Krishna Kant dubey

Inspirational


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Krishna Kant dubey

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पाखंडी भक्त

पाखंडी भक्त

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‘समय के साथ सोच और चिंतन को बदलना चाहिए। जो लोग ऐसा नहीं करते हैं वो लोग ताउम्र उलझनों और संघर्षों से जूझते रहते हैं। मैने पुरातन विचारों से अपना पल्लू छुड़ा लिया है क्योंकि समय के अनुकूल चलने में ही सलामती है।’

भागीरथी का यह स्वभाव परिवर्तन देखते बन रहा था। सभी गाँव वालों को आश्चर्य हो रहा था कि कल तक भागीरथी वैदिक परंपराओं को शिरोधार्य करके दुनिया को दर्शन देता फिरता था लेकिन आज वह आधुनिकता के परिवेश में पूर्णत: ढलने की बात करने लगा है। वैदिक संस्कारों और परंपराओं में पावन-पुनीत गंगा के प्रति सबसे अधिक अनुसरणीय पवित्र मंगल भावना संप्रेषित हुई है। भागीरथी उसी गंगा के प्रति पूर्ण आस्था व् विश्वास रखते हुए स्वर्ग प्राप्ति का मूल माध्यम मानता था। तभी तो वह जीवन के प्रत्येक संस्कार में गंगाजल का प्रयोग करता था। यदि कोई अपने प्राण त्याग रहा है तो वही सबसे पहले अपने लोटे से उसके मुख में गंगाजल डालकर मोछ की चौखट तक पहुँचाने में सहायक होता था। गंगातट पर अंतिम संस्कार और गंगा की निर्मल, अविरल धारा में साढ़े तीन कुंतल चिता की लकड़ी के कोयले में जलकर राख हो चुकीं अस्थियों के विसर्जन करने की पुरातन मान्यता को सबसे अधिक मजबूती से प्रसारित करने का काम भागीरथी ही करता था।

आज के अत्याधुनिक साधनों और वैज्ञानिक विधियों ने गंगा भक्त भागीरथी को सबसे अधिक अपनी ओर आक्रष्ट किया। उसके मन में यह धारणा अच्छी तरह बैठ गई कि गंगाजल का आचमन शरीर के आंतरिक पक्ष को निर्मल बना देगा इसलिए हमें गंगाजल आचमन कर अंतरात्मा को पवित्र और निर्मल करके मोक्ष प्राप्त करना चाहिए, न कि म्रतक अधजले शवों को प्रवाहित कर पावन-पवित्र गंगाजल को प्रदूषित करना चाहिए।

सभी पुरातन मान्यताओं का परित्याग कर भागीरथी गंगादूत बनकर गंगा बचाओं अभियान का संचालन कर जन-मन को गंगा की महिमा और गंगा की निर्मलता के प्रति जागरूक करने लगा है। 

एक दिन भागीरथी के एक अभिन्न मित्र ने पूछ दिया कि- ‘भगीरथी तुम मरने के बाद अपने शरीर का अंतिम संस्कार कहा करना चाहोगे ? गंगा के तट पर या इलेक्ट्रानिक शवग्रह में।’ मित्र का सवाल सुनकर थोड़ी देर के लिए भागीरथी मौन हो गया। एक बार फिरसे उसके अन्तस् में वैदिक पुरातन मान्यताएं उच्छ्लने लगीं। किन्तु पुन: अपने अभियान के उद्देश्य को स्मरण करते हुए उसने कहा- ‘गंगाजल की निर्मलता और स्वच्छता के लिए मैं अपना अंतिम संस्कार इलेक्ट्रानिक शवग्रह में करवाना चाहूँगा ताकि मेरी गंगा भक्ति पाखंडी भक्ति न बन सके।’

आख़िरकार भागीरथी इस बात को जानता था कि एक न एक दिन म्रत्यु आनी ही है। कहीं ऐसा न हो कि अंधभक्त उसके म्रतक शरीर को अविरल,निर्मल गंगा में विसर्जित कर दें और फिर स्वच्छ गंगाजल प्रदूषित हो जन-जीवन के प्राण हरने लगे। इस संदेह से ग्रषित भागीरथी ने सौ रूपये वाले नोटरी शपथ पत्र पर अपने अंतिम संस्कार को इलेक्ट्रानिक शवग्रह में करवाने की शपथ लेकर गाँव व् प्रशासन को सौप दिया। भगीरथी का जब देहवसान हुआ, तब पूरे विधि-विधान से सभी ने उसका अंतिम संस्कार इलेक्ट्रानिक शवग्रह में करवाकर उसके गंगा बचाओं अभियान को चरम शिखर पर पहुँचा दिया। सच में भगीरथी गंगा का पाखंडी भक्त नहीं था।


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