कुम्भकर्ण का निद्रा भंग
कुम्भकर्ण का निद्रा भंग
द्वापर युग में कौरव-पांडवों के युद्ध के समय की कहानी है, श्री कृष्ण और कुंभकर्ण की. हम सभी जानते हैं कर्ण, दुर्योधन जैसे शक्तिशाली योद्धाओं को युद्ध में पराजित करने वाले कृष्ण की वीरता को, पर क्या यह जानते हैं कि कृष्ण ने कुंभकर्ण को जगाने में भी अहम भूमिका निभाई थी?
कहते हैं, कुंभकर्ण रावण का भाई था, जो अपार शक्ति का धनी था. पर उसकी एक विचित्र विवशता थी. उसे माता अंजनी का श्राप था कि वो छह महीने सोएगा और छह महीने जागेगा. युद्ध के समय कुंभकर्ण सो रहा था. कौरवों को लगा उसकी शक्ति ही युद्ध का रुख पलट सकती है.
लेकिन उसे जगाना आसान नहीं था. कई योद्धाओं ने जगाने का प्रयास किया पर असफल रहे. तब श्री कृष्ण आगे आए. उन्होंने वीणा बजाई. मधुर संगीत जंगल में गूंज उठा. वह संगीत कुंभकर्ण के कर्णों तक पहुंचा.
कहा जाता है, वह संगीत युद्ध की ध्वनियों से अलग था. शांति और मोक्ष का मार्ग दिखाता था. कुंभकर्ण को लगा मानो स्वर्ग से कोई स्वर आ रहा है. उसकी आँखें धीरे-धीरे खुलने लगीं. जागने पर क्रोध से भरा कुंभकर्ण युद्धभूमि पर पहुंचा.
हालाँकि, कृष्ण का मकसद युद्ध को बढ़ावा देना नहीं था. वह जानते थे कुंभकर्ण का धर्मयुद्ध में कोई स्थान नहीं. उनका मधुर संगीत कुंभकर्ण को जगाने का जरिया जरूर बना, पर असल मकसद उसे युद्ध के भयावह परिणामों से अवगत कराना था.
युद्धभूमि पर पहुंचकर कुंभकर्ण ने युद्ध का विनाशकारी रूप देखा - मृत सैनिक, खून से सनी धरती. उसने युद्ध का असली स्वरूप समझा. कृष्ण के संकेत को पाकर, उसने युद्ध में भाग लेने से इंकार कर दिया.
कुंभकर्ण की कहानी हमें बताती है कि कृष्ण केवल युद्ध के नायक नहीं, बल्कि कूटनीति और दूरदृष्टि के धनी भी थे. उन्होंने परिस्थिति के अनुसार रणनीति बनाई और युद्ध को कम से कम रक्तपात के साथ समाप्त करने का प्रयास किया.
