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Shweta Chaturvedi

Romance

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Shweta Chaturvedi

Romance

कहानी निराली की

कहानी निराली की

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मैं निराली हूँ, उम्र २८, अरे मेरी उम्र जान कर क्या करोगे। बस अपनी निराली कहानी लिख रही हूँ, मैं वही हूँ, वही निराली जिसे सिर्फ़ एक ही बार मोहब्बत होती है। मोहब्बत की है क्या आपने? चलो आपको डायरी से एक कहानी सुनती हूँ। 

अक्सर कुछ घटनाएँ ऐसी होती हैं जिन्हें पन्नों में क़ैद कर लिया जाता है। बस फिर उन्हें दोहराते रहते हैं क़िस्से कहानियाँ मान। कुछ कहानियाँ दिल को छू जाती यूँ कि जैसे उन्हें हमने जिया हो, पता है क्यूँ ? क्यूँकि वो भावनाओं की स्याही से लिखी होती है। जिनके हर शब्द दिल के किसी ना किसी तार को छेड़ जाता है। 

बस यूँ ही हम ज़िंदगी जिए जाते हैं। कभी मन से, उत्साह से, कभी उदास, मन मार के। कभी कभी यूँ भी होता है कि पाँव ज़मीं पर टिकते ही नहीं है। ख़ुशियों का ऐसा अम्बार आता है कि दुनिया ही बदल जाती है। राहों में ज़मीं ख़ुद ब ख़ुद समर्पण कर देती है और बाहों में आसमान मचल के आ  जाता है।  

'प्यार' हाँ कभी ना कभी हो ही जाता है। ना जाने कितने ऐसे लोग होते है जो इस अहसास को जी ही नहीं पाते। और कितने ऐसे लोग होते है जो इसी भ्रम में जीते हैं कि उन्हें प्यार है। हा हा हा अगर मैंने कभी प्यार किया ही ना होता तो शायद भगवान से यही बोलती कि अगर इतना ख़ूबसूरत अहसास है तो प्यार सबको होना चाहिए, पर अब नहीं, अब तो बस एक बात दिल से निकलती है कि अगर मिलना ही ना हो क़िस्मत में किसी का तो किसी को प्यार हो ही नहीं। कोई दर्द नहीं ऐसा। जान भी चली जाती है और जान जाती भी नहीं।  

यूँ ही दौड़ता है रगों में लहू बन कर किसी का अहसास। यूँ ही हर साँस में उसके होने का अहसास बहे जाता है। दूर होकर जो रूह में समा जाता है। ज़िंदगी के किसी ना किसी मोड़ पर कोई ऐसे टकरा जाता है। 

क्या कहूँ कि सिर्फ़ सोचने भर से जिस्म को चीरते हुए रूह को झकझोर जाता है वो अहसास। और यूँ ही पलकों के किनारों से ख़ारा पानी छलक जाता है। उसे सोचना जैसे मेरी एक पल में सौ बार जान जाती है। पर प्रकृति के नियम की तरह वो मेरी धड़कन में ताल और साँसों में जीवन कि तरह बस गया है। हाँ आज भी अब भी मैं वहीं हूँ जहाँ तक साथ लाकर उसने मेरा हाथ छोड़ दिया। उसी तरह जैसे एक माँ अपने बच्चे को चलना सिखाती है। पहले हाथ का सहारा देती है फ़िर ऊँगली का और जब उसे लगता है कि अब बच्चा ख़ुद चल सकता है वो हाथ छोड़ देती है और उसके आगे चलने लगती है और बच्चा डरता है पर ये सोच कर की माँ कहीं छोड़ के ना चली जाए, भाग उठता है उसके पीछे और चलना सीख जाता है। पर मैं आज भी वहीं खड़ी हूँ जहाँ उसने छोड़ा था। छोड़ा तो उसने भी यही सोच कर कि मैं सीख जाऊँगी दुनिया के साथ चलना पर उसने छोड़ा जिस मोड़ पर वहाँ मुझे कभी दिखा ही नहीं। और मैं अपना एक क़दम भी बढ़ा ही नहीं पायी। वहीं जम गयी बर्फ़ की सिल्ली सी, और पिघलते हैं तो सिर्फ़ आँखों के आँसू। भीतर में दहकते अरमान, ऊपर बर्फ़ की ठंडक, और मन सुलग रहा है बारिश में भीगी लकड़ी सा। बस वही यादों का धुआँ। सही कहा था उसने कि मेरी क़िस्मत में सिर्फ़ वो अहसासों की धुँध और यादों का धुआँ। सब कुछ खो गया मेरा इस धुँध में, कुछ नज़र नहीं आता। काश कि मैं उसे समझा पाती, काश वो समझ पाता। कि प्यार का बंधन टूटने को नहीं जुड़ता। और अगर टूट जाता है तो वो प्यार होता ही कहाँ है। किसने कहा कि सिर्फ़ हासिल करना ही प्यार है। वो जब साथ था तब भी मुझे उससे बेहिसाब मोहब्बत थी और वो आज मेरे साथ नहीं है तो मुझे उससे बेन्तहा मोहब्बत है। फ़र्क़ सिर्फ़ इतना कि वो था तो मैं जी जाती थी हर पल और अब हर पल मैं सौ दफ़े मर जाती हूँ। ख़ुद से मोहब्बत हुआ करती हूँ और आज ये बोझ है कि नहीं ज़िंदगी और एहसान मत कर मुझ पर, अब तो बक्श दे। ना जाने कितने और इम्तिहान, और कितने नतीज़े। 

जानते हो कैसा अहसास है जैसे कोई मुझे मेरे सपनों की ख़ूबसूरत दुनिया में ले आया हो और मुझे एक किसी नायाब सी काँच की बोतल में बंद कर दिया हो। दम घुट रहा है मेरा और दम टूट भी नहीं रहा। सब कुछ कर के देख लिया कि भूल जाऊँ उसे पर हर कोशिश मेरी नाकाम रही, जैसे दिल धड़क रहा है। साँसे चल रही हैं। उसके ख़याल भी मुझ में बसे हैं। वही सिलसिला कि कुछ भी करते करते यूँही गला रूँध जाता है और आँखें डबडबा जाती है। सैलाब सा उमड़ पड़ता है। और मैं उस पर बेबसी के बाँध लगा के रोकती कि बह ना जाए। कि किसी के सामने मेरा ये दर्द उभर के ना आ जाए। कोई जान ना पाए मेरी हर मुस्कान जो बेतकल्लुफ़ हर जगह शोर मचाती है कहीं अंतर में कब की ख़त्म हो चुकी है। बस जब लगता है अब नहीं संभाल पाऊँगी तो बस नींद का बहाना ले तकिए सहारा ले ढक अपने चेहरे को उन्मुक्त कर देती हूँ उस खारे पानी के सैलाब को। ढूँढती की मिले कुछ तंहा पल और मैं ज़ोर से तोड़ कर सिसकियों को बस रोती ही जाऊँ। और कुछ घुटन से बाहर आ पाऊँ। जितने शब्द उतने आँसू , बिखर जाएँ। बिखर जाने दो। कोई है भी तो नहीं जो समझ पाता। मेरे आँसुओं को मोती कहाता। 

मेरे भीतर शूल ही शूल हैं, चुभन ही चुभन। घाव ही घाव, दर्द ही दर्द। धीमे धीमे मिट रही हूँ। ख़ुद के भीतर सिमट रही हूँ, छिल चुका है यूँ मेरा मन कि फिर से छुआ तो टीस टीस होगी। ये तड़प। काश किसी के हिस्से में ना आए। उसका जाना ही ठीक था . उसका ठुकराना ही ठीक था। पर उसका प्यार करना सिखना। क्यूँ बताया उसने कि प्यार होता क्यूँ है। क्यूँ करी इतनी मोहब्बत जो अब मुझ में समा ही नहीं पा रही। इस क़दर भर चुकी हूँ उसके अहसासों में के मुझ में मेरा कुछ बचा ही नहीं। मुझे ख़ाली कर के ख़ुद मेरे भीतर बस और वो कहता है कि भूल जाओ। भूल ही तो रही हूँ। हाँ भूल ही तो रही हूँ। वो सामने हो या ना हो अब फ़र्क़ ही नहीं पड़ता। वो मेरी ज़िंदगी में रहे ना रहे अब फ़र्क़ ही नहीं पड़ता। कुछ कहे या ना कहे अब फ़र्क़ ही नहीं पड़ता। मुझे उसके होने से फ़र्क़ ही नहीं पड़ता अब। फ़र्क़ पड़ता है तो इस बात से कि कैसे जी पाऊँगी इस अहसास में। वो मेरी आत्मा बन चुका है। कोई मुझे मेरी रूह से निज़ात दिला है। 

अब ये कहानी ना जाने कहाँ ख़त्म हो। फ़िलहाल आगे की कहानी फिर कभी।


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