नदी की पीड़ा
नदी की पीड़ा
एक दिन नदी चिंतित होकर भगवान से संवाद करने लगी।नदी ने भगवान से कहा "ईश्वर,मैं तो सदैव इंसानों के हित में सभी कार्य करती हूं। नदी में स्नानकर सभी ख़ुद को स्वच्छ और पापमुक्त समझते हैं।इंसानों को क्यों नहीं सूझता है कि नदी सर्वस्व न्योछावर करती है इंसानों के लिए।फिर क्यूं इंसान कृतघ्न बन गए हैं।
नदी में अवांछनीय पदार्थ डालकर क्यूं मेरी आयु दिन-ब-दिन कम कर रहे हैं।
काश ! मेरी पीड़ा समझते इंसान।"इन बातों को कहते हुए नदी की आँखों से आंसू बहने लगें और जल की बूँदों में मिल गए।ईश्वर भी नदी की पीड़ा सुनकर और इंसानों का निर्दयी व्यवहार देखकर मायूस हो गए।
