लघुकथा - अपना गाँव
लघुकथा - अपना गाँव
" मैंने सपने में भी नहीं सोचा था। की जीवन में कभी इस तरह के दिन भी देखने को मिल सकते है! " सूरज ने अपने साथी राघव से कहा।
" रोजगार की तलाश में जब गाँव से शहर में आए थे। तब कितने सपने थे हमारी आँखों में , और आज ...! " कहते -कहते राघव का गला भर आता है।
" भाई ! किसे मालूम था की कोरोना नाम की महामारी आयेगी और सारे सपनों पर पानी फेर देगी।" सूरज ने राघव के हाथ में पानी का गिलास देते हुए कहा।
" बचत की राशि भी कितने दिन तक चलेगी ! सारे रास्तें बंद हैं। उस पर बढ़ता संक्रमण। अब तो शहर में जिंदा रहना भी मुश्किल लग रहा है।" राघव ने फिर चिंता व्यक्त करते हुए कहा।
" चलो ! वापस गाँव लौट चलते है।"सूरज ने आशा की किरण दिखाते हुए कहा।
" वापस गाँव में ! क्या मुँह ले कर जायेगे ? "
" अपना गाँव है भाई।
