कटहल का पेड़
कटहल का पेड़
"जल्दी जल्दी हाथ चलाओ"- दादाजी ने कहा। "सारे लोग बस पहुँचते ही होंगे"। "जी साहब" - चानू काका ने कहा। दादाजी आज बड़े खुश थे, गर्मी की छुट्टियाँ जो शुरू हो चुकी थी। वह पूरे बागान की सफाई कराने में मशगूल थे। उन्हें खबर थी कि हर साल की तरह इस साल भी उनके चारो बेटे अपने पूरे परिवार के साथ आने वाले है। उनके नन्हें मुन्ने पोते पोतियों को घर से ज़्यादा बागीचे में समय बिताना पसंद था, वहाँ पर एक कटहल का पेड़ जो था । दादाजी उस पेड़ में झूला लगा दिया करते थे। अकसर ही गर्मी की दोपहरी में वे खाट बिछा, लेट कर किताबों में खो जाते थे उधर दूसरी ओर बच्चे आपस में खेला करते तो कभी झूले के लिए लड़ाई किया करते थे। उनका सारा दिन कटहल के पेड़ के पास ही गुज़रता। बच्चों में तो दादाजी के प्राण बसा करते थे। शाम को घर के आंगन में बच्चों को कभी गीत तो कभी कहानियाँ सुनाते थे। 60 दिनों की छुट्टियाँ कैसे ख़त्म हो जाती पता भी नहीं लगता। सवेरे उठकर दादाजी और दादी न जाने कितनी ही तैयारियां किया करते थे, कभी खाने की तो कभी घुमाने की। बच्चे फिर अपने माँ- बाप को भूल जाया करते , हो भी क्यों न, उनकी दुनिया उनके दादा- दादी जो थे । धीरे-धीरे साल बीतते गए और बच्चे बड़े होते चले गए। समय के साथ जीवनशैली व्यस्त होती चली गई। गाँव कब छूटा पता भी न चला। दादी अब काफ़ी बूढ़ी हो चली थी और दादाजी इस दुनिया को अलविदा कह गए थे , सब कुछ बदल चुका था....गाँव, घर और लोग। अगर कुछ बचा था तो वह था कटहल का पेड़, न जाने कितनी यादें
खुद में समेटे और बच्चों के इंतज़ार में।.........
