Participate in the 3rd Season of STORYMIRROR SCHOOLS WRITING COMPETITION - the BIGGEST Writing Competition in India for School Students & Teachers and win a 2N/3D holiday trip from Club Mahindra
Participate in the 3rd Season of STORYMIRROR SCHOOLS WRITING COMPETITION - the BIGGEST Writing Competition in India for School Students & Teachers and win a 2N/3D holiday trip from Club Mahindra

Shweta Misra

Tragedy


5.0  

Shweta Misra

Tragedy


कड़वाहट

कड़वाहट

14 mins 639 14 mins 639


कई बार जिंदगी की कड़वाहट इतनी अधिक होती है कि इंसान अपना संतुलन भी खो बैठता है और गलत निर्णय लेने से भी अपने आपको नहीं रोक पाता हैl मेरे ही स्कूल की एक अध्यापिका ने अपने पति की प्रताड़नाओं से तंग आकर अपना अंत कर लिया था, इस खबर ने मुझे आज अन्दर तक झकझोर कर रख दिया था l बहुत ही सौम्य सुन्दर सुशील और बुद्धिमान थी रुचिका लेकिन उसकी नियति उसे कहाँ ले कर गयी, सोच कर मेरी पलकें गीली होती जा रही थीं उसके चेहरे में अपना ही चेहरा नज़र आने लगा था l कैसे सह गयी वो सब, मैं आज अपने अंतर्मन में खुद से ही सवाल किये जा रही थी l सवाल जवाब में एक फिल्म की भांति सब आँखों के सामने चलने लगा थाl 

प्यार सहयोग सम्मान जैसे शब्द के मायने तो मैं ब्याह के बाद ही भूल गयी थी l जान पायी थी तो बस पति की मार तिरस्कार दुत्कार और अपमानl अभी मेरी पढ़ाई ख़तम भी नहीं हुयी थी कि घर वालों के लिए मेरी शादी की उम्र निकली जा रही थी l अठारह की उम्र तक मेरी सारी चचेरी बहने ब्याह दी गयी थी l शहर के सबसे नामी और प्रतिष्ठित परिवार से होने के कारण बराबरी का रिश्ता न मिल पाना भी एक समस्या सा बना हुआ था l पिता जी को उनके मित्र ने एक रिश्ता बताया लड़का सरकारी अस्पताल में फिजिशियन था जो सताईस बरस का था और मैं उन्नीस बरस की l मेरी शादी आनन फानन तय कर दी गयी l मेरी बीएससी के फाइनल एग्जाम भी शादी के बाद हो जायेंगे कहकर मुझे मेरी आगे की पढ़ाई न रोकने का आश्वासन दे दिए गए और अगले ही महीने मेरी शादी भी कर दी गयी सारे रस्मो रिवाजों के बाद मैं ससुराल भी आ गयीl ससुराल में हफ्ते भर रहने के बाद एग्जाम के लिए वापस मायके आ गयी l एग्जाम और चचेरे भाई की शादी में तीन महीने गुज़र गये l घर में माँ पिताजी और दो भाई थे l एक दिन अचानक ही मेरी तबियत बिगड़ गयी और फॅमिली डॉक्टर को दिखाने पर मुझे मेरे माँ बनने की खबर मिलीl इस खबर ने मुझे एक अजीब सी ख़ुशी तो दी लेकिन मुझे मेरे सपने धुंधले होते नज़र आने लगे l इस खबर को सुनते ही मेरे पति ख़ुशी से फूले नहीं समाये और मुझसे मिलने आ गये फिर अपने साथ ले आये l सरकारी आवास में मैं मेरे पति और एक दो नौकर थे l मेरे पति को अस्पताल से वक़्त कम ही मिलता था इसलिए मेरे साथ के लिए मेरी सास साथ रहने आ गयी l वक़्त बीतता गया अब तक मैं दो बेटों की माँ बन चुकी थी और किसी तरह एमएससी पूरी भी कर ली l दो छोटे बच्चों को सँभालने का दायित्व बताकर आगे पीएचडी करने का ख़्वाब मुझसे छीन गया था l मैं घर और बच्चों को सँभालने में लग गयी थीl इसी बीच हमारा स्थानंतरण दूसरे जिले में हो गया और हम नई जगह आ गयेl मेरे पति देर रात जब हॉस्पिटल से लौटते तो डिनर के बाद थोड़ी शराब पीते थे और मुझसे भी साथ देने को कहते और मेरे मना कर देने पर मुस्कुराकर कहते,

'तुम पियोगी तो तुम्हारा धर्म भ्रष्ट हो जाएगा' है न l मेरे पति की बातों से या व्यवहार से मुझे मुझसे असंतुष्ट होने का संशय मात्र भी अंदेशा अब तक नहीं था l 

नई जगह पर आने के कुछ ही दिनों बाद मेरे पति के व्यवहार में मेरे प्रति बदलाव आने लगे, मैंने इसका कारण यहाँ की अत्यधिक व्यस्तता ही समझ स्वयं को दिलासे देना ही उचित समझा और कुछ ही दिनों बाद उनका व्यवहार मेरे प्रति एकदम ख़राब हो गया l किसी बात पर असंतुष्ट होने पर गरम चाय, खाना, पेपरवेट, पानी, शराब जैसी चीजों का मेरे ऊपर फेंक देना अब उनकी आदत में शामिल हो चुका था l अक्सर वजह-बेवजह उनके हाथ मुझ पर उठने लगे थे मैं कारण जानने का जब भी प्रयास करती दो चार थप्पड़ खाती और खामोश हो जाती l एक रात मैं सारे काम ख़तम करके अपने बच्चों को सुला ही रही थी कि कॉलबेल बजी बाहर जाकर देखा तो मेरे पति शराब में बुत मुझे हज़ार गलियाँ दिए जा रहे थे l आगे बढ़कर मैं उन्हें संभाल कर बेड तक ले आई उनके जूते निकाले और नशा उतरने के लिए कॉफ़ी भी ले आयीl सुबह पूरे होशो-हवास में उन्होंने मुझे मायके चले जाने को कहा l मैं अकारण बच्चों के एक्जाम के बीच मायके जाने को उचित नहीं समझ पा रही थी और वैसे भी 7-8 वर्ष की शादी में चचेरे भाई बहनों के विवाह के अलावा कभी गयी ही नहीं थी, फिर कैसे आज ??और मैंने न ही जाने का निर्णय सुरक्षित कर लिया था l

अब तक मेरा उनसे मार खाना तिरस्कार सहना मेरी नियति बन चुकी थी और मुझे अब घर के नौकरों से बेवजह अपने पीटे जाने पर शर्म भी नहीं आती थी और रोज़ रात शराब पीने के बाद घर में हंगामे का होना आम बात हो चुकी थी l दोनों बेटे सहमे से रहने लगे थे l एक रात मैं अपने पति का इंतजार करते करते बच्चों के पास ही सो गयी और ये सोचा कि किसी कारण बस मेरे पति हॉस्पिटल में ही रुक गए होंगे जैसा की किसी ज़रुरी कारण से करते भी थे, और सुबह जब अपने कमरे में पहुँची तो देखा मेरे पति हॉस्पिटल की ही एक नर्स के साथ हम-बिस्तर हैं मेरे पैरों के नीचे से ज़मीन ही सरक गयी मेरे जिस्म के एक एक घाव मुझ पर मेरी समझ पर तंज़ कसते हुए नज़र आ रहे थे और बीते सालों के हर सवाल का जवाब भी मेरे प्रत्यक्ष ही थे l मैं झट बाहर आ गयी और खुद को सँभालते हुए बच्चों को तैयार कर स्कूल को भेज दिया l बिना किसी शर्म झिझक या किसी भी ग़लती के एहसास से कोंसों दूर दोनों ब्रेकफास्ट की टेबल पर बैठ कर मुझे किसी नौकर की भांति आदेश दिए जा रहे थे मैं भी किसी स्वामिभक्त नौकर की भांति सेवा में थी l टेबल से उठते ही मेरे पति ने मुझसे कहा तुम मायके चली जाओ मैं तुम्हारी मनहूस शक्ल भी नहीं देखना चाहता, मैंने धीमी आवाज़ में कहा मैं मायके नहीं जाउंगी चाहे कुछ भी हो जाए और फिर मायके में मैं अपने घरवालों से आने का कारण क्या बताउंगी आपकी ही इज्ज़त पर धब्बा लगेगा मेरा इतना कहना ही था कि उनके लात घूंसे मुझसे मिलने लगे और जब थक गए तो किसी मरे हुए जानवर की तरह मेरे सिर के बालों से मुझे खींचते हुए घर के बाहर लाकर उठाकर पटक दिया और कहा,

"न जाने का बहाना बनाती है और मुझे इलज़ाम देती है" तभी एक नौकर मेरे बचाव में मेरे सामने आकर खड़ा हो गया और बोला कि "साहब जाने दें मेमसाब को बहुत चोट लग गयी साहब माफ़ कर दीजिए अभी कुछ उल्टा पुल्टा हो गया साहब तो...."अभी बात उसकी पूरी भी न हुयी थी कि ,'' डाक्टर त्रिपाठी अब रहने भी दो न, मान जायेगी न ये औरत आपकी बात, इतनी मार कम नहीं थी, और अब हॉस्पिटल के लिए हम लेट हो रहे हैं,"उस साधारण सांवले रंग की छोटी कद काठी अनाकर्षक नर्स ने कहा l मैं अब तक उसका नाम भी नहीं जान पाई थी l शाम को जब मेरे पति लौटे तो मैंने माफ़ी मांगते हुए कहा कि "मुझे यहीं रहने दें मैं कुछ भी नहीं बोलूंगी आप जो भी करना चाहते हैं कीजिए मैं आपके ख़ुशियों में बाधा नहीं बनूँगी l "

इतना कहते ही मेरे पति का गुस्सा सातवें आसमान पर चढ़ गया और मुझ पर लात घूंसे की बरसात होने लगी दोनों बेटे रोते और डरे हुए आकर मुझसे लिपट गए और पापा,"माँ को नहीं मारो, प्लीज, मत मारो, ऐसा कहने लगेl" अब हाथ बेटों पर भी उठ गये थे l जनवरी की ठण्ड रात में मुझे दोनों बेटों सहित घर से बाहर निकाल दिया और कहा कि "तेरी लिए इस घर में कोई जगह ही नहीं है l हम तीनों दरवाज़े पर बैठे ठण्ड से कांपते रहे सुबह जब नौकरों ने दरवाज़ा खोला तो हम अन्दर गए l ठण्ड की वजह से बेटे दोनों बुखार के चपेट में आ गये थे l बेटों को दवा दी शाम को जब मेरे पति घर लौटे तो घर खाली दिखा पूछने पर पता चला कि बेटों की तबियत ख़राब है मैं भी वहीँ हूँ l मेरे पति उस कमरे तक आ पहुँचे और उन्हें देखने के बाद हम तीनों ही फिर मार या घर से निकाले जाने के भय से कांपने लगे, लेकिन वो आज माफ़ी मांगते हुए कहने लगे "मुझे माफ़ कर दो, ना जाने कहाँ का पाप मेरे सर पर सवार हो जाता है जो मैं अपने बच्चों के साथ अपनी ही बीवी के साथ कैसा अन्याय करता हूँ मुझे माफ़ कर दो l आज लगा जैसे एक पल को दुनिया ही बदल गयी l खाना भी उसी कमरे में मंगवाया और सभी साथ खा कर सो गये l सुबह बड़ी ख़ुशी ख़ुशी हॉस्पिटल भी गये l

एक हफ्ते तक सब कुछ नार्मल रहा एक क्षण को लगा कि शायद अब ईश्वर को मुझ पर और मेरे बेटों पर उसे तरस आ गया l इतवार की शाम किरन जो वही नर्स थी अपनी कर्कश वाणी से डॉक्टर त्रिपाठी ..डॉक्टर त्रिपाठी पुकारते हमारे बेड रूम तक आ पहुंची थी मैं उसे देख स्तब्ध, उसने मुझसे बड़ी ही बतमीजी से पेश आते हुए मुझसे पूछा कि "तुम अभी तक अपने पिल्लों को लेकर गयी नहीं कब छोडोगी हमें, सरदर्द बन गयी हो, दुश्मन हो तुम हमारे सुख चैन की l" "मैं ...मैं या तुम हमारी जिंदगी में ज़हर बनी हो," मैंने किरन से कहा और तभी हाथ में शराब की गिलास लिए मेरे पति हम तक आ पहुँचे और मुझ पर बतमीजी से बात करने का आरोप देते हुए गिलास की शराब मेरे मुंह पर फेंक दिया और मुझसे माफ़ी मांगने को कहने लगे और मेरे मना करते ही मेरे ऊपर लात घूंसे पड़ने लगे l 

अब तक मैं सारे सवाल के जवाब खुद ही पा चुकी थी और मेरे पास अब सिर्फ दो ही विकल्प थे --एक कि मैं सब सहती रहूँ दूसरा सब छोड़ कर भाग जाऊँ लेकिन मैं अपने माँ पिता जी और भाइयों को किसी तरह का दुःख नहीं देना चाहती थी इसलिए मैंने सब सहने का रास्ता ही चुना l अब मेरे घर की कहानी हर ज़ुबान पर थी अब मुझे किसी से भी शर्म भी नहीं आती थी l मैंने सबको अपनी नियति मान कर खुद में सहने की हिम्मत दिन प्रति दिन बढ़ाने में जुट गयी थी और अब मेरे शरीर पर मेरे पति के साथ किरन भी हाथ साफ़ करने से ना चुकती थी l अब तक किसी को मेरे हाथ पाँव टूटने या मरने का भी खौफ न रहा नौकरों को मेरे पास जाने और दवा न देने की सख्त हिदायत थी l मैं दर्द में कई कई दिन कराहती रहती दवा और देखभाल के नाम पर दो चार जूते पड़ जाते थे l 

शादी के अब तक 12-13 वर्ष भी बीत चुके थे सब झेलते लोगों के सामने झूठ बोलते अपने जख्मों को सबकी नज़रों से छुपाते बच्चों की सहमी जिंदगी को देखते सबको मैं अपनी ही नियति मान चुकी थी और ये तसल्ली भी दे चुकी थी कि इससे मेरी मुक्ति नहीं है और एक दिन मैं अपने ही पति के हाथों से जान गवां बैठूंगीl लेकिन इन सबके बीच एक ही उम्मीद थी जो मुझे अन्दर ही अन्दर सब का सामना करने की शक्ति देते जा रही थी, वो थी मेरे बेटों की भविष्य और फिर मेरे छोटे-छोटे बेटों को अभी मेरे सहारे और देखभाल की भी बेहद जरुरत थी l जबकि मेरी शरीर पिटते पिटते ज़र्ज़र हो चुकी थी सिर के बाल खींच खींच उखड कर मुट्ठी भर ही बचे थे मेरा रंग रूप मेरी सुन्दरता मेरी काबिलियत सारी धरी की धरी रह गयी थी l

आज पिताजी का फोन आया था कि भैया की बेटी की शादी है कार्ड भी जल्दी ही पहुँच जायेगा और सभी को आना है मैंने अपने पति से बताया l मैं इन दिनों बहुत व्यस्त हूँ तुम ऐसा करो ड्राईवर के साथ हो आओ बच्चों के साथ तुम्हारा भी थोड़ा चेंज हो जाएगा, ऐसा कह कर मेरे पति कमरे से बाहर चले गए l मैंने भी दो-तीन दिन में ही लौट आने की सोच कर पैकिंग कर ली और अगले ही हफ्ते ड्राइवर के साथ चली गयी l शादी के रीति-रिवाजों में शिरकत करने पति भी बाद में आये और ज़रुरी काम का बहाना ले कर 5-6 घंटे में ही वापस आ गये l शादी के सकुशल बीत जाने के बाद पिताजी भैया ने मुझसे ज़िद करते हुए कहा कि थोड़े दिन और रुक जाऊँ वैसे भी छोटी तुझे वक़्त ही कहाँ मिलता है आने का, दोनों भाभियाँ भी यही कह कर कुछ दिनों के लिए रोक ली l पिताजी और भैया को भी किसी काम से दूसरे शहर जाना था और रास्ता मेरे शहर से ही हो के जाता था निश्चय ये हुआ कि हफ्ते भर बाद मुझे छोड़ते हुए अपने काम के लिए आगे चले जायेंगे l एक हफ्ते बाद हम सब साथ अपने पति के घर आ गये l पिताजी और भैया ने हमें हमारे सामान के साथ घर में छोड़ा और बिना पीना पीये ही आगे के शहर की और निकल गये l मैं अपने कपड़े बदलने के लिए बैग खोलने ही वाली थी कि मेरे पति किरन के साथ आये और मुझे देख मुझ पर चीखने चिल्लाने लगे मेरे कुछ न कहने पर मुझे खूब पीटा, मार पीट की आवाज़ सुनते ही दोनों बेटे मेरे पास आ गये और दो चार उन दोनों को भी लग गयी और आज फिर हमें घसीटते हुए घर से बाहर निकाल दिया और दोनों अपने बेड रूम में चले गए l मैं हमेशा की तरह दरवाज़े की सीढ़ियों पर बैठी दोनों बेटों को सीने से लगाये अपने भाग्य को कोसते हुए आँसू बहाए जा रही थी कि मैंने देखा पिताजी और भैया मेरे सामने खड़े हैं मैं अचकचा सी गयी और हैरान परेशान झट उठकर आँसुओं को छिपाते हुए दरवाज़े को खोलने का प्रयास करने लगी लेकिन भैया और पिताजी मुझे ऐसा देख समझ ही नहीं पा रहे थे कि क्या है ये सब, अभी तो सब ठीक ठाक ही छोड़ कर गए थे आखिर ये सब है क्या ??? मेरे दोनों बेटे फफक कर रो पड़े और नाना नाना कहते पिताजी से जा चिपके भैया ने भी उन्हें गोदी में उठा लिया और आँसू पोछते हुए पूछा क्या है ये सब ?? मेरे छोटे बेटे ने रोते हुए भैया से कहा ,''मामाजी पापा ने मम्मी को बहुत मारा है और पापा अक्सर ही मारते हैं जब भी किरन आंटी आती हैं पापा और ये काली वाली आंटी बहुत गन्दी है और इसी के कहने पर हम सब भूखे ही घर से बाहर कर दिए जाते हैं पानी बरसे ठण्ड रहे हम बाहर ही मम्मी की गोदी में चिपके रहते हैं और श्यामलाल अंकल(घर का नौकर) चुपके से शाल और कुछ खाने की चीज़े लाते हैं हमें यहाँ बहुत-बहुत डर लगता है l पिताजी और भैया की आँखें गुस्से से लाल हो रही थी भैया गुस्से में दरवाज़े को खटखटाने लगे और जोर जोर से मेरे पति का नाम लेकर बुलाने लगे l दरवाज़ा खोलो नहीं तोड़ देंगे, भैया ने गुस्से से कहा l 

आज अगर मेरे ज़रुरी कागज़ात यहाँ छूटे न होते तो हमें तो तुम्हारे वहशीपन का पता ही नहीं चलता, हमारे घर में रिश्ता करके हमारे साथ नाम जुड़ने से पूरा तुम्हारा पूरा खानदान खुद को धन्य समझता है और तुम ...तुम मेरे बहन के साथ ऐसा बर्ताव, किसी जानवर से भी बदत्तर, कहाँ कमी रह गयी थी हमसे या मेरी बहन से ??? तुम इतनी नीचता दिखाओगे हमने तो कभी सपने में भी नहीं सोचा था, भैया का गुस्सा इतना बढ़ गया था कि उन्होंने मेरे पति के गाल पर ज़ोर का तमाचा दे मारा , ये देख किरन सामने आ कर लड़ने लगी भैया से l पिताजी ने ज़ोर की फटकार किरन को लगायी और मेरी तरफ देखते हुए मुझसे कहा कि

"छोटी तुम अपने और बच्चों के ज़रुरी सामान लो और यहाँ से चलो हम यहाँ एक सेकेण्ड के लिए भी तुझे नहीं छोड़ेगे l तुमने बहुत सह लिया हमारे अनजाने में लेकिन अब बिलकुल भी नहीं l मैंने भी अपने सर्टिफिकेट्स और बेटों के रिजल्ट्स और उनके कुछ कापी किताब बैग में डाले और जो बैग ले कर लौटी थी वैसे ही बंद कर भैया ने गाड़ी में रखवा दिए जब हम गाड़ी तक आये तो हमारे घर के नौकर हमारे पड़ोसी जो गाड़ी के पास ही खड़े थे उन्होंने सारे हाल से भैया और पिताजी से अवगत करा दिया, उसके बाद हम सब को अपने साथ ले कर गाड़ी में बैठ गये पिताजी मेरे बगल बैठ मेरे आँसू पोछते और खुद भी रोते रहे, भैया बेटों को सँभालते रहे पिताजी ने ड्राइवर से घर वापस चलने को कहा , थोड़ी ही दूर चलने पर पिताजी और भैया ने एक ही साथ ड्राईवर को पास के ही पुलिस स्टेशन चलने को कहा, वहां पहुँच कर मेरे पति के खिलाफ रिपोर्ट लिखवाई l हम वहां के एक बड़े ऑफिसर के घर में गए और सारे हाल विस्तार से बताया वो ऑफिसर भी अपनी बेटी की तरह मुझे स्नेह दिए और मुझे मेरे बेटों मेरे भैया और पिताजी को बिना जलपान और रात्रि भोजन के आने नहीं दिया और पूरी तरह से कड़ी करवाई और हमें पूर्ण सहयोग का आश्वासन दिया, वह रात मेरी जिंदगी की आखिरी काली साबित हुयी और सुबह की फूटती किरणों के साथ मैं हर दुःख से मुक्त हो अपने मायके आ गयी l कुछ दिनों के केस चलने के बाद हमारा तलाक हो गया l मैंने पिताजी से कहकर दूसरे शहर में नये सिरे से जिंदगी की शुरुआत की l मैंने सबसे पहले अपनी पीएचडी पूरी की और यहाँ आकर बच्चों के लिए एक स्कूल खोल लिया, साथ ही दोनों बेटों की परवरिश में भी कोई कमी नहीं आने दी l वक़्त के साथ मैंने स्कूल के बाद एक गर्ल्स इंजीनियरिंग कॉलेज खोल कर स्वयं को व्यस्त रखते हुए हमेशा लड़कियों को अपने पैरों पर खड़े होने की शिक्षा देने का प्रयास किया और दोनों बेटों को उच्च पदों पर कार्यरत देख कर हमेशा ही ईश्वर का धन्यवाद l दीवार पर टंगे कैलेंडर तो पलट दिए जाते हैं लेकिन उन हर पन्नों के बीच ख़ुशियों और ग़मों के दिन भी किसी लाश की तरह दब कर रह जाते हैं l मैं भी अब उस भयावह जिन्दगी को अपनी ताकत बना कर जीने की आदत डाल चुकी हूँ और जिंदगी की ज़हर में से कुछ बूंद अमृत की तलाश में मासूम बच्चों के साथ ही जिंदगी गुज़ार रही हूँ l


Rate this content
Log in

More hindi story from Shweta Misra

Similar hindi story from Tragedy