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कौवे और मोक्ष !

कौवे और मोक्ष !

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आसमान में उड़ते कबूतरों, गिद्धों, चिड़ियों एवं कौवों के झुंड को उड़ते देखा; सपना सा प्रतीत हुआ क्योंकि मूक-मुखर एकजुट थे। मानों "दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है। "वालीउक्ति फाॅलो कर रहे हों। फिर याद आया ये तो पितृपक्ष चल रहा है। कभी कौवों के झुंड के झुंड पितृपक्ष में छतों पर, घरों की मुंडेरों पर, खाली मैदान में दिख ही जाते थे। तब मैं अक्सर सोचा करती थी कि इन अभद्र कर्कश दूतों की हलचल पितृपक्ष में बढ़ जाती है। ठीक उसी तरह जैसे चुनाव के समय राजनीतिक दल। किंतु क्या ये काग भुषंडी वंशज राजनीतिक दल की भाँति समाज और देश को अपना भोजन बनाने वाले होते हैं ? और निरुत्तर रह जाती। पर अब क्यों नहीं नज़र आते ये कग खगदल ?

शहरी करण के उत्थान एवं हरित जंगलों के पतन के चलते लोगों ने मिट्टी, लोहे और प्लास्टिक के बने चिड़िया, तोते, मोर एवं कबूतर जो सजा लिये हैं। डोर बैल, गाड़ियों के हार्न के रूप में ही बस, पक्षियों का कलरव शेष रह गया है। एक-दूसरे को दिखाने के लिये शोर मचाते हुए, हम मनुष्य अपने पक्षी प्रेमी होने का सबूत देते हैं, मगर छत पर एवं चौराहों पर दाना चुगते हुए इन पक्षियों की कम होती संख्या को पढ़ने की कोशिश करो तो; शांति संदेश के संवाहक कबूतरों को देखकर हम जान पाएँगे कि शांति की तलाश बाहर नहीं अंदर होती है। पर क्या इनका जीवन हम मनुष्यों पर निर्भर है ?या हमारे जीवन में भी इनका कोई योगदान है। आखिर सृष्टि रचयिता ने हर एक जीव को किसी न किसी उद्देश्य से बनाया है ? मस्तिष्क को बेहद घुमाने वाला प्रश्र यह उठता है कि कौवों को कोई पसंद नहीं करता काणा - काला अशुभ कहकर संबोधित करते हैं; फिर श्राद्धों में अपने पितरों की तृप्ति के लिए इन्हें ही क्यों बुला-बुला कर पूर्ण आस्था एवं विश्वास से जिमाया जाता है ?

क्या हमारे वेद पुराण अनर्गल ही ज्ञान से भरे हैं ? क्या हमारी सभ्यता संस्कृति निराधार है ? क्या हमारे ऋषि-मुनि पागल थे ? जिन्होंने पितृपक्ष में कौवों को खीर खिलाने के लिए कहा और महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि कौवों को खीर पूरी खिलाने से हमारे पूर्वजों को मुक्ति कैसे मिलेगी ?

हम भूल जाते हैं कि हमारा देश भारत विश्व गुरु रहा है। ‌हमारे ऋषि भी प्रगतिशील विचारों के थे। अगर ध्यान से समझें तो इसके पीछे विज्ञान है। जी हाँ विज्ञान! क्या आपने कभी पीपल का पेड़ उगाया है ?

या किसी को उगाते हुए देखा है ? क्या आपने पीपल और बरगद के पेड़ के बीज कभी देखें है ? जानती हूँ, जवाब होगा नहीं, क्योंकिबरगद और पीपल के पेड़ की कलम को कितनी बार भी जमीन में रोपो तो नन्हीं सी कोंपल भी न फूटेगी तो पेड़ उगने का तो सवाल ही नहीं उठता है, क्योंकि प्रकृति ने इन उपयोगी वृक्षों को उगाने की अलग रीति बनाई है। इन दोनों वृक्षों के फलों (बरबंटी) को कौवे खाते हैं और फिर उनके शरीर में एक विशेष प्रक्रिया होती है जिससे बीज तैयार होता है। इस प्रक्रिया के बिना बीज बनाने का और कोई उपाय है भी नहीं। अतःइस प्रक्रिया के बाद कौवा जहाँ- जहाँ बीट करता है वहाँ पेड़ उगने की संभावना बनती है। पीपल बहुत ही महत्वपूर्ण पेड़ है जो २४ घंटे प्राण वायु अर्थात ०२ आक्सीजन छोड़ता है और इसके औषधीय गुण भी अनेक होते हैं। अगर हमें इन वृक्षों को बचाना है तो हमें कौवों को भी बचाना पड़ेगा क्योंकि उनकी मदद के बिना पीपल का पेड़ नहीं उग पाएगा, इसलिए हमें कौवों की मदद करनी होगी इनकी प्रजाति को बचाना होगा।

अब आप फिर सोचेंगे कि श्राद्ध में कौवों को जिमाने का क्या औचित्य है ? तो सुनिए; चूँकि कौवे भादो मास में अंडे देते हैं। इनके बच्चों को तंदुरुस्त भोजन की आवश्यकता होती है। ऋषियों ने कौवों के बच्चों को हर छत पर खाना आसानी से मिल जाए उसके लिए श्राद्ध में काग भोजन की प्रथा का प्रचलन किया, जिससे कौवों की प्रजाति में वृद्धि हो। इसलिए बिना दिमाग के घोड़े दौड़ाए प्रकृति के रक्षण और पितरों के मोक्ष लिए श्राद्ध करें, एवं पीपल के पेड़ को देख कर घने वट वृक्ष की छाया को बड़े बूढों की छत्र-छाया समझकर अपने पूर्वजों को याद करें, कौवों के साथ-साथ अन्य पक्षियों की प्रजाति हेतु भी छत, गली चौराहों पर दाना पानी का इंतजाम अवश्य करें।


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