बचपन — खुद के लिए जीने का नाम
बचपन — खुद के लिए जीने का नाम
बचपन — खुद के लिए जीने का नाम
"बचपन वो अवस्था है, जहाँ इंसान बिना किसी स्वार्थ के सिर्फ मुस्कुराना जानता है।"
बचपन, जीवन का वो पड़ाव है, जहाँ ना जिम्मेदारियाँ होती हैं, ना अपेक्षाएँ—बस होती है मासूमियत, जिज्ञासा और सच्ची खुशी। इंसान जब जन्म लेता है, तभी से उसकी चाहतों का सिलसिला शुरू हो जाता है। पहले माँ की गोद और दूध, फिर बिस्किट, टॉफी, और खिलौने। लेकिन धीरे-धीरे ये मासूम सी चाहतें समाज और परिवार की उम्मीदों में बदल जाती हैं।
जैसे-जैसे बच्चा बड़ा होता है, मां चाहती है कि उसका बेटा सबसे सुंदर और तंदुरुस्त दिखे। पिता चाहते हैं कि वह कक्षा में पहला स्थान लाए। इसी तरह हर रिश्ते के साथ उसकी चाहतें बदलती जाती हैं। अब वो बच्चा अपने सपनों से दूर, सिर्फ दूसरों की उम्मीदों को पूरा करने की दौड़ में शामिल हो जाता है।
"जो बचपन में हँसते हैं, वही बड़े होकर सबसे गहराई से समझते हैं कि असली खुशी क्या होती है।"
धीरे-धीरे वो एक पहचान से हटकर सिर्फ भूमिकाओं में सिमट जाता है—कभी बेटा, कभी भाई, कभी पति और फिर पिता। हर भूमिका में वह किसी और के लिए जीता है, लेकिन अपने लिए नहीं। इसी जीवन की भागदौड़ में वो अपना बचपन कहीं पीछे छोड़ देता है।
पर क्या हम सबने कभी सोचा है — आख़िर कब जीते हैं हम सिर्फ अपने लिए?
"ज़िन्दगी की दौड़ में शामिल होना ज़रूरी है, लेकिन कभी-कभी बचपन की गलियों में लौटना भी उतना ही अहम है।"
बचपन ही वो समय होता है जब इंसान सच्चे अर्थों में अपने लिए जीता है। उसके बाद की ज़िन्दगी सिर्फ जिम्मेदारियों और अपेक्षाओं का बोझ बन जाती है। और इस बोझ की सबसे बड़ी वजह—पैसा।
जी हाँ, वही पैसा, जिसकी क़ीमत है तो कुछ भी नहीं, लेकिन उसके बिना भी कुछ नहीं। इंसान पूरी उम्र उसी के पीछे भागता है, पर जब दुनिया छोड़कर जाता है, तो वही पैसा उसकी छाती पर रख दिया जाता है—जिसे वह छू भी नहीं पाता।
"पैसा जरूरी है, लेकिन उससे भी जरूरी है वो पल, जो खुद के लिए जिए जाते हैं।"
इसलिए जरूरी है कि हम थोड़ी ज़िन्दगी अपने लिए भी जिएं। थोड़ा समय उस बचपन के लिए भी निकालें, जो अब भी हमारे भीतर कहीं छुपा बैठा है।
