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Plaban Choudhury

Horror Thriller

3  

Plaban Choudhury

Horror Thriller

मन का डर

मन का डर

2 mins
193

यह एक अंधेरी और सुनसान रात थी। चारों तरफ सन्नाटा फैला हुआ था। घड़ी की सूइयाँ रात के 12 बजा चुकी थीं। मैंने रोज़ की तरह खाना खाया और अपने बिस्तर पर सोने के लिए चला गया। धीरे-धीरे मेरी आँख लगने लगी और तभी मुझे ऐसा महसूस हुआ जैसे किसी ने मुझे हिलाकर जगाने की कोशिश की। मैं हड़बड़ाकर उठा, लेकिन कमरे में कोई नहीं था। कमरे में अजीब सा सन्नाटा था। मैं सोच में पड़ गया कि घर में तो मैं अकेला हूँ, फिर मुझे किसने उठाया? मैंने इसे अनदेखा किया और पानी पीकर वापस सोने की कोशिश करने लगा। 


कुछ समय बाद अचानक मेरे फोन की घंटी बजी। जब मैंने देखा तो किसी अनजान नंबर से कॉल आया था। घड़ी में रात के 2 बज रहे थे। मैंने सोचा कि शायद कोई जरूरी कॉल है, इसलिए मैंने वापस उस नंबर पर कॉल किया। लेकिन फोन से आवाज आई, "यह नंबर उपलब्ध नहीं है।" मेरे मन में अजीब सा डर समाने लगा। जिस नंबर से मुझे कॉल आया था, वही नंबर अब उपलब्ध नहीं था। मैं थोड़ा घबरा गया।मैंने सोचा शायद कोई तकनीकी खराबी हो, लेकिन फिर से कॉल किया, और वही आवाज आई। अब डर मेरे ऊपर हावी होने लगा। मैंने इसे नजरअंदाज करते हुए फिर से सोने की कोशिश की। लेकिन मेरी नींद बार-बार टूट रही थी। 


हर बार कुछ अजीब महसूस हो रहा था, जैसे कोई मेरे आस-पास ही मौजूद हो। घड़ी रात के 2:30 से 3 के बीच की ओर बढ़ चुकी थी। डर इतना बढ़ गया कि मैंने अपना फोन उठाया और गाना सुनने लगा ताकि खुद को शांत कर सकूँ। लेकिन तभी मेरे घर की लाइट्स अजीब तरीके से जलने-बुझने लगीं। जैसे कोई शक्ति वहां मौजूद हो। मैं घबराकर उठ बैठा। मेरा पूरा शरीर पसीने से तर हो चुका था। दिल की धड़कन तेज हो गई थी। 

तभी मुझे याद आया कि मैंने सोने से पहले एक डरावनी फिल्म देखी थी। शायद इसी कारण से यह सब मेरे साथ हो रहा था। मैं अब थोड़ा शांत महसूस कर रहा था। फिर मुझे समझ में आया कि ये सब सिर्फ मेरे मन का डर था, जो मेरे दिमाग में खेल खेल रहा था।


कहते हैं कि:

"जब तक डर से डरते रहोगे, डर तुम्हें तब तक डराता रहेगा। इसीलिए डर को डराना सीखो, तब देखना, डर भी तुम्हें कभी और नहीं डरा पाएगा।"


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