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माँ बहुत परेशान रहती थी(भाग १)

माँ बहुत परेशान रहती थी(भाग १)

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माँ बहुत परेशान रहती थी । ऐसा नहीं है की मैं उनकी ये व्यथा समझता नहीं था । मैं सब समझता था, पर करता भी क्या ? समय ने मुझे कुछ यूँ जकड़ रखा था, की चाह कर भी मैं कुछ कर नहीं पा रहा था ।

मेरी अपनी भी मज़बूरी कुछ अलग ही थी । तभी समय भी सारी सीमा को लाँघ कर मानो कुछ हासिल करना चाह रहा था ।खैर घर में कुछ भी सही नहीं था, वक्त इतना मतलबी हो सकता है कभी सोचा तक नहीं था । अगर देखा जाए तो किसी की भी कोई ख़ास गलती थी नहीं, शायद सभी मेरी तरह समय के प्रकोप से जूझ रहे थे । खास कर के पापा, वो तो हमेशा से ही ऐसे थे ।

उनकी तो मज़बूरी थी जब से मैं पापा बोलने के लायक हुआ, तब से ही मैंने उन्हें बोझ को ढोता हुआ देखा है । हाँ मैं ये जानता हूँ की हर पिता का ये फर्ज होता है, पर क्या किसी पिता के लिए समय इतना बेदर्द भी हो सकता है । शायद वो १४ के भी नहीं थे जब उनके ऊपर बोझ को बिना उनके इजाजत के डाल दिया था । और अब वो ६० के हैं पर वो बोझ अभी भी वैसा ही है । अगर कुछ बदला है तो सिर्फ उस बोझ का आकार ! जो पहले छोटा था और अब मानो वही गोवर्धन पहाड़ हो ।मैंने कभी नहीं देखा उनको की वो खुश हैं, उनके चेहरा पर कोई भाव नहीं दिखता था ।

उस चेहरा के पीछे न जाने कितनी सारी ऐसी घटना थीं जो हर वक्त घटती रहती होंगी । वो खुश होते भी कैसे, कुछ वजह थी ही नहीं उनके पास ! हर वक्त वो जिंदगी के एक ऐसी किश्त को भरने की कोशिश में रहते थे, वो हमेशा जीत जाते थे अपनी उम्र और क्षमता को पछाड़ कर, पर वो किश्त कभी खत्म नहीं होती थी ।

वो अब इतना टूट गऐ थे की वो हमारी गलती करने पर हमें टोकते भी नहीं थे क्योंकि डांटते तो वो पहले भी नहीं थे । फिर उस रात को अचानक से एक अंजान हवा का झोंका मेरे घर के चौखट को लाँघ कर इस तरह से घर में दाखिल हुआ और सब को तितर -बितर कर दिया । माँ बहुत परेशान थी जब वो रात की बात मुझे फ़ोन पर बता रही थी, उसने ऐसा किया क्यों बस माँ रो-रो कर यही पूछ रही थी ।


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