मोहब्बत ख़्वाब सफ़र
मोहब्बत ख़्वाब सफ़र
"क्या है ये?" मेज़ पर रखे है क़ाग़ज़ को बहुत ग़ौर से देखने के बाद दानियाल ने नज़र उठा कर मेज़ के उस पार खड़ी लड़की को देखते हुए ख़ासा ग़ुस्से में कहा।
"सर आपने घर की प्लानिंग के लिये कहा था" लड़की ने सहमने से अंदाज़ में जवाब दिया।
"और ये प्लानिंग की है तुम ने?" उसने काग़ज़ उठा कर लहराते हुए कहा और फिर ग़ुस्से में क़ाग़ज़ मेज़ पर लगभग पटका और बिना वज़न का क़ाग़ज़ लहराता जा गिरा ज़मीन पर... सामने सहमी खड़ी लड़की मज़ीद सहम गयी।
"दो हज़ार स्क्वायर फ़ीट पर एक छोटा सा घर तुम से डिज़ाइन नहीं होता और बात करती हो बड़े प्रोजेक्ट्स में शामिल होने की" अब वो बाक़ायदा डांट रहा था "डेढ़ दिन में तुमने ये दो कौड़ी का नक्शा बनाया है" दानियाल ने नज़र उठा कर उसकी ओर देखा, वो बहुत पुरकशिश थी और नज़ाक़त से की हुई तैयारी उसे मज़ीद पुरकशिश बना रही थी... लिपस्टिक, काजल, मस्कारा, बालों में लाल लट....
"जितनी मेहनत अपनी तैयारी में करती हो ना अगर इतना ध्यान प्रोजेक्ट्स पर लगाओगी तो बेहतर होगा। अब जाओ यहां से और शाम तक मुझे इसके दो नये और बेहतर प्रोपोज़ल चाहिये"
लड़की जैसी सहमी खड़ीं थी वैसे ही सहमी रही, इतना ज़ाती कमेंट सुनने के बाद भी ख़ामोशी से ज़मीन पर गिरा क़ाग़ज़ उठा कर 'यस सर' कहती दानियाल के केबिन से बाहर निकल गयी।
उसकी केबिन से लगे दूसरे केबिन में बैठे विशाल तक उसकी आवाज़ साफ़ सुनायी दे रही थी, वो उठ कर दानियाल के केबिन में आया।
"क्यों डांट रहे थे उसे?"
"इतनी रद्दी प्लांनिग की थी उसने"
"यार वो अभी ट्रेनी है, अगर तुम उससे ये उम्मीद रखो कि वो तुम्हारी तरह आठ साल के तजुर्बेकारों की तरह काम करे तो ग़लत है"
"ट्रेनी है तो ट्रेनी की तरह रहे, पता है आज सुबह मुझे से क्या कह रही थी"
"क्या?"
"सर मुझे भी हॉस्पिटल के प्रोजेक्ट पर काम करना है" उसकी नक़ल करते हुए, दानियाल ने मज़ाक़ उड़ाया।
"ये नुक्कड़-नुक्कड़ खुले प्राइवेट कॉलेजेस ने हंगामा काट रखा है, गधों के सर पर भी डिग्रियां सजी हुई हैं" उसका लहजा काफी तौहीन आमेज़ था।
"अब जनाब आप की तरह हर कोई IITian तो नहीं हो सकता" विशाल उसकी ख़ुदपसन्दी पर मुस्कुराया।
"और बाई द वे, वो लड़की किसी नुकक्कड़ के कॉलेज से पढ़ कर नहीं आयी है। आर्किटेक्चर की जन्म भूमि और कर्म भूमि इटली से पढ़ कर आयी है"
"इटली से पढ़ी हो या झुमरीतल्लैया से, है निरि बेवक़ूफ़, उसकी प्लानिंग नेगेटिव स्पेस से भरी हुई थी" दानियाल ने चिढ़ कर कहा।
"अभी सीख रही है" विशाल ने उसकी पैरवी की।
"ये तुम उसकी इतनी तरफ़दारी क्यों कर रहे हो?" दानियाल ने भवें चढ़ाते हुए मश्कूक़ अंदाज़ में पूछा।
"जिस पर तुमने ये बॉसगिरी दिखायी है, जानते हो वो है कौन?"
"कहीं की तोप है?" उसने मज़ाक़ उड़ाने वाले अंदाज़ में पूछा।
"वो तोप है की नहीं ये तो नहीं मालूम लेकिन वो तोप जिस का रुख़ हर वक़्त हम सब पर रहता है, उसकी बहन है"
"क्या मलतब?"
"मतलब ये माई डिअर...कि जिसकी तुमने इतनी शदीद तरीन बेइज़्ज़ती की है, वो इस कम्पनी के मालिक और हम सब के बॉस वजदान हसन की बहन युमना हसन है"
"लो भाई...!" दानियाल ने कुर्सी की पुश्त पे टेक लगाया।
"बॉलीवुड तो बेवजह ही बदनाम है नेपोटिस्म के लिये" उसने अपने शीशेदार केबिन से सामने बैठी लड़की की ओर देखा, जो हाथ में पेंसिल लिये क़ाग़ज़ पर कुछ बना रही थी।
"अब कुछ दिनों में ये हमारे सर पर बैठा दी जायेगी और हम सब नेपोटिस्म का शिकार होते रहेंगे और हम जैसों को इन जैसों को 'यस बॉस-यस बॉस' करना पड़ेगा" उसके लहजे में अहसासे कमतरी झलक था।
क़ाग़ज़ से नज़र हटा कर युमना ने एक चोर नज़र दानियाल के केबिन की ओर डाली। उसके चेहरे से तास्सुर से साफ़ पता चल रहा था कि वो विशाल से उसकी ही बुराई कर रहा था। युमना दोबारह क़ाग़ज़ पर झुक गयी। लब पर एक मुस्कान थी...जो किसी दास्तान के आग़ाज़ पर मुहर थी।
Continued:

