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गणेशजी की परीक्षा

गणेशजी की परीक्षा

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कल परीक्षा में बैठने से पहले एक छात्र ने बड़ी ही मासूमियत से मुझसे पूछा- मैम क्या मैं गणेश जी की छोटी सी मूर्ति अपनी टेबल पर रख सकता हूँ ? कुछ सोचते हुए उस छात्र के मूक भावों को पढ़ते हुए मैंने उसे अनुमति दे दी। पर संयोगवश विघ्नहर्ता श्री गणेश जी उस दिन उसके विघ्न हरने के मूड में नहीं थे इसलिए वह मूर्ति प्ले ग्राउंड में रखे उसके बस्ते में ही छूट गई।

बच्चा बोला मैम मेरी मूर्ति नीचे छूट गई, क्या मैं ले आऊँ ? ईश्वर के साथ उसका स्वयं में भी आत्मविश्वास बना रहे इसी उद्देश्य से मैंने उसे नीचे जाने से मना कर दिया। वह भी शांत चित्त से परीक्षा देने बैठ गया। किंतु आज जब कक्षा में परीक्षा हेतु तलाशी होने लगी तो उसने गणेश जी की नन्हीं सी मूर्ति दिखाते हुए मुस्कुरा कर कहा- मैडम इन्हें अपने सामने रख लूँ, प्लीज...।

मैंने मुस्कुराते हुए कहा रख लो अभी पेपर मिलने में समय था और वह अपनी मासूम, बचकानी व भोलेपन से लबरेज हरकतों में लगा हुआ था, पता नहीं क्यों पर विघ्नहर्ता को अपनी अँगुलियों से घिसे जा रहा था । मैंने अपने स्वभाव अनुकूल उससे कहा- बेटा उन्हें इतना भी ना रगड़ो कि कष्ट विनाशक स्वयं कष्ट में आकर दर्द महसूस करें और प्रकट होने पर मजबूर हो जाएँ। यह सुनकर सभी जोर- जोर से हँसने लगे तभी मेरा ध्यान अकस्मात ही मूर्ति के रंग पर गया और अनायास ही में बोल पड़ी प्रणिल बेटा यह विनायक जी का रंग लाल कैसे हो गया ?

वह मेरे मेरे चेहरे के भाव पढ़ने की कोशिश करते हुए बोला मैम पता नहीं पर मैंने अधिक नहीं रगड़ा था। कहीं वो मेरी बात को डाँट समझकर तनाव में न आए जिससे उसकी परीक्षा पर कोई बुरा प्रभाव पड़े, इसलिए मैंने चिंतन मुद्रा भाव मैं कहा-अरे हाँ ! बेटा कल प्ले ग्राउंड में धूप बहुत थी न और तुमने इन्हें गलती से वहीं छोड़ दिया था। शायद तेज़ धूप से लाल हो गये हमारे विनायक महाराज।सभी फिर से हँसने लगे। परीक्षा शुरू हुई उस विद्यार्थी ने भी अपनी विधि से उत्तर पुस्तिका पर लिखना आरंभ किया। कक्षा में अपनी सक्रियता दिखाने के उद्देश्य से मैंने भी पृथ्वी की तरह घूमना शुरू किया बस फर्क इतना था कि मैं गोल नहीं घूम सकती थी अन्यथा कोई नृत्य सा प्रतीत होता। 

कई चक्कर लगाने के पश्चात मैं कक्षा की मध्य पंक्तियों के मध्य पीछे जाकर खड़ी हो गई । मेरा ध्यान उस बालक पर गया वह गर्दन नीचे झुकाए धड़ाधड़ लिखने में लगा हुआ था ऐसा लग रहा था मानो शताब्दी ट्रेन की गति उसकी लेखनी में आ गई थी। तभी विनायक महाराज के भावों को देखा चेहरे पर तनाव लिए, कहीं कोई उत्तर गलत न हो जाए या भूल न जाएँ आदि किसी परीक्षार्थी जैसे स्ट्रैस में मस्तिष्क की रक्त धमनियों को अश्व की तरह दौड़ाते,मानो हल्के से हिलते प्रतीत हुए। एक हाथ में लड्डू जिसे वे तनाव के कारण खा भी ना पा रहे थे। दूसरा हाथ आशीर्वाद की मुद्रा में मानों कौरवों की राजसभा में चीरहरण होती द्रोपदी की लाज बचाने हेतु श्री कृष्ण साड़ी लंबी किए जा रहे हों और द्रोपदी नेत्र मूँदे करबद्ध गोल घूमे जा रही हो।

ठीक उसी अंदाज में आशीर्वाद वाला हाथ मानो उस बालक को उत्तर बता रहा था और उसकी कलम से उत्तर रूपी साड़ी बढ़ती जा रही थी तभी देखा अरे दो हाथ और है गणेश जी के, पर यह क्या उन दोनों हाथों की तो मुट्ठी बंद थी। पता नहीं क्यों वे दोनों हाथ मुट्ठी बंद से प्रतीत हो रहे थे मानो तनाव के मारे गणेश जी मुट्ठी खोल-भींच रहे हों, जैसे कोई स्ट्रैस बाॅल के साथ अपनी मुट्ठी को खोलता और बंद करता है ठीक उसी तरह। वहीं अपनी पूर्ण आस्था और विश्वास सहेजे वह छात्र बिना तनाव के मस्त होकर बीच-बीच में अपने खरगोश जैसे दाँतों के साथ मुस्कुरा कर कभी मेरी तरफ देखता मुस्कुराता और फिर लिखने लग जाता। 3 घंटे पूरे हुए परीक्षा भी खत्म हुई और मैं सोचने पर मजबूर हो गयी कि कौन सिखाता है इन भोले बच्चों को ये सब।


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