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Prafulla Kumar Tripathi

Drama

4  

Prafulla Kumar Tripathi

Drama

फुल स्टाप !

फुल स्टाप !

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वर्ष 1971की जुलाई के आख़िरी दिन अब भी मेरी याद में रचे बसे हैं। गोरखपुर के माया बाज़ार रोड पर गेरुए रंग में रंगी वह हवेलीनुमा बिल्डिंग उन दिनों एक दैनिक अख़बार का कार्यालय हुआ करती थी । आज की तरह लैपटापी या इंटरनेटी पत्रकारिता नहीं हुआ करती थी। संवाददाताओं द्वारा भेजे गये , न्यूज एजेंसी तथा फैक्स से मिले समाचार और रेडियो सुनकर अख़बार के पन्ने भरे जाते थे। मैं इंटर की पढ़ाई करने के साथ साथ पत्रकारिता का क,ख,ग भी सीख रहा था। दो ढाई बजे डी.ए.वी.कालेज से निकलता और सीधे अख़बार के दफ्तर पहुंच जाया करता था। चाय पानी की कोई प्राब्लम इसलिए नहीं हुआ करती थी क्योंकि अख़बार मालिक के भतीजे विजय बाबू मुझ पर मेहरबान रहा करते थे जो उन दिनों संपादकीय प्रभारी हुआ करते थे। हां,तो उस ख़ास दिन लखनऊ से एक नये संपादकीय सहयोगी आ रहे थे राजेश जी । ट्रेन लेट होने से वे लगभग उसी समय दफ्तर पहुंचे जब मैं वहां मौज़ूद था। सलाम दुआ होने के बाद सबसे परिचय का आदान प्रदान हुआ। राजेश जी बेहद धीर गंभीर और पत्रकारिता में दक्ष मिले। उन दिनों अख़बार के मालिक इलाके के एक प्रतिष्ठित ठाकु परिवार से सम्बद्ध थे और ज़िला परिषद अध्यक्ष तथा विधान परिषद सदस्य रह चुके थे। एकाध बार मेरा भी आमना सामना जब हुआ और उन्होंने परिचय जाना तो खुश हुए।

समय पंख लगाकर उड़ता रहा और राजेश जी की दक्षता से समाचार पत्र और उनकी दोनों की लोकप्रियता बढ़ती रही। उन दिनों गोरखपुर का वह अकेला दैनिक था। इलाहाबाद से एक अंग्रेजी और वाराणसी से एक हिन्दी अख़बार गोरखपुर में आया करते थे और ज़्यादा सर्कुलेशन वाले थे। चुनौती शहर में इस अख़बार को एकछत्र राज्य पाने की थी जो बहुत मुश्किल थी। राजेश जी ने उप संपादक के रुप में ज्वाइन किया था और साल भर में वे संपादक बना दिये गये। सिगरेट और चाय के शौकीन थे और कविताओं के भी। मैं अब विश्वविद्यालय का छात्र हो चला था। जवानी की दहलीज़ पर था और महत्वाकांक्षा रुपी खुले आसमान पर उड़ने की लगातार बढ़ती जा रही थी तमन्ना। विजय बाबू जब संपादक थे तो उन्होंने इतनी छूट दे दी थी कि मैनें अख़बार के संपादकीय क़ालम तक लिख डाले थे। लेकिन अब राजेश जी के आने से मुझ पर लगाम लगनी शुरु हो गई थी। ठीक ही था मैनें पत्रकारिता का डिग्री या डिप्लोमा को कौन कहे ग्रेजुएशन तक तो उस समय नहीं किया था । फिर भी मैं अपने मस्तमौला स्वभाव के उलते पूरे स्टाफ में लोकप्रिय था। मैनेजमेंट में एक थे कृष्ण कुमार मिश्र जो प्रभारी थे और जो मेरे गांव के पास के थे। पुत्रवत माना करते थे। शंकर,चीफ़ मशीनमैन तो मेरा दीवाना था और जब पेपर कम्पोज़ होकर मशीन पर छपने को जाता तो पहला प्रूफ लिये दौड़ा हुआ आता था। अगर मेरे नाम से कोई न्यूज नहीं मिलती तो गुस्सा करता था। कहता था ,आप जब फ्री में सेवाएं दे रहे हैं तो कम से अम नाम का क्रेडिट तो मिलना ही जाहिए ना !

राजेश जी के कैरियर की यह धमाकेदार ओपेनिंग थी। अख़बार का सर्कुलेशन बढ़ गया लेकिन उससे ज्यादा राजेश जी की क़लम सुर्खियां बटोरती रहीं। लगभग दो साल बाद उनका चयन सूचना विभाग की गृहपत्रिका के संपादन हेतु हो गया और वे वापस लखनऊ चले गये। वहां गृहपत्रिका को उन्होंने अपनी कुशलता और अनुभव से मानो चार चांद लगा दिया । प्रशासनिक ही नहीं साहित्यिक क्षेत्र की भी वह हस्ताक्षर बन गई और उसमें छपना लेखकों के लिए गौरव की बात हुआ करने लगी।

लखनऊ उन दिनों राजनीतिक सुर्खियों का केन्द्र भी हुआ करता था। आज़ादी के बाद एक ही पार्टी का बोलबाला था और सत्ता भी उन्हीं की मर्जी से चलती थी। राजेश जी को कुर्सी तो अवश्य ऊंची मिल गई लेकिन कामकाज में जो स्वायत्तता गोरखपुर में थी वह लखनऊ में प्रतिबंधित हो गई। ऊपर वालों का उनके कामकाज में दखलंदाजी बढ़ने लगी। उनका शायराना मूड इससे हमेशा असंतुष्ट रहता। वे अब शादीशुदा हो चले थे और एक नन्हीं किलकारी भी घर में गूंजने लगी थी। बहुमंजिली सरकीरी बिल्डिंग में उन्हें फ्लैट मिल गया था। दफ्तर से घर पहुंच कर वे उस नन्ही किलकारी से घंटों खेलते। लेकिन पत्नी की फ़रमाइशें आसमान छूने लगी थीं। सिगरेट के साथ शराब ने भी अब उनका साथ देना शुरु कर दिया था। हजरतगंज में देर रात वह अपने समान रुचि वाले दोस्तों के साथ गंजिंग के नाम पर अपने ग़म भुलाया करते थे।

आपातकाल में गोरखपुर का वह अख़बार बंद हो गया था। वैसे अब गोरखपुर से ही बनारस वाला अख़बार छपने लगा था तो उसकी यह दुर्गति होनी ही थी। 1976के पहले महीने में मेरी मुलाकात लखनऊ में उनके दफ़्तर में उनसे जब हुई तो उन्होंने मेरा जबरदस्त स्वागत किया और अपनी पत्रिका में लिखने का आफर भी दिया। मैं उन दिनों अब एल.एल.बी.पूरा ही करने वाला था और स्वतंत्र रुप से लेखन में लगा हुआ था। असल में मैं उनके ही बास से जो मेरे निकट के रिश्तेदार थे, से ऊपरी मंजिल पर मिलकर जब उतर रहा था कि उनसे मुलाकात हुई थी। मैने गोरखपुर जाते ही कुछ श्रृंखलाबद्ध आलेख उन्हें भेजे और चूंकि मेरे रिश्तेदार ने भी लिखते रहने का लगभग वैसा ही आफर मुझे दे रखा था मैनें सीधे उनके बास को मेटेरियल भेजना शुरु कर दिया। वाया बास उन तक जब मैं या मेरी प्रकाशन सामग्री पहुंची तो यह भी उनके असंतोष का कारण बन बैठी। चाहे अनचाहे उनको मेरे श्रृंखला बद्ध आलेख ससम्मान छापने पड़ते थे। मेरा उसी साल एक बार फिर लखनऊ जाना जब हुआ तो उन्होंने अपने इस असंतोष को जाहिर भी किया।

वे अब प्रकाशन और संपादन की दुनियां में जाने पहचानी हस्ती बन चले थे लेकिन उनका अकेलापन उन्हें निगल लेने को लालायित रहता। पत्नी एकदम कोआपरेट मूड में नहीं थी और वह उन्हें बहुत ही हल्के में लिया करती थी। अब तो वे शरीर ही नहीं मन से भी कोसों दूर होते जा रहे थे।

1991में अक्टूबर महीने में मेरी पोस्टिंग लखनऊ हुई ही थी कि एक सुबह की एक ख़बर ने मुझे चौंका दिया। राजेश जी ने अपने निवास के बहुमंजिले फ्लैट से कूदकर आत्महत्या कर ली थी। पता चला कि पत्नी से एक रात पहले किसी बात को लेकर ख़ूब झगड़ा और मारपीट हुई थी। तैश में आकर राजेश जी ने इस प्रकरण को फुल स्टाप देने के लिए इस संसार को ही त्याग दिया था। उनकी इस तरह की अप्रत्याशित प्रतिक्रिया ने हम सभी को हिलाकर रख दिया। एक सूर्य असमय अस्त हो गया था।


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