मोह की दुनिया और माया भरा संसार – एक दृष्टिकोण
मोह की दुनिया और माया भरा संसार – एक दृष्टिकोण
" मोह की दुनिया और माया भरा संसार – एक दृष्टिकोण "
बहुत समय पहले की बात है, एक साधारण मनुष्य अपने जीवन की जटिलताओं में उलझा हुआ था। वो जानता था कि उसका शरीर नश्वर है, लेकिन फिर भी वो अपनी सुंदरता, धन और शक्ति पर गर्व करता था।
वो ये भूल चुका था कि "मनुष्य का शरीर नाशवान है, पर आत्मा अमर है।"
एक दिन यह शरीर मिट्टी में मिल जाता है, लेकिन आत्मा फिर किसी नए शरीर में प्रवेश कर जीवन चक्र को आगे बढ़ाती है।
संसार का सबसे बड़ा सत्य क्या है?
> "मृत्यु और परमात्मा – यही दो सत्य हैं, बाकी सब माया है।"
फिर भी, मनुष्य अपने जीवन को जैसे स्थायी मान बैठा है। वह इस भ्रम में जी रहा है कि सबकुछ उसी के नियंत्रण में है। वह मोह और माया में इतना उलझ चुका है कि उसे यह भी याद नहीं कि यह मानव शरीर उसे अनेक जन्मों के पुण्य कर्मों के फलस्वरूप प्राप्त हुआ है।
लेकिन, यह दुर्लभ अवसर प्राप्त होने के बाद भी, उसका जीवन किन चीज़ों में बीतता है?
घमंड,ईर्ष्या,नफ़रत,लालच,मोह
वह भूल जाता है कि किसी ज़रूरतमंद की मदद करना उसका धर्म है। ना वह किसी भूखे को रोटी देता है, ना प्यासे को पानी। उल्टा, वह अपनी सुविधाओं पर इतराता है और दूसरों के दुखों पर हँसता है।
> "किसके भरोसे हम ये सब पाप करते हैं?"
क्या सिर्फ इसीलिए कि इससे हमें थोड़ी खुशी मिलती है?
वह परम सत्य—परमात्मा—जिसे हम भूल चुके हैं, वही हमें देख रहा है।
ना उसकी आराधना, ना भक्ति, ना सेवा—हम सब कुछ भूल चुके हैं।
जीवन की ज़रूरतें क्या हैं?
> "जीवन के लिए भोजन, शिक्षा और कर्म जरूरी हैं, और मृत्यु के बाद के लिए भजन।"
पर अफ़सोस, हम ना सही भोजन करते हैं, ना उत्तम शिक्षा प्राप्त करते हैं और ना ही अच्छे कर्म करते हैं।
और जब जीवन के साथ कुछ अच्छा नहीं किया, तो मृत्यु के बाद की भक्ति और मोक्ष की आशा कैसे कर सकते हैं?
एक भजन की दो पंक्तियाँ बहुत कुछ कह जाती हैं:
> "भजन करो मस्त जवानी में, बुढ़ापा किसने देखा है?"
मनुष्य यह सोचता रहता है कि बाद में सब कर लेगा।
पर वो "बाद" कभी आता ही नहीं।और इस इंतज़ार में वह सिर्फ एक याद बनकर रह जाता है।
आज एक तरफ, मनुष्य को अपनी एक दिन की ज़िंदगी का भरोसा नहीं,
फिर भी वह तीन महीने का मोबाइल रिचार्ज पहले करवा लेता है।
> "क्यों? किसके भरोसे? बस उसी परमात्मा के भरोसे, जिसकी भक्ति उसने कभी की ही नहीं।"
ईश्वर का चालू खाता – क्रेडिट और डेबिट का लेखा-जोखा
हमारे कर्मों का एक ईश्वरीय खाता चलता है।
बिलकुल वैसे ही जैसे बैंक में होता है:
अच्छे कर्म = क्रेडिटेड , बुरे कर्म = डेबिटेड
> "परमात्मा के बैंक में हिसाब अंतिम दिन होता है, पर जमा और निकासी रोज़ चलती रहती है।"
अब सोचिए, आप अपने जीवन के खाते में क्या जमा कर रहे हैं?
रावण और विभीषण – दोनो के परिचय से तो बाकिब ही है -
आपने रावण का नाम सुना होगा—वही रावण जिसने वर्षों तप किया, अपने सिर काट-काटकर अपने ईष्ट को अर्पित किया।
परंतु एक दिन अहंकार में आकर उसने पराई स्त्री का हरण किया और अपने ईष्ट को ही भूल बैठा।
> "उसका क्रेडिट खत्म हुआ और डेबिट बढ़ गया। परिणाम – सर्वनाश।"
रावण के अंत में उसे रोने वाला कोई नहीं बचा।
जिसने इतना यश कमाया, वो बदनाम होकर मरा।
अब देखिए विभीषण को—वही रावण का भाई, जिसने अपने ही भाई का साथ नहीं दिया क्योंकि उसका मार्ग गलत था।
उसने धर्म का साथ दिया, सत्य का साथ दिया।
और वही उसे राजा बना गया।
> "जब मार्ग सत्य हो, तो परिणाम भी श्रेष्ठ होते हैं।"
निष्कर्ष:अब फैसला आपके हाथ में है—
क्या आप अपने जीवन के खाते में अच्छे कर्म (क्रेडिट) जोड़ रहे हैं?
या बस पाप (डेबिट) का बोझ जमा कर रहे हैं?
> "जीवन में किया गया प्रत्येक कर्म, अंत में परमात्मा के खाते में दर्ज होता है।"
इसलिए अभी भी समय है—जागिए, समझिए और सेवा, भक्ति और अच्छे कर्म की राह अपनाइए।
क्योंकि अंतिम दिन कोई बहाना नहीं चलेगा।
