Girish Khatri

Tragedy


4.0  

Girish Khatri

Tragedy


ख़ामोशी

ख़ामोशी

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आज सुबह जब मैं उठा तो सूरज की धूप चारो तरफ बिखरी हुई थी और उसकी रौशनी में सब कुछ साफ़ साफ़ नज़र आ रहा था. हमारे घर की खिड़की के सामने पीपल का पेड़ हैं उस पर नज़र पड़ी तो देखा की बहुत सी नई नई और बिलकुल साफ़ चमकती हरे रंग की पत्तियाँ उसकी शाखाओं पर निकल आई थी और तभी मेरी नज़र ज़मीन पर पड़ी उसी पीपल के पेड़ की पुरानी झड़ी हुई पत्तियों पर गई जिनमे से बहुत सी अब ज़मीन से मिल गई थी जिससे ज़मीन और उन पत्तियों का रंग एक हो गया था. 


अचानक ही मेरा ख्याल ज़िन्दगी की तरफ गया. हमारी ज़िन्दगी भी तो कुछ ऐसी ही होती हैं. कभी उम्मीद और ख़ुशी से भरी बिलकुल साफ़ हरे रंग की चमकती पत्तियो की तरह और कभी ज़मीन पर पड़ी उन पुरानी झड़ी पत्तियों की तरह. इस वक़्त मेरी ज़िन्दगी कुछ उन ज़मीन पर बिखरी और झड़ी हुई पत्तिओ की तरह ही हैं. जानना चाहेंगे


मेरा नाम राघव बक्शी हैं ४५ साल का हू और दिल्ली शहर के पीतमपुरा क्षेत्र में अपनी १७ वर्षीय बेटी किरण और १३ वर्षीय बेटे श्रेय के साथ किराये के मकान में रहता हूँ. २० वर्ष की आयु से मैं अब तक कम से कम ८-९ नामी गिनामि मल्टीनेशनल और बड़े इंडियन ब्रांड की कंपनियों में कार्यरत रहा हूँ. मैने इन कंपनियों के मार्केटिंग और बिज़नेस डेवलपमेंट डिपार्टमेंट को हेड किया हैं और ऐसे कई काम करने के अवसर मुझे अपने कैरियर में मिले जो इंडस्ट्री में खुद एक मापदंड साबित हुए. लेकिन आज पिछले ३ वर्ष से मैं जाबलेस हू।  शुद्ध हिंदी भाषा में बोले तो नल्ला। ऐसा नहीं के गए ३ साल में मैने कोई काम ही नहीं किया जो भी छोटा मोटा काम मिला वह किया अपनी खुद की कंसल्टिंग और फिर एक छोटा कॉल सेण्टर भी खोला लेकिन हाथ आयी तो सिर्फ नाकामी। आमदन कुछ नहीं सिर्फ खर्चा जिससे हुआ यह कि बहुत सा क़र्ज़ मेरे ऊपर उधार चढ़ गया बैंक्स के लोन्स वग़ैरह वग़ैरह।  इतना काफी हैं जानना मेरे बारे .


अब मिलिए मेरी धरमपत्नी सुकीर्ति से। सुकीर्ति आज से डेढ़ वर्ष पहले कैंसर का शिकार हुई और उसे हमने हमेशा के लिए खो दिया।  सुकीर्ति को कैंसर था यह हमे उसके जाने से मात्र ५ महीने पहले ही एक मेडिकल चेक-अप के दौरान पता चला और सिर्फ ५ महीने के अंदर ही हमने अपनी जीवन से भरी मात्र ४० वर्षीय सुकीर्ति को हमेशा के लिए खो दिया।  सुकीर्ति को कैंसर हैं उसके पता होने से पहले तक हमारा जीवन भी कुछ उस पीपल के पेड़ की हरी भरी चमकदार पत्तियों की तरह था।  सुकीर्ति ने सब कुछ संभाला हुआ था।  कुछ कमाल की एनर्जी थी उसके अंदर छोटी सी उम्र में उसने जो कुछ ठाना वो किया।  अपना ब्यूटी सैलून खोला गाड़ी चलाना सीखा वो सब कुछ जो एक आम ग्रहणी के छोटे बच्चे होते हुए थोड़ा असंभव सा लगता हैं वो सब काम उसने किये।  उसका फेवरेट बॉलीवुड गाना था - "लग जा गले कि फिर यह हसीन रात हो ना हो...". हैरान हो गए ना आप।  शायद इसी का नाम ज़िन्दगी हैं कई बार वह सब काम जो हमे आम लगते हैं इस बात का एहसास कि वो कितने ख़ास हैं हमे बाद में होता हैं।  


सुकीर्ति के जाने के बाद ज़िन्दगी ज़मीन पर बिखरे झड़े हुए पत्तों की तरह हो गयी।  उसके जाते ही हमे अपना घर भी मेरी नौकरी ना रहने की वजह से बेचना पड़ा।  मानो जैसे सब कुछ उसका था वो थी तो सब कुछ था और उसके जाते ही सब कुछ चला गया।  रह गयी तो सिर्फ 'ख़ामोशी'. आज उसके जाने के डेढ़ साल बाद भी अकेलेपन, ख़ामोशी और उदासी से भरी ज़िन्दगी चल रही हैं. मकान में ही पड़ा रहता हूं शराब की आदत पहले भी थी सुकीर्ति के होते थोड़ा कंट्रोल रहता था उसके डर की वज़ह से।  हालांकि पहले भी जब पीता था तो पेग नहीं गिनता था कभी कभार होश भी नहीं होता था। उसके जाने के बाद तो रोज़ का सिलसिला सा हो गया हैं।  शाम होती है बोतल खुलती है कभी कभार रात से पीते पीते सुबह हो जाती है बोतल भी खत्म हो जाती है। बहुत दिल करता हैं कुछ अलग़ करने का लेकिन दिमाग काम नहीं करता क्यूंकि होशो हवास पूरे नहीं रहते। ख़ामोशी से मैं अब इंतज़ार करता हू ज़िन्दगी बदलने का या अपनी सुकीर्ति से फिर मिलने का।  और जब कुछ समझ नहीं आता फिर शाम होते ही ख़ामोशी के साथ कदम फिर मयकदे की तरफ बढ़ जाते हैं ये सोचते हुए कि आज का दिन गुज़र गया अब रात बितानी है जिसके लिए दिल और दिमाग़ का खामोश होना ज़रूरी है और सहारा सिर्फ एक बोतल में सिमट के रह गया है। 




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