राजकुमार कांदु

Tragedy Classics Crime


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राजकुमार कांदु

Tragedy Classics Crime


मिलन

मिलन

7 mins 200 7 mins 200

अमर ने पहली बार उसे देखा तो देखता ही रह गया था। सफ़ेद सूट के साथ ही शुभ्र धवल दुपट्टा उसकी खूबसूरती में चार चाँद लगा रहा था। हवा के तेज झोंके की तरह वह आई और उसे अपने प्रेम रस में डूबोकर वह उसकी आँखों से ओझल हो गई। राकेश ने अमर को टोका ," चल चल ! गई वो ! उसके बारे में जान जाएगा तो पलट कर देखेगा भी नहीं उसकी तरफ ! " 

 " अच्छा ! तू जानता है उसे ? मुझे भी बता न ऐसा क्या हुआ जो कोई उसकी तरफ पलट कर भी नहीं देखेगा ? "अमर ने अपने मित्र राकेश से जवाबी सवाल दाग दिया।

उसके साथ चलते हुए राकेश ने बताया ," इस लड़की का नाम रजनी है। तीन साल हो गए हैं उस मनहूस घडी को जब कुछ गुंडे दिनदहाड़े इसे रास्ते पर से कार में उठा ले गए थे। चलती कार में चारों ने इसके साथ मुँह काला किया था।" 

" तो इसमें रजनी का क्या दोष है कि उससे नफ़रत की जाय ? " अमर ने पूछा। 

 " यहाँ तक तो ठीक है। लेकिन जब यह मामला मीडिया के संज्ञान में आया और चैनल वालों ने इसका इंटरव्यू लेना चाहा तब उनके समझाने के बावजूद इसने खुद का चेहरा कैमरे के सामने भी यूँ ही खुला रखा। उनसे बहस करती रही और कहती ' मैं क्यों अपना चेहरा छिपाऊँ ? चेहरा तो गुनाहगारों को छिपाना चाहिये। पहले तो कुछ सिरफिरे बदचलन लड़कों द्वारा मुझसे जबरदस्ती बलात्कार किया गया और अब ऊपर से ये समाज के ठेकेदार मुझसे सहानुभूति दिखाने के नाम पर मेरी अभिव्यक्ति की आजादी भी छीन लेना चाहते हैं ? तो मैं पूरे देश को बता देना चाहती हूँ कि मैं वो लड़की नहीं जो खामोश रहकर सब सह ले। मैं अपना मुँह नहीं छिपाऊँगी। मैं मजबूर कर दूँगी उन बदमाशों को अपना मुँह छिपाने के लिए जिन्होंने मेरे साथ ये जुल्म किया है। ' 

कोई उससे कहता भी कि ' अरे तुम लड़की जात हो' तो उसको तपाक से जवाब देती ' लड़की होना कोई गुनाह है क्या ? ' अगर आगे बढ़कर कोई कह देता कि ' अरे तुम्हें अपनी इज्जत खुद से बचाकर रखनी चाहिए। जितना ज्यादा शोर मचाओगी बदनामी तुम्हारी ही होगी। कोई भले घर का लड़का शादी भी नहीं करेगा। ' तो उसका जवाब होता ' तो क्या हुआ कोई शादी नहीं करेगा ? वैसे भी मैं कहाँ शादी के लिये मरी जा रही हूँ ? और ये बदनामी मेरी क्यों होगी ? क्या मैंने कुछ गलत किया है ? ' 

और आज देखो ! इसके बूढ़े माँ बाप इसकी शादी के लिये परेशान हैं और एक ये है कि ऐसी हालत में भी इसने इसे देखने आनेवाले कई लड़कों को अपने घर से भगा दिया है। अब तुम्हीं बोलो ! कौन होना चाहेगा ऐसी लड़की के करीब ? " कहकर राकेश खामोश हो गया था।

अमर के दिमाग में उस लड़की की ही तस्वीर घूम रही थी।' सुंदर और चाल चलन में नेक होने के बावजूद समाज में उसके लिए नफ़रत है सिर्फ इसलिए क्योंकि उसने सही बात की थी ? बहुत गलत हो रहा है उसके साथ ! पहले ही क्या कम गलत हुआ है उसके साथ ? और अब समाज के ये तथाकथित ठेकेदार उसकी मुश्किलें ही बढ़ा रहे हैं। काश ! मैं कुछ कर पाता उसके लिये ! ' बहुत देर तक अमर के मन में ये विचार घुमड़ते रहे। 

अगले ही दिन वह फिर दिखी थी उसे अपने ऑफिस स्टाफ की कैंटीन में। एक कोने वाली टेबल के साथ बैठी वह शायद अपने खाने का इंतजार कर रही थी। उसके सामने की कुर्सी पर अमर भी जाकर बैठ गया। 

" हाय ! मैं अमर ! इस ऑफिस में नई जॉइनिंग है ? " 

" हाँ ! " 

" क्या नाम है आपका ? " 

" क्यों बताऊँ मैं अपना नाम ? आप कौन होते हैं यह सब पूछने वाले ? "

मुस्कुराया था अमर " बस ! यूँ ही ! सोचा हम साथ ही काम करते हैं तो एक दूसरे को जान लें ! खैर कोई बात नहीं। शायद आपको बुरा लगा। सॉरी ! " बोलकर अमर वहाँ से उठने का प्रयास करने लगा। 

" अरे नहीं सर ! सॉरी की जरुरत नहीं ! मुझे बुरा नहीं लगा। लेकिन जिंदगी के तजुर्बों ने मुझे सावधान रहना सीखा दिया है। मेरा नाम रजनी सक्सेना ! कल ही यह ऑफिस ज्वाइन की हूँ। " कहकर वह हौले से मुस्कुराई और आगे बोली ," और कहीं आपने मेरे बारे में इससे अधिक जान लिया तो औरों की तरह आप भी मुझसे पीछा छुड़ाने के बहाने खोजने लगोगे। " और फिर वह हँस पड़ी थी। एक उन्मुक्त हँसी , निर्मल निर्छल ! 

" मैं आपके बारे में सब कुछ जानता हूँ रजनी जी ! "

अमर के मुँह से यह सुनकर रजनी हैरान रह गई ," और फिर भी आप मुझसे बात कर रहे हैं ? घोर आश्चर्य ! अरे आप भी बदनाम हो जायेंगे ! " 

" अरे नहीं रजनी जी ! मैं तो आपकी बहादुरी का कायल हूँ और इसलिये आपका प्रशंसक भी हूँ ! "

 " आज मुझे आपसे मिलकर बड़ी खुशी हुई। कोई तो है इस दुनिया में जिसने मेरे जज्बातों को समझा , मेरी भावनाओं की कद्र की। बहुत बहुत धन्यवाद ! क्या हम दोस्त बन सकते हैं ? "

" क्यों नहीं रजनी जी ? आपका बहुत बहुत धन्यवाद जो आपने मुझे अपनी दोस्ती के काबिल समझा ! " 

" एक बात और आपसे निवेदन है। मैं खुले विचारों की लड़की हूँ और मेरी सोच है कि मित्रता में फॉर्मेलिटी जितनी कम हो बेहतर। आप मुझे रजनी जी नहीं सिर्फ रजनी और तुम कहकर बुलाएँगे। आपसे बहुत छोटी हूँ इसलिए मुझे अच्छा लगेगा।" 

कहते हुए रजनी मुस्कुराई थी। 

 " हाँ ! शायद तुमसे पाँच या छह साल बड़ा हूँ मैं ! "कहते हुए अमर भी खुलकर हँस पड़ा था। 

उस दिन के बाद उनकी बातों का सिलसिला चल पड़ा। रजनी और किसी से बात नहीं करती। लंच ब्रेक के समय दोनों यहीं कैंटीन में बैठकर कुछ देर बातें कर लेते। रजनी बहुत खुश थी अमर का साथ पाकर। एक दिन बातों ही बातों में उसने बताया " उस हादसे के बाद उसके लिए कई रिश्ते आये लेकिन उसकी सच्चाई पता चलते ही सभी नकार देते। इसी दौरान एक लडके से उसकी दोस्ती हो गई। एक दिन एक सुनसान जगह पर मौका देखकर उसने हद से आगे बढ़ना चाहा। मेरे इंकार करने पर कहने लगा ' तुम्हें क्या फरक पड़ता है ? चार की बजाय पाँच समझ लेना ! ' उसे कसकर एक तमाचा मारकर मैं उस दिन चली तो आई लेकिन बहुत फूटफूटकर रोइ थी मैं उस दिन। एक लड़की के बारे में किसी की सोच इतनी घृणित कैसे हो सकती है ? "

मैनेजर के जन्मदिन की ख़ुशी में केक काटने व शुभकामनाएं देने के बाद पूरे स्टाफ को आज छुट्टी दे दी गई थी। अमर रजनी से बोला ," चलो ! आज तुम्हें कुदरत का एक खूबसूरत नजारा दिखा लाता हूँ ! " रजनी ख़ुशी से चहकते हुए बोली ," चलो ! कुदरत से तो मुझे विशेष प्रेम है। "

 शहर से दूर एक बड़ी सी झील के किनारे दोनों पहुँच गए। रजनी ने देखा। वाकई बहुत खूबसूरत नजारा था। किसी बड़ी दरिया के समान दूर तक फैली अथाह जलराशि और उसी के किनारे एक विशाल पेड़ से लटक रहा था एक झूला ! अमर उस झूले पर बैठ गया और दूर देखते हुये कहीं खो सा गया। रजनी जो कि अब तक उसके बगल में खड़ी थी , बोली " क्या हुआ अमर ? कहाँ खो गए ? "

 दर्द सिमट आया था अमर के चेहरे पर। बोला " यहाँ मेरा एक अतीत है रजनी ! रश्मि नाम था उसका ! तुम्हारी ही तरह बेहद खूबसूरत ! हम एक दूसरे से बहुत प्यार करते थे। मेरी तब तक कहीं नौकरी नहीं लगी थी और यही बहाना बनाकर उसकी शादी किसी और लडके से तय कर दी गई थी। उस दिन कई दिनों बाद वह मुझे मिली थी और रो रो कर मुझे यह सब बताया था लेकिन मैं क्या कर सकता था ? मजबूर और बेबस था मैं ! यहीं इसी झूले पर बैठे मुझसे बातें करते हुए वह अचानक उठी और इससे पहले कि मैं कुछ समझ पाता उसने वो जो दायीं तरफ का किनारा है न वहां पानी में छलाँग लगा दी। वहाँ पानी बहुत गहरा है। मैं चाहकर भी कुछ नहीं कर सका। उसने जान दे दी थी। उसका यह पलायन मुझे पसंद नहीं आया। " एक पल के लिए अमर रुका। रजनी इसी दौरान कब आकर उसके बगल में झूले पर बैठ गई उसे पता ही नहीं चला। अमर ने आगे बताया " मेरा मानना है कि यह जीवन अनमोल है और हमें इसे किसी भी कारण से यूँ ही नहीं गँवा देना चाहिए। अगर उसने आत्महत्या नहीं की होती तो हम सोच समझ कर कोई बेहतर फैसला कर सकते थे और शायद आज सुख से जी रहे होते। हमें हर स्थिति का डटकर मुकाबला करना चाहिए ! " 

 " वही तो मैं कर रही हूँ अमर ! डटकर मुकाबला ! " कहते हुए पास बैठी रजनी ने अपना सिर उसके कंधे पर टिकाकर अपनी स्वीकृति का संकेत दे दिया। अमर ने भी उसका ईशारा समझ अपनी बाहों का घेरा उसकी कमर के गिर्द कस दिया। विचार तो उनके मिल ही रहे थे आज उनके दिल भी मिल गए तन मन के मिलन का वादा करते हुए।


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