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Savita Upadhyay

Abstract

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Savita Upadhyay

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लघुकथा - अपना गाँव

लघुकथा - अपना गाँव

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  " मैंने सपने में भी नहीं सोचा था। की जीवन में कभी इस तरह के दिन भी देखने को मिल सकते है! " सूरज ने अपने साथी राघव से कहा। 

" रोजगार की तलाश में जब गाँव से शहर में आए थे। तब कितने सपने थे हमारी आँखों में , और आज ...! " कहते -कहते राघव का गला भर आता है।   

" भाई ! किसे मालूम था की कोरोना नाम की महामारी आयेगी और सारे सपनों पर पानी फेर देगी।" सूरज ने राघव के हाथ में पानी का गिलास देते हुए कहा। 

" बचत की राशि भी कितने दिन तक चलेगी ! सारे रास्तें बंद हैं। उस पर बढ़ता संक्रमण। अब तो शहर में जिंदा रहना भी मुश्किल लग रहा है।" राघव ने फिर चिंता व्यक्त करते हुए कहा। 

" चलो ! वापस गाँव लौट चलते है।"सूरज ने आशा की किरण दिखाते हुए कहा। 

 " वापस गाँव में ! क्या मुँह ले कर जायेगे ? " 

" अपना गाँव है भाई। 


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