परहेज वाला खाना
परहेज वाला खाना
बंटी की बर्थडे पार्टी पूरी डाइनिंग टेबल भरी हुई थी एक से एक बढ़िया पकोड़े ,वेफर्स ,गुलाब जामुन प्रिया अपनी तरफ से कोई भी कमी नहीं छोड़ना चाहती थी, केक भी वह घर में ही बनाती थी। रसोई के हर काम में वह मालती जी से भी ज्यादा निपुण थी ।काफी समय से मालती जी ने तो रसोई में जाना ही छोड़ दिया था ।लेकिन प्रिया को भी कोई एतराज नहीं था ।खाना बनाना उसका शौक था ।और घर में वह सब को बहुत प्यार करती थी।
बच्चों का खाना खत्म हुआ तो प्रिया बच्चों को लेकर दूसरे कमरे में रिटर्न गिफ्ट देने को चली गई इधर राकेश मालती जी और पापा तीनों डाइनिंग टेबल पर कब्जा जमा कर बैठ गए और स्वादिष्ट पकोड़े गुलाब जामुन का आनंद ले ही रहे थे कि प्रिया वापस आ गई और मम्मी के सामने से प्लेट हटाकर बोली, "नहीं मम्मी"! आप इतना नहीं खा सकती हो! आप के लिए तो दूसरा खाना है । सबके सामने ऐसे अपमान की मालती जी को उम्मीद नहीं थी ,उन्होंने एकदम से बोला अरे प्रिया मेरे ही घर में तू मुझे रोकेगी? "नहीं मम्मी" प्रिया की आवाज में नम्रता थी । मैं आपको बहुत प्यार करती हूं । मैं आपको ऐसा कुछ नहीं खाने दूंगी जिससे आप की तबीयत खराब हो जाए और "मुझे भी बहुत तकलीफ होती है, आपकी तकलीफ को देख कर"। अस्थमा तो पापाजी को भी था।
अपमान और क्रोध के मारे मालती जी बिना कुछ बोले अपने कमरे में चली गई । पापाजी ने भी एक बार राकेश की और देखा और फिर हमेशा की तरह मम्मी के पीछे पीछे ही चले गए ।राकेश हैरान-परेशान सा बोला, प्रिया तुम्हें ऐसा नहीं करना चाहिए। " मालूम है," मम्मी को कितना बुरा लगा होगा? "तुम्हें भी ऐसे नहीं करना चाहिए" तुम्हें पता है ना कि मम्मी की तबीयत कितनी ज्यादा खराब हो जाती है, डॉक्टर ने बोला था , एक तो उनका इतना ज्यादा भार है, उसके बाद में बीपी हाई और शुगर बढ़ जाएगा तो मम्मी को कितनी तकलीफ होगी ,यह सोचा है कभी? प्रिया बोली थोड़ी देर तुम नहीं रुक सकते थे, या अंदर से दूसरे कैसरोल ला कर के रख देते, जो मैंने मम्मी के लिए और तुम्हारे लिए बनाया था। लेकिन इंतजार तो तुम भी नहीं कर पाए ना। तुम्हें भी तो यही लगता है कि परहेज सिर्फ बड़ों के लिए है ,तुम्हारे को किसी तरह के खाने में रोक-टोक की कोई जरूरत नहीं है। "अच्छा अब ज्यादा डायटिशियन बनने की कोशिश मत करो" कह कर राकेश बंटी को भी अपने साथ लेकर कमरे में सोने के लिए चला गया।
भोजन जीवन का एक रस है ।ऐसे रसहीन जीवन की कल्पना भी दूभर तो है ही ।नमक भी जरा सा कम पड़ जाए तो खाना बुरा लगने लग जाता है ।और अचानक से कोई कैसे खा पाता होगा। -------राकेश को याद आए वह दिन जब उसकी दादी भी मना करने के बावजूद चुप करके कभी मिर्ची या खट्टा अचार कुछ भी खा लेती थी, तो कितनी तकलीफ में रहती थी , तब यही मम्मी परेशान होकर कहती थी ,"कैसे समझाऊं आपको" जो चीज नुकसान देती है मत खाया करो ना माताजी! और आज----। हम कोई गांधीजी तो है नहीं जो अस्वाद व्रत भी कर सकें जिसमें की नीम की पत्तियों को ही पीस के चटनी के जैसे खा ले। कहती तो प्रिया सही है कि एक उम्र के बाद जैसे और चीजें बदलती है ,हमें अपने खान-पान को भी बदलना ही चाहिए। प्रिया की मम्मी के साथ भी तो ऐसा ही हुआ था, वे निमोनिया से उठकर के घर में आई थी अभी बुखार टूटा भी नहीं था कि मौसी के घर शादी में चली गई और वहां पर उन्होंने "क्या खाया और क्या नहीं खाया", पता नहीं पर फिर उसके बाद में जो दोबारा से बुखार में आई फिर उठ ना सकी। प्रिया ने अपनी मां को तो खो दिया । उसके बाद उसने डाइटिशियन का कोर्स किया और डाइटिशियन बन के काफी लोगों की जिंदगी संवारी भी है इसने ।
दूसरे दिन सुबह हमेशा के जैसे प्रिया बंटी का स्कूल का लंच बना रही थी, फल काट रही थी , तभी,कमरे से मम्मी और पापा दोनों तैयार होकर निकले, प्रिया ने मम्मी की और देखा और फिर से बोला "मम्मी सॉरी", मैं सच में आपको बहुत प्यार करती हूं। मम्मी ने भी हंसते हुए उसके सर पर हाथ रख कर बोला "मुझे पता है" मैं भी तुझसे बहुत प्यार करती हूं। और अब हम दोनों पार्क में घूमने जा रहे हैं ,और बाद में हो सका तो योगा क्लास भी ज्वाइन करके आएंगे। राकेश और बंटी भी चुपचाप अपना नारियल पानी पीने में लग गए। दादी और दादू को जाते हुए देखकर बंटी चिल्लाया दादी मम्मी से हम सब ने भी प्रॉमिस करा है कि हम सब भी सप्ताह में 1 दिन केवल आपके जैसा ही खाना खाएंगे। भले ही वह कड़वे करेले हो या कि घीया का जूस। जब आप परहेज वाला खाना रोज खा सकती हो तो 1 दिन तो सप्ताह में हम सब भी वहीं खाएंगे। मालती जी ने मुस्कुराते हुए बंटी के सर पर हाथ रखते हुए कहा और तुम्हारी छुट्टी वाले दिन तुम भी हमारे साथ पार्क चलोगे। उन दोनों को जाते देख खाना खाते हुए राकेश और बंटी के चेहरे पर भी संतुष्टि का भाव था।
