प्रेम की पराकाष्ठा
प्रेम की पराकाष्ठा
कंपकपाते शब्दों में वेदान्त - तुम मुझे भूल जाओ दृष्टि, मैं भी तुम्हें भूल जाना चाहता हूँ। शायद मैं तुम्हारा और आगे साथ न दे पाऊं। ईश्वर ने हम दोनों का इतना ही साथ लिखा था शायद। दृष्टि से स्वयं की दृष्टि बचा कर आँखों में आँसू भर लाया था वेदान्त।
चाय का कुल्हड़ हाथों में पकड़े दृष्टि की आँखें भी छलक आती हैं। ऐसा क्यों कहते हो वेदान्त ? क्यों सोचते हो इतना नेगेटिव ? ट्रस्ट मी सब कुछ ठीक हो जायेगा। उस ईश्वर पर भरोसा रखो .... इतने सकारात्मक और भारी वाक्यों को हल्के मन से समझाते हुए दृष्टि ने कहा।
दृष्टि की बातें भी अब वेदान्त की पीड़ा को कहाँ आराम देती थीं।
वेदान्त - तुम जानती हो न दृष्टि, ये कोई मामूली बीमारी नहीं हैं, इसका कोई इलाज नहीं (कुछ देर रुक कर ) तुम कहीं और शादी कर लेना दृष्टि। तुम मुझे बुलाओगी न अपनी शादी में ? यदि जीवित रहा तो ज़रुर आऊंगा तुम्हारी शादी में। यह सुनकर वेदान्त और दृष्टि की आँखों के मोती ज़मीन पर बिख़र जाते हैं।
दृष्टि, वेदान्त के आँसू पोछते हुए - तुम बिल्कुल ठीक हो जाओगे, मेरा मन कहता है वेदान्त। और मुझे तुम्हारे सिवा किसी और के बारे में शादी तो क्या सोचना भी पाप लगता है। मैं सिर्फ़ तुम्हारी हूँ और हमेशा तुम्हारी ही रहूँगी ..वेदान्त। मैं तुमसे बहुत प्यार करती हूँ और जानती हूँ तुम भी मुझसे बेहद प्रेम करते हो। फिर ये बातें ?
वेदान्त स्वयं को झूठी तसल्ली नहीं देना चाहता है और न ही दृष्टि के उज्जवल भविष्य में बाधा बनना चाहता है। लेकिन वास्तव में वेदान्त बहुत चाहता है दृष्टि को। परन्तु काल के चक्र को कुछ और ही मंज़ूर था। समय के खेल को शायद समझ गया था वेदान्त। अपने दिल पर पत्थर रख दृष्टि से दूरियाँ करना चाहता है। दृष्टि, अब हम कभी नहीं मिलेंगे एक दूसरे से, और न ही फ़ोन करेंगे। मैं तुम्हें ख़ुद कि वजह से परेशान नहीं करना चाहता और प्लीज मेरी ये आखिरी बात तुम टालोगी नहीं तुम।
वेदान्त के आखिरी शब्दों ने दृष्टि को निरुत्तर कर दिया था। परन्तु जानती है वह वेदान्त के असीम प्रेम के बन्धन को।
दृष्टि वेदान्त की ओर देखकर - हे ईश्वर ! तुम्हारी सारी बीमारियाँ मुझे दे दे, और मेरी उम्र।
वेदान्त दृष्टि की बात को खत्म होने से पहले ही उसके होठों पर अपना हाथ रख देता है। प्लीज फिर कभी न कहना ऐसा कुछ। ये बीमारी तो दुश्मन को भी न दे भगवान। वेदान्त ने दृष्टि पर हक़ जताते हुए कहा।
दृष्टि - ठीक है लेकिन तुम भी ये मुझसे हाथ छुड़ाने वाली बात फिर न कहोगे कभी, प्रॉमिस करो।
वेदान्त, मैं तुम्हारे बिना नहीं रह पाऊँगी, और तुमसे बात नहीं करुँगी और नहीं मिलूंगी ...यकीं मानो तुमसे पहले दुनिया छोड़ जाऊँगी मैं। वादा करो तुम मुझसे मिलोगे ...वादा करो वेदान्त।
मायूस चेहरा लिए वेदान्त ऐसे व्यवहार करता है मानो उसने दृष्टि को सुना ही नहीं। दृष्टि अब तुम घर जाओ बहुत वक्त हो चुका है और घर पर तुम्हारी मम्मी इंतजार कर रहीं होंगी। दृष्टि ने मोबाइल में समय देखा तो वास्तव में 3 घन्टे बीत चुके थे। अब समय की पाबन्दी दृष्टि को घर की ओर खींचती है लेकिन वेदान्त के प्रेम की डोर दृष्टि को कहाँ छोड़ना चाहती है। दोनों के प्रेम की गर्माहट में चाय कब ठण्डी हो गयी उनको पता ही न चला।
वेदान्त तुम परेशान मत होना, दूर होकर भी मेरा मन तो हमेशा तुम्हारे पास ही रहता है न, ख़ुद को अकेला महसूस न करना। मैं तुम्हारे हर कदम पर साथ हूँ, दिल छोटा मत करना, तुम बहुत जल्द ठीक हो जाओगे ....अब मैं चलती हूँ - दृष्टि ने अपना मोबाइल पर्स में रखते हुए कहा।
दृष्टि जाने के लिए उठ जाती है लेकिन कुछ पल के लिए ठहर जाती है मानो उसका मन वेदान्त से कुछ शब्दों को सुनना चाहता हो।
वेदान्त मन ही मन उसे रोकना चाहता है लेकिन मजबूरियों ने जैसे उसके हाथ बांध दिये हों।
वेदान्त ....वेदान्त आज ये नहीं कहोगे कि घर पहुँचकर फ़ोन कर देना - दृष्टि कहते कहते फफक पड़ी थी और रोकर वहां से चली जाती है।
वेदान्त की आँखों में छुपा आँसुओं का सैलाब अब उफन आया था दृष्टि के जाने के बाद।
हे ईश्वर ! ये कैसी परीक्षा ले रहे हो तुम। दृष्टि मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूँ ...दृष्टि I love you ... love you so much दृष्टि।
मैं तुम्हारे बिना नहीं जी पाउँगा। दृष्टि को हर छोटी - बड़ी बात पर प्रोत्साहित करने वाला वेदान्त आज स्वयं हतोत्साहित हो गया था।
मेज पर रखा, दृष्टि का झूठा कुल्हड़ हाथ में उठाकर - दृष्टि, तुमसे कहाँ कुछ छिपा है। तुम जानती हों न ... कैंसर हुआ है मुझे। तुम्हें कैसे बांध लूँ प्रेम के बन्धन में कब मेरे साँसों के धागे टूट जाये ..कौन जानता है। ये ईश्वर इतना निर्मोही हो जायेगा कहाँ पता था दृष्टि। तुम भूल तो नहीं जाओगी। वेदान्त बहुत कुछ कहना चाहता था, बहुत कुछ बताना चाहता था लेकिन दृष्टि को मोह में और नहीं बांधना चाहता और ख़ामोश मूरत हो गया था दृष्टि के समक्ष।
चाय का कुल्हड़ हाथों में लिए जैसे दृष्टि की आखिरी निशानी हो, अपने साथ लिए चला जाता है वेदान्त।

