पिंगला गणिका द्वारा प्राप्त शिक्षा-१७
पिंगला गणिका द्वारा प्राप्त शिक्षा-१७
पिंगला नामक एक गणिका थी।दत्तात्रेय जी कहते है कि उससे उन्होंने सीखा कि सांसारिक सुख की आशा ही दुख का कारण है तथा निराशा (आशा का त्याग) ही सबसे बड़ा सुख है।
प्राचीनकाल की बात है, विदेहनगरी मिथिला में एक रूपजीविनी रहती थी। उसका नाम पिंगला था। वह स्वेच्छाचारिणी थी, रूपवती भी थी। एकदिन रात के समय किसी पुरुष को अपने रमणस्थान में लाने के लिए उत्तम वस्त्राभूषणों से सजकर बहुत देर तक अपने घर के बाहर दरवाज़े पर खड़ी रही। उसे पुरुष की नहीं ,धन की कामना थी और उसके मन में यह कामना इतनी दृढ़ मूल हो गई थी कि वह किसी भी पुरुष को उधर से आते -जाते देखकर यही सोचती थी कि यह कोई धनी है और मुझे धन देखकर उपभोग करने के लिए ही आ रहा है।
जब आने जाने वाले आगे बढ़ जाते तब फिर वह संकेत जीविनी रमणी यही सोचती है कि अवश्य ही अबकी बार कोई ऐसा धनी मेरे पास जावेगा जो मुझे बहुत सा धन देगा ।उसके चित्त की यह दुराशा बढ़ती ही जाती थी ।वह दरवाज़े पर बहुत देर तक खड़ी रही ।उसकी नींद भी जाती रही ।वह कभी बाहर जाती, तो कभी भीतर आती। इस प्रकार आधी रात हो गई।सचमुच आशा और वह भी धन की बहुत बुरी है । धनी की बाट जोहते- जोहते उसका मुँह सूख गया , चित्त व्याकुल हो गया ।तब उसे इस वृत्ति से बड़ा वैराग्य हुआ। उसमें दुख- बुद्धि हो गई। इसमें सन्देह नहीं कि इस वैराग्य का कारण चिन्ता ही थी। परन्तु ऐसा वैराग्य भी सुख का हेतु है।
जब पिंगला के मन में इस प्रकार वैराग्य की भावना जागृत हुई तब उसने एक गीत गाया। क्योंकि आशा पाश के बन्धन को तलवार की तरह काटने वाली यदि कोई वस्तु है तो वह केवल वैराग्य है। जिसे वैराग्य नहीं हुआ है ,वह शरीर और इसके बंधन से उसी प्रकार मुक्त नहीं होना चाहता जैसे अज्ञानी पुरुष ममता छोड़ने की इच्छा भी नहीं करता।
पिंगला ने यह गीत गाया- “अहो !मेरे मोह का विस्तार तो देखो , मैं अपने मन को वश में नहीं रख सकती, इसलिए मूर्ख की तरह तुच्छ व्यक्ति से सुख की कामना करती हूँ। मेरे निकट से निकट हृदय में ही मेरे सच्चे स्वामी भगवान विराजमान हैं ।वे वास्तविक प्रेम सुख और परमार्थ का सच्चा धन भी देने वाले हैं। जगत के पुरुष अनित्य हैं और वे नित्य हैं। ओह ! मैंने उनको तो छोड़ दिया और उन तुझ मनुष्यों का सेवन किया जो मेरी एक भी कामना पूरी नहीं कर सकते ; उल्टे दुख -भय ,आधि-व्याधि , शोक और मोह ही देते हैं । यह मेरी मूर्खता की हद है।
बड़े खेद की बात है ,मैंने अत्यंत निंदनीय आजीविका का आश्रय लिया और व्यर्थ में अपने शरीर और मन को क्लेश दिया ,पीड़ा पहुँचाई। मैं अविनाशी परमप्रिय परमात्मा को छोड़कर दूसरे पुरुष की अभिलाषा करती रही। अवश्य ही मेरे किसी शुभ कर्म से दुराशा से मुझे इस प्रकार वैराग्य हुआ है। मेरा यह वैराग्य सुख देने वाला होगा। मैं विषय भोगों की दुराशा छोड़कर उन्हीं जगदीश्वर की शरण ग्रहण करती हूँ ।अब मुझे प्रारब्ध के अनुसार जो कुछ मिल जाएगा उसी से निर्वाह कर लूँगी और बड़े संतोष तथा श्रद्धा के साथ रहूँगी ।जिस समय जीव समस्त विषयों से विरक्त हो जाता है ,उस समय वह स्वयं ही अपनी रखा रक्षा कर लेता है ।सारा जगत का काल रूपी अजगर से ग्रस्त है।”
अवधूत दत्तात्रेय जी कहते हैं- पिंगला ने ऐसा निश्चय करके धनियों की दुराशा, उनसे मिलने की इच्छा का परित्याग कर दिया और शांत भाव से जाकर अपनी शय्या पर सो गई। आशा पाश में बंधी पिंगला ने जब आशा छोड़ दी तभी शान्ति को प्राप्त हो गई। निराशा अर्थात् किसी वस्तु को न चाहना ही परम सुख है। अतः साधक को चाहिये कि वह किसी वस्तु की आशा न करे और जो प्रारब्ध के अनुसार प्राप्त हो जाए उसी में संतोष करे।
