Shobhit शोभित

Drama


5.0  

Shobhit शोभित

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कमबख्त इश्क

कमबख्त इश्क

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इश्क़ में क्या क्या पापड़ नहीं बेलने पड़ते हैं. तभी कहा भी गया है कि जंग और इश्क में सब जायज़ है. आगे आपको पता चलेगा की मैं ऐसा क्यों कह रहा हूँ, बात को जरा शुरू से शुरू करता हूँ.

 

मैं, विनय कुशवाह, बी कॉम की पढाई कर रहा हूँ. पढाई में अव्वल हूँ. कॉलेज में कोई भी प्रोग्राम हो, चाहे वाद-विवाद प्रतियोगिता हो या कोई नाटक मंचन या कोई संगीत नृत्य प्रतियोगिता, मेरे बिना अधूरा माना जाता है और अमूमन जीतता भी मैं ही हूँ. अगर कभी हारता भी हूँ तो ‘सोना’ से, नाम तो उसका सुनयना है पर मैं उसको सोना ही बुलाता हूँ, हरा तो वो भी नहीं सकती मुझे पर मैं ही जानबूझकर हार जाता हूँ. दिल तो पहले ही हार चुका हूँ उस पर तो फिर ये छोटी मोटी हार से कुछ नहीं होता. खैर आप समझ ही गए होंगे की कितना पोपुलर हूँ मैं कॉलेज में. कॉलेज की हर लड़की मुझ पर मरती है और मैं अपनी सोना पर.

 

मैंने अभी उसे अपने दिल का हाल बताया नहीं है, बस पेपर हो जाएँ फिर बताऊंगा उसे. जानता हूँ कि एग्जाम से पहले वो स्वीकार नहीं करेगी, चाहे जो हो जाये.

 

सोना की बात करते करते मैं आपको अपनी क्लास के ‘दिनेश कुमार’ के बारे में तो बताना भूल ही गया. दिनेश भी पढाई में अच्छा है, हमेशा उसको मेरा प्रतिद्वंदी माना जाता है पर अभी तक वो मुझे हरा नहीं सका है, थोडा मध्य वर्गीय परिवार से है तो पढाई पर ही ज्यादा ध्यान लगाता है, थोडा संकोची, दब्बू और अन्तर्मुखी भी है. हम दोनों को सब लोग अच्छा मित्र समझते हैं पर इसके पीछे कारण इतना है कि मेरी सोना का पडोसी है और दिनेश की वजह से सोना से दोस्ती करने में मुझे बहुत आसानी हुई.

 

अभी पिछले रविवार की बात है, मैंने सोना को चिड़ियाघर में मिलने के लिए बुलाया तो उसने कहा कि दिनेश को भी बुला लो, मज़ा आएगा. मेरा मन तो नहीं था पर दिनेश को भी बुलाया, हालाँकि मेरी इच्छा यही थी कि न ही आए तो अच्छा है, कम से कम मैं सोना से दिल की बात तो कह पाउँगा.

 

पर शायद नियति को कुछ और ही मंजूर था. मैं चिड़ियाघर के गेट पर दोनों का इंतज़ार कर रहा था और आया सिर्फ दिनेश. गुस्सा तो बहुत आया जब उसने कहा कि “सुनयना आ नहीं सकी, उसके घर उसकी दीदी के रिश्ते के लिए कुछ लोग आने वाले हैं तो किसी ने उसे आने ही नहीं दिया.” खैर कोई नहीं अब इस बन्दर के साथ ही घूम लेता हूँ, सोना को कभी और बुलाऊंगा.

 

दो घंटे घूमने के बाद, हम लोग चिड़ियाघर की कैंटीन में बर्गर खाने बैठ गए. मैंने जानबूझकर सोना का जिक्र छेड़ा ताकि सोना की ज़िन्दगी का ताज़ा हाल पता चल सके.

 

“एक बात बोलूं, विनय, अपने तक ही रखना तेरी मदद चाहिए.” दिनेश ने अचानक से कहा.

 

“हाँ. हाँ. बोल भाई.”

 

“यार, तुम सबसे इतना खुल के बेझिझक बोल लेते हो, मुझे भी सिखाओ.”

 

“क्यों, इस बार 26 जनवरी पर मुझे हराना है क्या?”

“अरे नहीं, तुम तो हमारी शान हो तुम्हे कौन हरा सकता है!”

 

“तो फिर?”

 

“बात कुछ और है, अपने तक ही रखना प्लीज.”

 

“अरे, अब बता भी दे. मैं नहीं कहूँगा किसी से. क्यूँ सस्पेंस बड़ा रहा है!”

 

“मैं सुनयना को प्यार करने लगा हूँ. पर उसको बताने की हिम्मत नहीं पढ़ रही. कुछ मदद कर दो प्लीज कि कैसे क्या कहूँ कि बात बन जाये.”

 

उसका यह कहना था कि मानों मेरे ऊपर राफेल ने हमला कर दिया हो. न कुछ कहते बन रहा और न चुप रह के. दिल जैसे फटने को तैयार.

 

“क्या हुआ विनय, मदद करोगे न मेरी?”

 

“हाँ, करता हूँ कुछ.” बड़ी मुश्किल से मैं बोल पाया.

 

इस बात से मैं इतना डर गया था कि दिमाग में केवल यही ख्याल आया कि यार सोना को मुझसे छीन लेगा, एक बार भी यह ख्याल मन में नहीं आया कि मैं भी अपना हाल इसको या सोना को बताऊँ. मुझे लगने लगा कि यह मेरा रकीब है और इसे रास्ते से हटाना है.

 

कोई 1 घंटा और बड़ी मुश्किल से चिड़िया घर में बिताकर मैं वापिस घर आया.

 

उस दिन से आजतक मैंने बड़े सोच विचारकर योजना बनाई कि मैं दिनेश को हमेशा के लिए रास्ते से हटा दूंगा.

 

आज हमारा पहला एग्जाम है और मैं पूरी “तैयारी” के साथ आया हूँ. कॉलेज के बाहर ही सोना और दिनेश मिल गए. एक दुसरे को शुभकामनाएँ दी गयी और दिनेश को गले मिलने के बहाने मैंने उसकी ज़ेब में कुछ पर्चियाँ डाल दी. अब बस इस बात का ध्यान रखना है कि पेपर शुरू होने तक दिनेश अपनी ज़ेब में हाथ न डाले. काम इतना मुश्किल भी नहीं, हो गया.

 

पेपर शुरू होता है. चेकिंग की टीम आती है, मैं उन्हें आँखों से ऐसा इशारा करता हूँ दिनेश की दिशा में मानों वहां पर कुछ संदिग्ध हो रहा है.

 

वो लोग दिनेश तक पहुंचकर उसे खड़े होने को बोलते हैं और इधर मेरा दिल ख़ुशी के मारे गार्डन गार्डन हो रहा है.

 

जैसे की होना ही था, पर्चे मिल जाते हैं. दिनेश बोलता भी है कि उसे कुछ नहीं पता, यहाँ तक की टीचर भी बोलते हैं कि यह तो होनहार छात्र है. पर चेकिंग टीम के अधिकारी जब कहते हैं कि क्या पता अब तक नंबर कैसे आए तो सब चुप हो जाते हैं. प्रत्यक्ष को प्रमाण की क्या जरुरत!

 

खैर, दिनेश को तो वो लोग ले ही गए, इधर हम लोग एग्जाम ख़त्म करके दिनेश की ही चर्चा कर रहे हैं. मैं अन्दर ही अन्दर खूब हंस रहा हूँ पर चेहरा देख कर कोई भी कहेगा कि कितना दुखी हूँ अपने ‘दोस्त’ के लिए.

 

सोना रो रही है, मेरे कंधे से लग के, बार बार कह रही है कि उसने कभी नहीं सोचा था कि दिनेश नक़ल करके पास होता था. मैं उसको सहारा दे रहा हूँ. उसको इतना करीब पाकर दिल हिंडोले ले रहा है और भविष्य उज्जवल दिख रहा है.

 

मैंने सोना को कहा, “शायद, इस बार वो मुझको हराना चाहता था, चाहे नक़ल ही करनी पढ़े.”

 

सोना ने सहमति में सर हिलाया.

 

आख़िर मोहब्बत और जंग में सब जायज़ है.


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