Sonam Gupta

Tragedy


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Sonam Gupta

Tragedy


“मेरे दो पिताजी, एक बड़े एक छोटे"

“मेरे दो पिताजी, एक बड़े एक छोटे"

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मैं जहा खड़ी थी , वहां दो भाई साथ थे एक मेरे पिता तथा एक मेरे पिता के बड़े भाई ।आसपास का माहौल अशांत था क्योंकि :- बस का आना स्वपन- सा लग रहा था । मैं उनके पास खड़ी उनसे बात कर रही थी , वो भी मुझे सुन तथा सुना रहे थे । उन्होंने मुझसे बात की तथा पूछा भी कहां जाओगी ? मैने उन्हे बताया तथा उनसे भी पूछा कि वो कहां जाएंगे।


आसपास का माहौल अशांत था , बस के इंतजार में ! पर मुझे इन दोनों भाइयों के बीच शांति - सी नजर आ रही थी । ना मेरे पिताजी ने अपने सबसे बड़े भाई से बात की , ना मेरे बड़े पिताजी ने अपने सबसे छोटे भाई से बात की।इन दोनों भाईयो के बीच की शांति मुझे काटो की तरह चुभ रही थी , मेरा मन खुद से अनेक सवाल किए जा रहा था , वो सोच रहा था कि मै पूछूं अपने पिताजी से क्या उन्होंने बात की अपने बड़े भाई से ?


पर मेरा ये बावला मन पूछ ना सका ये सवाल । एक चुभन सी लग रही थी दिल में क्यों ? आखिर क्यों !! क्यों नहीं की दोनों ने एक दूसरे से बात ?

‌मेरा मन इन दोनों की शांति को देख बौखला - सा गया था , ऐसा लग रहा था मानो जवानी में आकर ये अपने बचपन के प्यार भरे रिश्तों को भूल गए है , ये भूल गए है कि - किस तरह ये बचपन में साथ खेलते थे खिलखिलाते थे। पर आज !! इन दोनों ने एक शब्द तक नहीं बोला ना पूछा :- भैया कैसे हो ? बच्ची को छोड़ने आया हूं । इस प्रकार के कोई प्रश्न तक नहीं पूछे गए । एक दूसरे को देखा और अनदेखा कर दिया । आज मैने देखा जवानी बचपन छीन लेती है , जुड़ते हुए रिश्ते प्यार छीन लेते है । आज मेरे समाने वो दो भाई खड़े थे जिनकी जवानी ने तथा जुड़ते हुए रिश्तों ने इनका बचपन का प्यार तक छीन लिया है।

‌अब बस का इंतज़ार ख़तम हुआ ०८:५४ हो चुके थे ।‌मेरे पिताजी ने मुझे बस में बैठाया और चले गए , पर जाते - जाते उन्होंने एक शब्द तक नहीं बोला जिसका में इंतज़ार कर रही थी । मेरे पिताजी तो मुझे बस में बैठाकर चले गए , पर मेरे एक पिताजी अभी भी मेरे साथ थे । आज मैने जाना मेरे अंदर जो गुण है मानवता के वो मेरे पिताजी के गुण तो नहीं है बल्कि वो मेरे बड़े पिताजी के गुण है जिसे मै “ पारिवारिक ” गुण बोल सकती हूं क्योकि मेरे पिताजी तो ऐसे नहीं है मानवता के पुजारी पर मेरे बड़े पिताजी है ।


‌मेरे बड़े पिताजी का गंतव्य आ गया था पर उस समय मैने उनकी अखो में वो ही अपनापन देखा जो में अपने पिताजी के आंखो में देखती हूं । जब हम दोनों बस में बैठे थे उनका पूरा ध्यान मेरे उपर ही था कि मुझे बस की टिकट लेने ना जाना पड़े आराम से बैठ जाऊं मैं , ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार मेरे पिताजी को मेरी सुविधा की चिंता होती है । उनका ग्नतव्य आते वे बस से उतरे लेकिन जाते जाते बोले मै जा रहा हूं , बिल्कुल उसी प्रकार जैसे मेरे पिताजी बोलते है।

‌शायद वो दोनो अपने आपसी मतभेदों को भूल नहीं पाए थे , जिसके कारण उन्होंने एक दूसरे से बात तक नहीं की । जिस समय वो जा रहे थे मै ने केवल अपना पारिवारिक अपनापन देखा । मै अपने बस यात्रा के दौरान केवल यही सोचती रही कि किस प्रकार बनते हुए रिश्ते बचपन के रिश्तों पे भारी पड जाते है ,जीवन में आगे बढ़ते - बढ़ते लोग एक दूसरे से दूर हो जाते है ।

‌मेरा गंतव्य आते ही मै बस से उतरी और अपने विश्वविद्यालय की ओर चल पड़ी , आज की मेरी यात्रा मुझे रिश्तों के मायने सिखा गए ।


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