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Shishira Pathak

Drama Tragedy

4  

Shishira Pathak

Drama Tragedy

खजूर मीठे हैं

खजूर मीठे हैं

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सवेरे की गयी गायें-भैंसें जंगल से घास चर कर वापिस लौट चुकी थीं।

लौटते वक़्त उनके खुरों से कच्ची सड़क पर की गयी चोट से जो धुल उड़ी थी वो हवा में अभी तक तैर रही थी और जाकर पीपल के पेड़ के पत्तों पर बैठ सी जा रही थी, जिसके चलते गहरे हरे पत्तों का रंग हल्का हो चला था।

उन पत्त्तों से छनकर जो सुनहरे सूरज की रौशनी आ रही थी, उसमें धूल के कण हवा में अनायास ही तैर रहे थे। गायों की रंभाने की आवाज़ और उनके गले पर घंटियों की टन-टन की आवाज़ धूल के साथ हवा में तैर रही थी। गौरैयों के झुण्ड जोर-ज़ोर से चहचहाते हुए ज़मीन पर पड़ी धूल में घुस-घुस कर नहा रही थे और उनके पास ही मैना सुबह के निकले कीट-पतंगों की दावत उड़ा रही थी।

आसमान में सारस पक्षी कोण के आकार में अपने बड़े-बड़े पंखों को ऊपर- नीचे की मुद्रा में हिलाते हुए हवा में उड़ रहे थे। दूर खेत में कृत्रिम पंप के चलने की आवाज आ रही थी। गांव में बहुत सारे खजूर के पेड़ थे जिनपे रसीले खजूर लगे हुए थे। चन्दु खजूर के पेड़ पर चढ़ा खजूर तोड़ रहा था और उसका साथी नीचे खड़ा ऊपर से गिरते हुए रसीले खजूरों को या तो हवा में ही पकड़ ले रहा था या जमीन पे गिरे हुए खजूरों को आस-पास के घुमते सूअरों के झुण्ड से बचाते हुए जमा करते जा रहा था।

"लगत है कि इ बार खेजूर सब बड़ी मीठा-मीठा है, जेतना जमीनवा पे गिरल है सब के चुन ले नीचे से, एक्को गो सुअरवा सब के मुंह न लगे पारे, बड़ी मेहनत से एतना ऊपर चहड़े हैं, मार सुअरन के, उ देख हुवां कैसे झुंड में बाल- बच्चा के ले के कुक्कुर नियर खेजूर खाये खातिर घूरत है, देख रे रबिया,सब खेजूर के हम हियाँ उपरे खाई लेब, एक्को गो न देबे हम केकरो के खाये खातिर, मार ढेला भगा सब सुअरन के,हठ...हठ....।"

रवि जो चन्दु का दोस्त था वो पेड़ के नीचे जल्दी-जल्दी जो भी खजूर ऊपर से गिरता उसे अपने गमछे में रख लेता,

"तू तो चुपचापे रह, कौन दिन तोरा साथ नहीं दिए हम फल-सब्जी चोराने में, जौन पेड़ पर चहड़ गये, ऊ गाछ का पूरा फल खाली हम दुन्नो का, अब जल्दी नीचे आ, पूरा एक गमछा खेजूर जमा है, जल्दी आ, बइठ के खूब खाएंगे, हे...हे...हे...।"

चन्दु, "2 मिनिट दे हमका, एक पलक का झपकी में हम नीचे आवत हैं, ऐ...ऐ.....अगे मैया गे....हाँ... ई ले हम नीचे औउ गाछ के पूरा खेजूर तोहार गमछा में, चल रे, बड़ी भूख लगल है, कुछो न खाये हैं, ला रे खेजूर ला।"

दोनों दोस्त मिल कर खजूर की दावत उड़ा रहे थे और आपस में बातें भी कर रहे थे, "ऐ, चन्दु, खेजूर खूब्बे मीठा है रे, एकदम चीनी जैसा, मजा आ गिया रे।"

चन्दु ने बोला,"मीठ तो है, पर,तू कैसे जानत है कि चीनी जैसन मीठा है,कभियो चीनी देखा है ? बड़का नई तो, झूठठा, पेट में आग लगल है हियाँ, औउ तोरा के झूठ-झूठ बात सूझत है।"

रवि ने कहा, "तू कौन सा चीनी देखे है रे, हांके खातिर हम ही मिले का रे तोरा, तू हो तो कभी नहीं देखे है चीनी।"

चन्दु बोला, "देख नहीं तो सुन तो सकत हैं हम।"

रवि बोला, "का सुना रे ? हमनी के हो बता थोड़ा।"

चन्दु ने कहा, "अरे चीनी रे, औउ का,ओहि सुने हैं, सुने हैं कि कांच जैसन होवत है, एकदम मेही-मेही दाना जईसन, तोहरे जइसन हम हूं कभियो देखे नहीं है हे...हे...हे, पता नहीं की खावे में कैसा लागे है चीनिया, ई का ! बढ़िया आएं, बड़ी तेज न ? हमरा दिमाग चीनी में फंसा के खूब अकेले-अकेले खेजूर लील लेले बेटा तु तो, ला इधर एक्को गो नाइ देब हम, अरे बाप रे ई का है...ई गमछा ! अरे ई भी हमरे है, हमनी से सब चोरी के तरीका सीख-जान के हमनी से ही चोरी करबे तू, ला दे, हठ हियाँ से,चोट्टा...।"

रवि ने हँसते हुए कहा," हे..हे... अरे ईआर ....सब तो तोहरे है भाई..तोहरे मेहनत के खेजूर है ईआर..हे... हे....हे।" चन्दु ने पूरा गमछा छीन लिया, कुछ खेजूर खाये और सूरज आसमान में कुछ ऊपर जा चुका था। कृत्रिम पंप की आवाज हवा की दिशा बदलने के चलते इधर-उधर से आ रही थी। दूर खेतों में एक पतली सी लकीर की तरह लंबे-लंबे पर लचीले बांस तन कर खड़े दिख रहे थे, उनमें से कुछ का आसमान को चूमता छोर बार-बार, रह-रह कर जमीन की ओर झुकता था, शायद दूर कोई कुआँ था जिस से गांव के लोग बांस के एक छोर पे रस्सी बाँध कर पानी निकाल रहे थे। उनके ठीक ऊपर सूरज जगमगा रहा था और उन्हें देखने पर ऐसा प्रतीत होता था कि वे बार-बार सूरज को सलामी ठोक रहे हों।

इधर चन्दु नीम की छाँव में अपने दोनों हाथों को सर के पीछे लगा कर जमीन पे आँखे मूँद, नारंगी रंग की जांघिया पहने दाहिने पैर की एड़ी को अपने बाएं पैर के घुटने पर टिका कर लेटा हुआ था। रवि भूसे के तिनके को अपनी दांतों में दबाये हुए, एक लंगोट पहने पालथी मार कर बैठा हुआ था, तभी उसने पूछा, "घर में का बनाये है माई आज ?" चन्दु ने कहा, "का पता पकल आलू होगा।"

रवि बोला, "छिह, आलू एकदम बे-सवाद होत है, हमका नाही पसंद, कम से कम नमक तो देबे के जरूरी है ओकर में।" चन्दु बोला, "अच्छा, तोर हियाँ का बनल होगा अभी ?" रवी एक नुकीले से पत्थर को ले, जमीन पर उसकी नोक से घिसते हुए कहा, "ओहि..आलू... अउ का, 23 बरस से अलुईये तो खईये रहे हैं।अब मन नहीं लगत है आलू खाने में।"

चन्दु ने पुछा, "ई अचानक नबाबी केन्ने से आ गिया तोरा में, साला आपन मुँह देखा है कभी नदी का पानी में, साला करिया जरल अलुओ भी बढ़िया दीसत है तोरा चेचक बला मुंह से। आलूऐ सब कुछ है समझा। ओहि खाना है पूरा जिंदगी।"

रवि थोड़ा मुस्कुराते हुए बोला, "हम जो चीज खईले रहे न ऊ तो तोरा के सातो जनम में न मिलबे हाँ...।" चन्दु ने पुछा, "कोनो सर पे चोट-उट तो न लगले तोरा के रे ? कहीं पिछले जन्म के कौनो बात अभी तो नाही याद आवत है।"

रवि बोला, "धुत तोरा के, अरे पिछले जनम के नहीं एही जनम के बात है।"

चन्दु ने मजाक में बोला, "ना हम सोचली की पिछले जनम में कौनो अमीर इंसान के घर कुत्ता-उत्ता होबे तू, तो ओहि बात आभी याद आ गइले, काहे की, पिछले जनम में आदमी में पैईदा लेने के तो न कोई चानस है औ न तोर औकात है।"

रवि ने गुस्से में चन्दु की ओर मुठ्ठी भर मिट्टी फेंकते हुए अपनी नाराज़गी ज़ाहिर की। रवि बोला," हट साला,कभियो तो अच्छा बात न बोल सके है तू, पर ई जान ले हम सच बोलत हैं, का सूआद रहले रहे ऊ मुर्गी अउ भात के, आहा... खाली सोच्चे के मुँह में पानी-पानी हो जात है।

"चन्दु ने जिज्ञासा से पूछा, "कब का बात है रे, हमका नाही बोल ले तू अभी तक !"

रवि ने हँसते हुए अपना सर हिलाते हुए कहा, "ह्म्म्म... जे सुआद रहले ऊ दावत के, भगवान् करे उ बुढआ के आत्मा के सांती मिले। चन्दु ने पूछा,"को बूढ़ा रे ?" रवि बोला, "अरे, उ जो चौधरी के घरे थे ना बड़का चौधरी, ओकर मरे में मुर्गी बने रहे, ओहि खइले रहे हम, का सुआद....का...सुआद रहले रहे ओकर, बाह।"

चन्दु ने अपना सर पीटा और एक- दो कंकर उठा कर रवि को दे मारा, "मर साला, मर चोट्टा, साला उ मुर्गी खईले रहे उ दिन तू ? साला, हुआं हम भी गेल रहली रे, उ जो तू खइले रहले न उ मुर्गी समझ के उ मुर्गी-उर्गी न अलुइये के सब्जी अउ मोटका दाना बला भात रहले रे चोट्टा, अरे ई मुर्गी मानव कहा से भेटा गइले रे दद्दा, मरला पर कोई मुर्गी खिलावे है का रे गधा ? रवि बोल रहा था, "अरे का बोलत है तू ? झूठ मत बोल भरल दुपहरिया में, ई ठीक बात नइखे।"

तब तक 2-4 कंकर और मारे चन्दु ने रवि को। रवि ने कहा, "अच्छा ठीक है तू जीत गेले अब ठीक, ला दू-तीन ठो खेजूर दे तो, भूख लगत है।"

चन्दु ने कुछ खजूर निकाल कर दे दिए और पूछा, "तोर नाम के मतलब तोरा के पता है ?"

रवि ने सर हिलाते हुए ना का इशारा किया। चन्दु बोला, "तू मानुस है कि बान्दर है रे, रबी माने होवत है सूरज भगवान्,नाम तो तोर एकदम चकाचक है, लेकिन दिमाग और करम से तू तो सैतान से भी आगे है।"

रवि ने कहा, "तू का बड़का आदमी है, जो अइसन बात करत हैं हमसे ?"

चन्दु ने कहा, "हाँ हम बड़का आदमी हैं, हमरा कई ठो लोगन से जान पहचान है।" रवि ने पूछा,"जईसे कोन लोग ?" चन्दु बोला," जईसे की...बस के डलेभर साहेब,और खलासी, उ दोकान के मालिक, सब कोई हमका चिन्हे हैं।" रवि ने हँसते हुए कहा, "हाँ, कहे नहीं चिनबे तोरा के, रोज जे 1 रुपिया, 2 रुपिया खातिर उनकर आगे भीख जो मांगे है तू, हे...हे...हे.."

चंदू भी रवि की ओर देखते हुए हँस पड़ा,' हे..हे...हे,अब का करी हम।

तभी बगल के रास्ते से एक शव यात्रा जा रही थी, राम का नाम लेते हुए सब अपना सिर झुकाए चलते जा रहे थे। गांव के कुछ लोग भी उनके साथ मिल कर शमशान की ओर जा रहे थे। रवि और चन्दु भी खड़े हो गए, दोनों का एक हाथ मुँह में था और दोनों खजूर खा रहे थे। दोनों कोई ये देख रहे थे की गांव के कुछ लोग शव यात्रा में शामिल हो रहे थे। दोनों ने एक दूसरे की और देखा और खजूर फेंक कर चुपके से दोनों भी उस यात्रा में घुस गए और राम नाम जपने लगे। वो जानते थे की दाह संस्कार बाद जब सब कोई वापिस लौटेंगे तो मृत के परिवार वाले यात्रा में शामिल होने वालों को मिठाई देंगे। रवि आँख भीचते हुए और हलकी मुस्कराहट के साथ चन्दु के हाथ को दबा रहा था, उसकी खुशी रुक नहीं रही थी, चन्दु ने झटके से उसका हाथ हटाया और रोने का नाटक करने लगा, उसे देख रवि भी रोने की कोशिश करने लगा। शाम हो गई सब कोई दुखी थे, सिवाए इन दोनों के, जैसे ही मुर्दे को अग्नि के हवाले किया गया, मृतक के परिवार वाले रोने लगे, उन्हें देख कर रवि और चन्दु भी दहाड़ मार कर रोने लगे, "बाबूजी,हाय... हाय, हमको अकेला छोड़ के चले गए, अब कौन बैठेगा आपका कुर्सी पे, हाय- हाय, ई का कर दिए भगवान् रे, अच्छा नहीं किये तुम रे भगवान् रे, चन्दु जमीन पर बैठ गया और अपना सर पीट-पीट कर जोर-जोर से अगे मैय्या गे.... अगे मैय्या गे बोल कर रोने का नाटक करने लगा।

उसे देख इस लालच में की चन्दु को ज्यादा मिठाई न मिल जाये, रवि जमीन पर लेट गया और सर के बालों को नोचते हुए चिल्ला-चिल्ला कर रोने लगा," पिताजी...बापू.... हमको बी मार दो रे.... हाय पिताजी.....हाय..."

रवि उत्तेजना में धूल-मिट्टी अपने ऊपर मलने लगा,उसे देख चंदू चुप हो गया और मृतक के परिवार वाले भी चुप होकर रवि को देखने लगे। चन्दु ने थोड़े भारी स्वर में कहा, "बस-बस अरे बस कर राविया, सब हमनी के देखत है।" चन्दु रवि को पकड़ कर चुप कराने की कोशिश करने लगा और बोलेने लगा, "न रो र् बचवा, बाबूजी ऊपर खुस हैं, ऊपर से हमनी सब के देखत हैं और आशीर्वाद देत हैं बाबु, मत रो रे मत रो।"

रवि भी अचानक चुप हो गया, सब कोई शांत थे, वहां पर बस चिता की लपटों की आवाज आ रही थी। परिवार के मुखिया ने अपने आँसू पोंछते हुए गुस्से में कहा, "कौन हैं ये लोग, उठा कर बहार करो इन्हें, क्या नाटक चल रहा है क्या यहाँ पर ? मेरी माँ का देहांत हुआ है, पिताजी अभी जीवित हैं यह देखो (उसके पिताजी व्हीलचेयर पर बैठे हुए थे), मारो इनको, मुझे अनाथ बनाने के लिए आये हैं।"

कुछ लोग आए और दोनों को उठा कर मारते हुए शमशान के बाहर ले गए और जम कर उनकी पिटाई की। रात हो चली थी, दोनों कोई एक किनारे चुप-चाप बैठे थे, चन्दु अपने सर पे हाथ रख बैठा हुआ था और रवि बोल रहा था, "बड़ी मार मारे हैं सब मिल के, मीठा खाने गए थे, कुकर्मी सब से मार खा लिए रे, पीठ में कोहनी से बड़ी गदा-गद मारा है सब, बहुते दरद होवत है, अब नहाने धोने का कोनो जरूरी नहीं है, जेतना धुल मले थे सब उड़ाया दिया मार-मार क। ऐ चन्दु तू का सोचत है रे, ला तो दू-तीन गो खेजूरे दे तो, बड़ी मीठा खेजूर है।" चन्दु ने पूरा गमछा ही उठा कर रवि को दे दिया और कहा, "ले खायी ले मीठा खेजूर, एकदम मिठाई जैसा है, हाँ, खा (बोलते हुए) बाकी बाँध कर अपने पास रख लिए।



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