँ


वैसे तो इस सोशल मीडिया के दौर में शायद ही ऐसा कोई पल रहा होगा जो आपसे बचा होगा और यकीनन लॉक्डाउन की उन तस्वीरों ने मेरी तरह आपके दिल को भी दहला दिया होगा

मुझे भी यह ज़िन्दगी अब 1BHK फ़्लैट में बेगानी-सी लगने लगी है, शायद इसलिए कि मुझसे दूर जयपुर में मेरी माँ घर की दहलीज़ पर राह देखने लगी हैफ़ोन पर बात कर माँ ने पापा को फ़ोन दिया तभी पापा को मैंने समझाया और पूछा कि माँ मेरी इतनी चिंता क्यों कर रही हैतभी पापा के पीछे से बहन की दबी हुई आवाज़ में सुनाई पड़ा कि बाबा.! माँ अंदर वाले कमरे में जाकर रो रही हैमैं घर में सबसे छोटा हूँ, सब मुझे बाबा ही बुलाते है, तभी पापा ने कहाँ चलो बाबा.! ध्यान रखना और फ़ोन रखते हैंमैं माँ-पापा की रुँधी आवाज़ को महसूस कर उनके डर को समझ सकता था, उनके लाडले को कहीं कुछ हो न जाएँ यही डर उनके मन में घर कर रहा था


ख़ैर..! उस पल को नज़र-अंदाज़ कर मैं कोने में पड़ी एक कुर्सी पर जा बैठा और पास में रखा गिलास उठा पानी पीने लगा, पानी पीकर......एक लंबी साँस अंदर खिंचा और फिर खुद से ही सवाल करने लगा, कि जब मेरे जैसे परिवार को यह महामारी इतनी बड़ी चिंता में डूबा सकती है तो बेचारे उन दिहाड़ी मज़दूरों को किस हद तक सोचने पर मजबूर कर सकती हैफिर मैंने Whtsp खोला तो मेरी रुह कांप उठी उन तस्वीरों को देखकर, जिनमें लोग पैदल चलकर गाँव जा रहे थे जान की बाज़ी खेलकरAC में बैठे आप और मुझ जैसे लोग उन पर व्यंग कस रहे थे, पर शायद मजबूरी के कारण वो लॉक्डाउन का उल्लंघन कर रहे थेबहुत आसान होता है AC वाले कमरे में बैठकर ज्ञान देना और बाहरी दुनिया का मज़ाक उड़ा कर उन पर तंज कसना, पर उन दिहाड़ी मज़दूरों को ज़रूरतें देखकर आभास हो गया था कि मुश्किल है अब उनके लिए यहाँ जड़े जमाएँ रखनाकितनी ताक़त दी होगी विधाता ने उस माँ को जो सर पर बोरी, बगल में दुपट्टे में अपने लाल को लपेटे एक हाथ से अपने पल्लू को मास्क बना अपना मुँह संभाल रही थीआँसू आ गए मेरे उस दादी अम्मा को देखकर जो आज साठ की उम्र में भी अपने पोते की पीठ से पिट्टू बैग लेकर उसका भार कम करने में लगी थीएक तस्वीर में छोटा-सा बच्चा जो अभी बोलना भी नहीं जानता होगा मानो अपने पापा से पूछना चाह रहा हो कि पापा अचानक उन छोटी गलियों से निकल कर इन लंबी-चौड़ी सड़कों पर बिना रुके हम कहाँ चले जा रहे हैतभी दादा जी के कंधो पर बैठी उस छोटी-सी गुड़िया पर मेरी नज़र गयी जो शायद अभी भी इस चिंता में डूबी है कि माँ के सर पर रखे बोरे में सारा सामान आ गया या हम पीछे बहुत कुछ छोड़ आए है


बस कर यार अब और तस्वीरें देखने का बिल्कुल मन नहीं हो रहा है मेरे पड़ोस का बाज़ार स्लम एरीया में है शायद यही डर माँ को सता रहा हैचुकीं पापा रेलवे में अधिकारी है तो उन्होंने लॉक्डाउन के ठीक एक दिन पहले मुझे “गुड्ज़-ट्रेन” में गार्ड वाले डिब्बे में आने का विचार सुझाया था, पर मैंने पापा को चिंता न करने और माँ का ख़्याल रखने की कहकर यही सुरक्षित रहने का विश्वास दिलाया थाशायद यह मेरी ज़िंदगी का सबसे बुरा दौर था जिसे मैं फिर कभी दोबारा नहीं देखना चाहता था

यह कुछ ओर नही इंसानों के द्वारा प्रकृति के साथ किए हुए खिलवाड़ थे और आज इंसान घर में बंद होने पर मजबूर था यह इसी के परिणाम थेसब कुछ ठीक होने पर हमें मिलकर प्रण लेना होगा, नहीं तो फिर ऐसी विपदा के लिए तैयार रहना होगा



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