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Vimla Jain

Action Classics Inspirational

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Vimla Jain

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नवरात्रि डायरी गुजरात में

नवरात्रि डायरी गुजरात में

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प्रिय डायरी

नवरात्रि आ रही है चलो अपन नवरात्रि की बातें कर लेते हैं

नवरात्रि हिंदुओं का एक प्रमुख पर्व है। नवरात्रि एक संस्कृत शब्द है, जिसका अर्थ होता है 'नौ रातें'। इन नौ रातों और दस दिनों के दौरान, शक्ति / देवी के नौ रूपों की पूजा की जाती है। दसवाँ दिन दशहरा के नाम से प्रसिद्ध है। नवरात्रि वर्ष में चार बार आता है। माघ, चैत्र, आषाढ, अश्विन मास में प्रतिपदा से नवमी तक मनाया जाता

गुजरात में इस त्यौहार की एक अलग ही हलचल दिखाई देती है। गुजरात में नवरात्र आज भी एक पांरपारीक तरीकों के साथ मनाई जाती है। मां की आराधना में किया जाने वाला गुजरात का गरबा रास आज पूरे देश में लोकप्रिय हो चुका है। बता दें कि गुजरात के छोटे से छोटे गांव से लेकर शहरों तक में ये नृत्य पूरी श्रद्धा और उत्साह से किया जाता है, जहां कोलकाता में महिलाएं सिंदूर से खेला करती हैं वहीं उत्तरी भारत में नवरात्र के दसवें दिन दशहरा के रूप में मनाते हैं। गुजरात में नवरात्र मनाने का एक अलग ही तरीका है। गुजरात में नवरात्र मनाने के लिए लोग दूर-दूर से आते है। 


नवरात्रि जिसका अर्थ है नौ रातें भारत के कई हिस्सों में सबसे लोकप्रिय और व्यापक रूप से मनाए जाने वाले हिंदू त्योहारों में से एक है। नवरात्र पहले दिन गुजरात में मां अम्बा की आराधना के साथ-साथ मिट्टी की मटकी, जिस में छोटे-छोटे छेद होते हैं। उस में अखंड दीये के साथ मां की स्थापना कर जाती है।

गुजरात में गरबा खूब खेलते हैं। नवरात्र के नौ दिनों के दौरान इसी गरबा की पूजा की जाती है। हर दिन आरती की जाती है और दशहर के दिन मां की विदाई होती है। घरों के अंदर मां के मिट्टी के गरबा के जरिये देवी की स्थापन होती है। वहीं मंदिरों में मां के स्थापना के तौर पर बड़ी मिट्टी की मटकी रखी जाती है। इसके नीचे गेहूं, बाजरा और धान के दाने डाले जाते हैं।

गुजरात में दांडीया शुरू करने से पहले मां की आरती होती है। यही नहीं गरबा खत्म होने से पहले भी लोग मां की आरती करते हैं। नवरात्रि के दौरान उपवास भी रखते कुछ लोग हैं और माता की पूजा करते हैं। शाकाहारी भोजन का सख्ती से पालन किया जाता है । शराब जैसी चीजों से पूरी तरह से दूरी बना ली जाती है। नवरात्रि में एक लोकप्रिय अनुष्ठान कन्या पूजन है। जो आठवें या नौवें दिन होता है।

सन 1981 हम गुजरात के अंतरिम में बसा हूवा कस्बा तिलकवाड़ा में आए।

 यहां से गुजरात में रहने की यात्रा हमारी शुरू हुई।

जब नवरात्रि पर्व आया पहली बार मैंने रोड पर शेरी गरबे होते हुए देखे।

दिन में जहां बहुत सारी बसों का आवागमन और भी बहुत वाहनों का आवागमन होता था।

 वही रात में इस सड़क पर ऐसा लगता पूरा का पूरा गांव ही सड़क पर आ गया और लोग 

मनोंयोग से भक्ति भाव बड़े बच्चे स्त्री पुरुष सब मिलकर गरबा करते और डांडिया खेलते बीच में पूजा भी करते बड़ा ही मनोरम दृश्य होता था।

पहली बार ऐसा होते हुए देखा ।

वह दृश्य तो आज भी आंखों के सामने आ जाता है जहां पर ऐसा कुछ नहीं था कि किसको कैसा आता है जिसको जो मन है बस भक्ति भाव से गरबे करते ही रहते थे दो दिन बाद तो हमने भी कोशिश करके करने चालू करे 

सच बताऊं बहुत मजा आया आज भी मुझे मेरी बेटी एक गाना गाती थी वह याद है और उस पर वह नाचती थी गरबा करती थी।

 अंबे आ गरबा रमिये

मने रमता नहीं आवतुं मने रमता सिखवाड़जे

पावली लई ने मुं तो पावागढ़ गई थी।

 या तु म्हारी पावली पाछी दे‍।

 नहीं तो अंबे मां मने दर्शन दे।

उसकी भाषा में गाना इतना अच्छा लगता था।

हिंदी गुजराती मिक्स हो जाता था वहां की नवरात्रि बहुत ही यादगार नवरात्रि थी हम जितने साल वहां रहे शेरी गरबे, अढार क्वार्टर्स के गरबे देखने जाते थे और फिर तो करने भी लग थोड़े-थोड़े बच्चे तो बहुत अच्छा करते थे थोड़ा हम भी कर लेते थे और डांडिया तो बहुत ही अच्छे होते थे‌।

 रात को तीन-चार बजे तक प्रोग्राम चलता था।

समय के साथ में गरबे का स्वरूप भी बदल गया है और गरबे का प्रोग्राम भी बदल गया है अब सब व्यावसायिक हो गया है ।

साधारण जनता के लिए अब शेरी गरबे तो बहुत ही कम होते हैं।

पूजा पाठ कम और दिखावा ज्यादा होता जा रहा है।

 बड़ौदा के गरबे बहुत ही मशहूर मशहूर हैं।

पहले तो हम लोग गरबे में जाते थे मगर आप भीड़ बहुत है और व्यवसाय कारण के कारण स्वरूप बदल गया है तो अब हमारा जाना कम हो गया है मगर गरबे और डांडिया आजकल तो टीवी पर ही आ जाते हैं तो देखे तो हैं बहुत मजा आता है भीड़ में जाने से बच जाते हैं और घर पर देख लेते हैं।

नवरात्रि का मजा लेना है तो एक बार बड़ौदा की नवरात्रि की जरूरी देखें । यहां के गरबे बहुत प्रसिद्ध है।

बड़ौदा में होम साइंस कॉलेज के गरबे बहुत ही खूबसूरत और शांत होते हैं और सबके लिए देखने के लिए खुले होते हैं अभी गरबेका टाइम कर दिया है तो रात को 12:00 बजे के बाद इतना हल्ला गुल्ला नहीं होता है। पहले तो रात को चार-चार बजे तक गरबे के लाउडस्पीकर चला करते थे।

जय माता दी।


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