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Prince Goyal

Romance Inspirational

4  

Prince Goyal

Romance Inspirational

हम तुम

हम तुम

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अर्पिता अपनी छोटी सी दुनिया में खोई हुई थी। एक स्कूल की टीचर, जिसे अपनी ज़िंदगी में कभी कमी महसूस नहीं हुई थी, लेकिन अब हर सुबह उठने के बाद उसे लगता कि कुछ खो गया है। उसका जीवन दिन-प्रतिदिन की दिनचर्या से चलता था—सवेरे जल्दी उठना, चाय बनाना, फिर स्कूल जाना और बच्चों को पढ़ाना। एक दिन से दूसरे दिन का अंतर कहीं न था, लेकिन एक चुपचाप सा खौफ था उसके अंदर। यह खौफ था, जो किसी से न कह सकी थी, लेकिन महसूस करती थी कि वह अकेली है। वह अकेलापन जो कभी उसकी आँखों में नहीं आया था, आज उसे चारों ओर महसूस हो रहा था।

उसका घर अब खाली लगता था। सुबह के उजाले में भी एक अजीब सी ख़ामोशी और खामोशी का साया उसके चारों ओर था। कभी, जब वह स्कूल से लौटकर घर आती, तो उसे ऐसा महसूस होता जैसे किसी ने उसका कोई हिस्सा चुराकर ले लिया हो। दरवाजे से लेकर हर कोने तक, उसकी ज़िंदगी की कोई छाया नहीं थी। वह घर, जो कभी प्यार और हंसी-खुशी से भरा रहता था, आज बस खाली दीवारों और चुपचाप सन्नाटों का ठिकाना बन चुका था।

अर्पिता ने खुद से वादा किया था कि वह कभी भी फिर से किसी से अपनी भावनाएँ नहीं बांटेगी। कई बार उसने कोशिश की थी, लेकिन हर बार कुछ न कुछ ऐसा हुआ कि उसे ऐसा महसूस हुआ जैसे वह फिर से धोखा खा रही है। उसने अपने आप से और अपनी आत्मा से एक मजबूत दीवार बनाई थी, ताकि किसी को भी पास न आने दिया जाए। वो दीवार जितनी मजबूत होती गई, उसकी अपनी मानसिक स्थिति उतनी ही कमजोर होती गई।

स्कूल में वह अपनी जिम्मेदारियों को बखूबी निभाती थी। उसके छात्र उसे सम्मान देते थे, उसके साथी शिक्षक उससे जुड़े रहते थे। फिर भी, जब उसका दिन खत्म होता और वह घर लौटती, तो उसे ऐसा लगता कि जैसे कुछ अधूरा सा है। रात को बिस्तर पर लेटे हुए, वह घंटों अपनी आँखों को बंद कर, अपने विचारों में खो जाती। न तो उसे सोने की खुशी थी और न ही किसी नए दिन का इंतजार था। एक खालीपन था, जो धीरे-धीरे बढ़ता जा रहा था।

अर्पिता का दिल कभी किसी से बात करने के लिए नहीं चाहता था। वह जानती थी कि अब किसी के साथ संबंध स्थापित करना उसके लिए आसान नहीं था। वह अक्सर सोचती कि क्या उसकी ज़िंदगी में कभी ऐसा कोई होगा, जो उसका साथ दे सके, जो उसकी खामोशी और उसके अंदर की तन्हाई को समझ सके। लेकिन फिर वही सवाल उठता, क्या अब वह फिर से किसी पर भरोसा कर पाएगी? क्या उसकी जिंदगी में किसी के लिए जगह हो सकती थी? उसे अपनी ही काबिलियत और समझदारी पर शक होने लगा था। क्या उसने अपने लिए सही रास्ता चुना था? क्या यह अकेलापन किसी न किसी वजह से उसके पास आया था?

अर्पिता के मन में कई बार यह ख्याल आया कि क्या उसने अपना जीवन केवल दूसरों के लिए जीने की आदत बना ली थी। सालों से वह सिर्फ अपनी ज़िम्मेदारियों को निभाती आ रही थी, लेकिन क्या उसने कभी खुद को महसूस किया था? क्या उसने कभी खुद से सवाल किया था कि वह क्या चाहती है? वह अब तक अपने जीवन के हर मोड़ पर खुद को दूसरों के हिसाब से ढालती आई थी। कभी अपने माता-पिता के लिए, कभी अपने दोस्तों के लिए, कभी अपने साथियों के लिए, लेकिन क्या उसने कभी खुद से पूछा कि वह अपने लिए क्या चाहती है?

उसकी ज़िंदगी का हर दिन एक अनकहा सा बोझ बन चुका था। वह खुद को खुश रखने की कोशिश करती थी, लेकिन कभी-कभी खुद को यह समझाने में वह हार जाती थी। अपने छोटे-से कामों में व्यस्त रहकर, वह किसी तरह से अपने भीतर के खालीपन को भरने की कोशिश करती थी, लेकिन उसकी आत्मा कहीं न कहीं टूट चुकी थी।

अर्पिता के पास कोई जवाब नहीं था कि उसे क्या चाहिए। क्या वह कभी उस खालीपन को भर पाएगी? क्या वह कभी उस लड़ाई को जीत पाएगी, जो उसने अपने भीतर शुरू की थी? हर दिन वह अपने सवालों के साथ जीने की कोशिश करती, लेकिन हर दिन उसकी अनसुलझी दुविधाएं बढ़ती जाती थीं।

अर्पिता का दिल कभी भी पूर्णत: खुश नहीं था। वह इस बात से जूझ रही थी कि क्या वह अपनी ज़िंदगी को एक नए तरीके से जी पाएगी, या फिर इसी तरह अकेलेपन के साए में जीती रहेगी। उसके अंदर का खौफ, नफरत, और विश्वास की कमी धीरे-धीरे उसे एक ऐसे मोड़ पर ले आ रही थी, जहां वह खुद से भी नजदीकी महसूस नहीं कर पा रही थी।

हर दिन, जब वह अपने घर की चुप्पी में घिरी रहती, तो उसे लगता कि वह धीरे-धीरे अपनी पहचान खो रही है। लेकिन फिर भी, वह यही सोचती थी कि शायद यही उसकी किस्मत है। यही उसकी मंज़िल है। और इसी तलाश में, कहीं दूर, एक दूसरा इंसान था, जो अपने ही जीवन में खोकर, अपने सपनों के साथ जूझ रहा था।

कृष्ण को बचपन से ही सपनों और महत्वाकांक्षाओं के बीच संतुलन बनाना सिखाया गया था। वह एक छोटे से कस्बे में पैदा हुआ था, जहाँ उसकी दुनिया बहुत सीमित थी, लेकिन उसका दिल बड़ी उम्मीदों और सपनों से भरा था। छोटे से घर में जन्मे कृष्ण ने कभी भी अपने जीवन को साधारण नहीं माना। हर चीज़ में उसे कुछ खास करने की उम्मीद थी—कुछ ऐसा जो न केवल उसे, बल्कि उसके परिवार को भी गर्व महसूस कराए।

जब वह किशोर था, तब उसके भीतर एक ख़ास ताकत का अहसास हुआ था। वह किसी भी स्थिति में हार मानने वाला नहीं था। उसने अपनी मेहनत और समर्पण से कॉलेज में अच्छी पढ़ाई की, और फिर एक छोटे से बिजनेस की शुरुआत की। शुरुआत में यह बिजनेस काफी संघर्षपूर्ण था, लेकिन कृष्ण की मेहनत और दृढ़ता ने उसे सफल बना दिया। अब वह एक सफल और समृद्ध बिजनेसमैन था, जिसे हर किसी के सामने आने पर एक तरह की इज्जत मिलती थी। उसकी कंपनी की शाखाएं देश भर में फैली हुई थीं, और वह अपने कर्तव्यों को लेकर बेहद गंभीर था।

लेकिन फिर भी, कृष्ण के भीतर कुछ ऐसा था, जो उसे कभी पूरा नहीं हो पाया। बाहरी सफलता और ऐश्वर्य के बावजूद, उसकी जिंदगी में एक खालीपन था। उसे कभी भी यह महसूस नहीं हुआ कि वह किसी के साथ है—कोई ऐसा जिसे वह अपना समझ सके, जिससे वह अपनी परेशानियों को साझा कर सके। वह दिन के समय बिजनेस मीटिंग्स और पार्टियों में घिरा रहता, लेकिन रात होते ही, उसका दिल उस अजनबी अकेलेपन का शिकार हो जाता, जिसे वह कभी भर नहीं पाया। उसके पास जितना भी था, वह कभी उस लम्हे का आनंद नहीं ले सका, क्योंकि कुछ अंदर ही अंदर उसे यह महसूस कराता कि उसने कुछ खो दिया है।

कृष्ण का यह खालीपन, यह महसूसना कि वह अकेला है, कभी भी हल नहीं हो पाया था। जब उसके पुराने दोस्तों के साथ हंसी-मजाक होता या परिवार के लोग एक साथ बैठकर बातें करते, वह सब कुछ ठीक होते हुए भी अंदर से टूट-सा जाता। क्या यह सफलता उसे सचमुच खुश कर रही थी? क्या वह अपने असली प्यार को कभी पा सकेगा? कृष्ण अक्सर इन सवालों में उलझा रहता। फिर भी, उसे उम्मीद थी कि कहीं न कहीं, उसकी जिंदगी में कुछ ऐसा जरूर होगा, जो उसे संतुष्टि दे सके।

एक समय था जब उसकी जिंदगी में एक खास जगह थी, लेकिन अब वह किसी के बारे में सोचने की स्थिति में नहीं था। उसने महसूस किया कि उसकी जिंदगी की सबसे बड़ी समस्या यह थी कि वह अपनी भावनाओं से जूझ रहा था, लेकिन उसका कोई साथी नहीं था। यही वह वजह थी कि कृष्ण नये रिश्तों से दूर था। वह किसी को अपनी जिंदगी में जगह नहीं देना चाहता था, क्योंकि उसका दिल हमेशा किसी और के लिए धड़कता था—लेकिन अब वह किसी से कभी नहीं मिल पाया था, जो उस एहसास को समझ सके।

जितना कृष्ण ने अपने बिजनेस पर ध्यान केंद्रित किया, उतना ही वह अपनी भावनाओं को नकारता गया। उसने अपने अंदर के उस खालीपन को भरने के लिए पैसे और सफलता का सहारा लिया, लेकिन यह खालीपन कभी कम नहीं हुआ। उसे यह महसूस होता था कि वह केवल बाहरी दुनिया को दिखाने के लिए जी रहा था, जबकि अंदर का वह शख्स, जो सच्चाई को समझने की कोशिश कर रहा था, हमेशा अनदेखा रह जाता था।

यह स्थिति और भी जटिल हो गई जब वह रिश्तों के प्रति संकोची हो गया था। कृष्ण को लगता था कि जब तक वह अपनी भावनाओं को सही तरीके से व्यक्त नहीं कर सकता, वह किसी भी रिश्ते में खुद को पूरी तरह से खो नहीं सकता। वह किसी भी महिला से जुड़ने से डरता था, क्योंकि वह कभी किसी को खुद से जोड़ने का साहस नहीं जुटा पाया था। लेकिन फिर भी, कृष्ण को कहीं न कहीं यह उम्मीद थी कि वह अपने जीवन की एक नई दिशा पाएगा, और वह यह जानता था कि वह कुछ खास को खोजने के लिए कभी भी रुक नहीं सकता।"


अर्पिता अक्सर रविवार के दिन मंदिर जाती थी। यह उसकी पुरानी आदत थी, जिसे उसने कई सालों से निभाया था। यह उसके लिए एक ऐसी जगह थी जहां वह अपने दिल की हलचल और गहरी सोच को शांति से समझ सकती थी। आज भी, जैसे ही उसने मंदिर का दरवाजा खोला, उसकी आंखों में वही शांति थी जो उसे हमेशा यहाँ महसूस होती थी। मन्दिर में घुसी तो आशीर्वाद लेने के लिए हाथ जोड़े। हल्की सी मंदिर की गंध और धूप की मद्धम रोशनी उसे अपने आप से जोड़ने का मौका देती थी। मगर, आज कुछ अलग था। कुछ नया महसूस हो रहा था।

जब अर्पिता ने आंखें खोलीं और कुछ दूर देखा, तो उसे एक चेहरा परिचित सा लगा। वह चेहरा वह पहचानती थी, लेकिन उसे यकीन नहीं हो रहा था कि वही व्यक्ति यहाँ इस वक्त क्यों खड़ा था। कृष्ण। पाँच साल पहले वह उसका जीवन का हिस्सा हुआ करता था, और अब वह यहाँ अचानक कैसे?

कृष्ण भी चुपचाप मंदिर में एक कोने में खड़ा था, जैसे किसी गहरे विचार में खोया हो। उसकी आँखों में वही खालीपन था, जो हमेशा उसे घेरता था। जब उसकी नज़र अर्पिता पर पड़ी, तो वह थोड़ा चौंका। वह समझ ही नहीं पाया कि वह उस महिला से कहें क्या। वर्षों बाद उनकी मुलाकात थी। एक सामान्य ‘हैलो’ ही वह दोनों के बीच कहने के लिए रह गया था। अर्पिता भी उसे देखती रही, फिर धीरे से मुस्कुराई, लेकिन उस मुस्कान में कुछ खो सा था।

"तुम?" कृष्ण ने सवाल किया, जैसे उसकी आवाज़ को सुनकर ही किसी ने एक पुरानी याद जगा दी हो। "हाँ, मैं ही हूं," अर्पिता ने हल्के से जवाब दिया, और फिर दोनों खामोशी में खड़े हो गए। समय जैसे ठहरा हुआ सा था। इस लम्हे में कोई बात नहीं की, बस उन दोनों के बीच चुप्पी थी, लेकिन वो चुप्पी बहुत कुछ कह रही थी।

कृष्ण ने सबसे पहले खुद को संभाला और धीरे से बोला, "कैसी हो?" "ठीक हूं," अर्पिता ने जवाब दिया, पर उसकी आवाज़ में कोई उत्साह नहीं था। जैसे वो अपनी ज़िंदगी से जूझ रही हो, लेकिन फिर भी कुछ बताना नहीं चाहती थी।

दोनों मंदिर में खड़े रहे, कभी आसपास देख रहे थे, कभी एक-दूसरे से नजरें चुराने की कोशिश करते हुए। फिर अचानक, कृष्ण ने कहा, "तुम्हारे बारे में कुछ सुना था। अब कैसे हो?" वह जानना चाहता था, लेकिन साथ ही ये भी समझ रहा था कि यह एक सीधी बात नहीं हो सकती थी।

अर्पिता थोड़ी चुप रही। वह नहीं चाहती थी कि बातचीत गहरी हो। उन दोनों के बीच एक दूरी थी, जिसे दोनों अब तक महसूस कर रहे थे, और उस दूरी को मिटाना दोनों के लिए आसान नहीं था। फिर भी, उन दोनों के बीच एक हल्की सी कशिश थी, जैसे दोनों ने कभी कुछ ज्यादा महसूस किया हो। लेकिन ये भी इतना पुराना हो चुका था कि अब कोई फर्क नहीं पड़ता था।

"बस, अपनी दिनचर्या में हूँ," अर्पिता ने कहा। "तुम?" कृष्ण थोड़ा रुका, फिर उसने भी वैसे ही जवाब दिया, "कुछ खास नहीं। वही पुराना बिजनेस, वही रूटीन।" उसकी आवाज़ में वही सूनापन था, जो पिछले कुछ सालों से उसके जीवन का हिस्सा बन चुका था।

उनकी बातचीत में अब हल्की सी ताजगी थी, लेकिन फिर भी कुछ बहुत पुराना था, जो दोनों को घेर रहा था। "क्या हाल हैं घर-परिवार के?" कृष्ण ने धीरे से पूछा, जानबूझकर सामान्य सवाल किया ताकि ज्यादा गहरे भावनात्मक सवालों से बच सके। "सब ठीक है," अर्पिता ने साधारण सा जवाब दिया, लेकिन उसकी आँखों में कुछ और था। वह उसे और ज्यादा जानकारी देना नहीं चाहती थी। फिर अचानक, जैसे एक हल्की सी याद उसके मन में आई, "तुम्हारे माँ-बाप?" अर्पिता ने बिना सोचें पूछ लिया।

कृष्ण थोड़ी देर तक चुप रहा, फिर बोला, "माँ-पापा... वही हैं, जैसे पहले थे।" उसकी आवाज़ में कोई खास उत्साह नहीं था। वह भी जैसे अपनी दुनिया में खो चुका था। कुछ देर बाद दोनों खामोशी से मंदिर के भीतर के हल्के उजाले में खड़े रहे। हर एक सांस जैसे लंबी हो रही थी। मंदिर की घड़ी की टिक-टिक में उनके बीच का खालीपन साफ सुनाई दे रहा था। फिर कृष्ण ने धीरे से कहा, "तुम्हें कुछ साल पहले छोड़ा था, पर फिर भी... कभी सोचा नहीं था कि हम फिर से मिलेंगे।"

अर्पिता ने थोड़ा सा मुस्कुराया, लेकिन कुछ भी कहने से बची। एक लंबी खामोशी के बाद कृष्ण ने अपना मोबाइल निकाला और कहा, "शायद... हम कभी फिर बात कर सकें। क्या तुम्हारा नंबर मिल सकता है?" यह सवाल अर्पिता के लिए एक हल्की सी चौंकाने वाली बात थी। उसने कुछ देर सोचा, फिर धीरे से अपना मोबाइल नंबर कृष्ण को दिया। "ठीक है, कभी बात करेंगे।" "अगले रविवार फिर यहीं मिलेंगे?" कृष्ण ने जैसे एक मुलाकात का वादा किया।

अर्पिता ने एक हल्की मुस्कान दी, और कहा, "शायद। देखेंगे।" फिर धीरे-धीरे दोनों ने एक-दूसरे से विदा ली। एक अजीब सी चुप्पी, जो उनके बीच अब भी बनी हुई थी, धीरे-धीरे उस मंदिर के दरवाजे तक पहुंची, जहाँ उनका रास्ता अलग-अलग हो गया था। अब यह मुलाकात उनके दोनों के दिलों में एक हल्की सी उम्मीद छोड़ चुकी है। अगले रविवार के मिलने तक दोनों के जीवन में कई बदलाव आ सकते हैं। कृष्ण और अर्पिता के बीच यह धीरे-धीरे बढ़ती हुई दोस्ती और एक-दूसरे को समझने की प्रक्रिया जारी रहेगी। यह मुलाकात दोनों के अंदर एक नई ऊर्जा का संचार करेगी, लेकिन क्या वे अपनी पुरानी यादों को पीछे छोड़ पाएंगे, और क्या यह दोस्ती कभी फिर से कुछ और बन पाएगी?

   अगले रविवार को कृष्ण ने खुद को पूरी तरह से तैयार किया था, जैसे वह किसी खास मौके के लिए तैयार हो रहा हो। सप्ताह भर के इंतजार के बाद, वह आज समय से पहले मंदिर पहुंचने का मन बना चुका था। वह जानता था कि यह मुलाकात सिर्फ एक सामान्य मुलाकात नहीं होगी। यह वह पल था, जब वह अपने पुराने दिनों को फिर से जी सकता था, और शायद अपनी खोई हुई दुनिया को वापस पा सकता था।

कृष्ण ने मंदिर की ओर कदम बढ़ाए और जल्दी-जल्दी वहाँ पहुँचने के लिए गाड़ी चलाई। जैसे ही वह मंदिर के पास पहुँचा, उसने घड़ी देखी, और पाया कि वह पहले ही आ गया था। मंदिर के दरवाजे से बाहर खड़ा, कृष्ण का दिल तेज़ी से धड़कने लगा। वह अंदर गया, और धूप की मद्धम रौशनी में भगवान के दर्शन किए। फिर कुछ पल वहां खड़े होकर वह अपने दिल की शांति और उम्मीदों को महसूस कर रहा था। उसे इंतजार था—इंतजार अर्पिता का।

अर्पिता का मन आज थोड़ा उचाट था। वह अपनी रोज़मर्रा की दिनचर्या से थकी हुई थी, लेकिन कृष्ण के साथ वह जो मुलाकात कर चुकी थी, उसकी यादें अभी भी ताजगी से भरी हुई थीं। उसने निश्चय किया कि वह आज फिर से मंदिर जाएगी। शायद, कुछ घंटों का समय मिले, तो वह अपनी ज़िंदगी को फिर से एक नई दिशा दे सके। वह जानती थी कि कृष्ण से मिलना उसे अजीब सा लगा था, लेकिन साथ ही, एक रहस्यमयी आकर्षण भी था जो उसे फिर से उसकी ओर खींच रहा था।

अर्पिता ने मंदिर के पास पहुँचते ही कृष्ण को देखा, जो बड़े ही संयम से खड़ा था। वह पहले से ज्यादा एकाग्र नजर आ रहा था। जैसे ही उसकी नज़र कृष्ण पर पड़ी, उसने धीमे से मुस्कराया। कृष्ण ने भी एक पल के लिए उसकी ओर देखा, और फिर एक हल्की सी मुस्कान उसके चेहरे पर आई।

"तुम समय से पहले आ गए?" अर्पिता ने उसे देखा और कहा। "हाँ," कृष्ण ने जवाब दिया, "सोचा था कि आज तुम्हें इंतजार नहीं करना पड़ेगा।" उसकी आवाज़ में एक नयापन था, जैसे वह पहले से थोड़ा बदल चुका हो। "मैं अभी दर्शन करने जा रही हूं," अर्पिता ने कहा, और फिर मंदिर के भीतर चली गई। कृष्ण चुपचाप उसे देखता रहा। वह जानता था कि इस दिन की अहमियत उनके लिए खास है, और शायद आज वे एक-दूसरे को बेहतर तरीके से समझ पाएंगे।

अर्पिता ने भगवान के दर्शन किए, और फिर धीरे-धीरे बाहर आ गई। कृष्ण उसकी ओर बढ़ा और मुस्कुराते हुए कहा, "कैसा रहा दर्शन?" "ठीक था," अर्पिता ने हल्के से कहा। "चलो, मैं सोच रही थी, क्यों न थोड़ा बाहर पार्क में चलकर बैठें। शायद थोड़ा वक्त बिताने से, कुछ पुराने विचारों को साफ़ कर सकें।" उसकी आवाज़ में थोड़ी सी उम्मीद थी, लेकिन वह इसे खुलकर नहीं दिखाना चाहती थी।

कृष्ण ने बिना सोचे कहा, "हां, बिल्कुल।" दोनों मंदिर से बाहर निकले और पास के पार्क की ओर बढ़ने लगे। पार्क में शांति थी, हल्की सी हवा चल रही थी, और पेड़-पौधे जैसे मंद लहरों में झूल रहे थे। अर्पिता और कृष्ण धीरे-धीरे एक बेंच पर बैठ गए।

अर्पिता ने एक गहरी सांस ली और कहा, "तुमसे फिर से बात करना अच्छा लग रहा है, कृष्ण।" उसने धीरे से अपने दिल की बात कही, और कृष्ण को महसूस हुआ कि उसकी ज़िंदगी में कुछ खो गया था, जो अब फिर से वापस आ रहा था। "मुझे भी," कृष्ण ने कहा, और उसकी आंखों में कुछ अजीब सा था, जैसे वह अपनी पुरानी यादों को फिर से जी रहा हो। फिर कुछ देर तक कोई शब्द नहीं था। हवा की हल्की सी आवाज़ और पेड़ों की सरसराहट दोनों के बीच में कोई संवाद नहीं था। यह एक शांत समय था, जहां दोनों के मन में बहुत कुछ था, लेकिन शब्दों के जरिए उसे कह पाना शायद अभी भी बहुत मुश्किल था।

अर्पिता ने धीरे से पूछा, "क्या तुमने कभी सोचा था कि हम फिर से मिलेंगे?" उसकी आवाज़ में एक हल्का सा संकोच था। पार्क की बेंच पर बैठे हुए, हवा की हल्की सरसराहट और दूर से आते बच्चों की हंसी उनके बीच गूंज रही थी। कृष्ण और अर्पिता दोनों चुपचाप एक-दूसरे के पास बैठे थे। यह पल बहुत गहरा था, जैसे दोनों अपनी-अपनी यादों के बीच खोए हुए थे। कुछ समय तक कोई नहीं बोला, लेकिन फिर कृष्ण ने गहरी सांस ली और अपनी चुप्पी तोड़ी। "तुमसे कुछ बात करनी है," कृष्ण ने धीरे से कहा, उसकी आवाज़ में एक हल्की सी नर्मी थी। अर्पिता ने उसकी तरफ देखा, और उसने सिर झुकाकर जवाब दिया, "क्या बात है?"

कृष्ण ने अपने हाथों को आपस में मिलाकर धीरे से कहा, "पाँच साल पहले, जब हमारा रिश्ता खत्म हुआ, तो मुझे समझ नहीं आया था कि मैं क्या कर रहा था। मुझे लगता है, मैं तुम्हारे साथ बहुत गलत था। मैं उन पलों में सिर्फ अपने बारे में ही सोच रहा था, तुम्हारी भावनाओं को समझे बिना ही सब कुछ खत्म कर दिया।" उसकी आँखों में पछतावा था, और आवाज़ में एक गहरी कचोट महसूस हो रही थी। अर्पिता ने उसे देखा, लेकिन उसकी आंखों में कोई नफरत या गुस्सा नहीं था। वह चुपचाप सुन रही थी, मानो उसकी बातों को पूरी तरह से समझने की कोशिश कर रही हो।

"कृष्ण..." अर्पिता ने धीरे से कहा, "तुमने जो किया, वो गलत था। लेकिन तुम्हारी तरफ से जितनी गलतियाँ थीं, उतनी ही मेरी भी थीं।" कृष्ण ने चौंककर उसकी ओर देखा, "तुमने क्या गलत किया?"

अर्पिता ने गहरी सांस ली, और फिर हल्के से मुस्कुराई, "तुमसे प्यार करने की वजह से मैंने कभी अपने बारे में नहीं सोचा। मैंने अपने सपनों और अपनी ज़िंदगी के फैसले तुम्हारे हिसाब से लिए थे। और जब तुम्हारे साथ नहीं हो पाई, तो समझ में आया कि मैंने अपना खुद का रास्ता खो दिया था।"

कृष्ण की आँखों में एक अजीब सा दर्द था, जैसे वह समझ रहा था कि उसने अर्पिता से कुछ भी नहीं पूछा था, जो उसकी भावनाओं को समझने में मदद करता। "तुमने कभी मेरे बारे में नहीं सोचा?" अर्पिता ने थोड़ी देर बाद अपनी आवाज़ में हल्की चिढ़ के साथ पूछा, "या फिर तुम्हें सिर्फ अपने फैसले सही लगते थे?"

कृष्ण ने सिर झुकाया और धीरे से बोला, "मुझे लगता है कि मैं तुम्हारे लिए नहीं था। मैं खुद को ही समझने में उलझा था। और तुम्हारे फैसले, जो तुमने मेरे लिए किए, उन पर कभी गौर नहीं किया। तुम सही कहती हो, मेरी तरफ से गलती हुई थी।"

अर्पिता ने उसकी बातों को सुना, और फिर थोड़ा मुस्कराई, "तुमने गलती मानी, यही काफी है। मैं भी समझती हूं कि हमारे रिश्ते में कई बार सिर्फ एक-दूसरे को समझने की कोशिश नहीं की गई थी।"

कृष्ण ने सिर झुकाकर कहा, "तुमसे बहुत सारी बातें कहनी हैं, लेकिन क्या तुम मुझे माफ करोगी?"

अर्पिता ने धीरे से उसके कंधे पर हाथ रखा, "हमारे रिश्ते में जो भी हुआ, वह वक्त था। मैं भी अपनी ओर से कुछ चीज़ें बदल सकती थी। मैं भी तुम्हें समझने की कोशिश नहीं कर पाई।" "कभी ऐसा लगता था कि मैं तुम्हें खो दूँगा," कृष्ण ने कहा, उसकी आवाज़ में नर्मी थी। "लेकिन अब जब तुम सामने हो, तो लगता है कि हमारी ज़िंदगी का एक हिस्सा फिर से जुड़ सकता है।"

अर्पिता ने उसकी ओर देखा, और फिर गहरी सांस ली, "हम दोनों ने एक-दूसरे को खो दिया था, लेकिन शायद अब हमें एक दूसरे को फिर से पाना है।"

कृष्ण ने उसकी आँखों में झांकते हुए कहा, "तुमसे बात करने में बहुत अच्छा लग रहा है। हमारी पुरानी यादें बहुत तकलीफदेह हैं, लेकिन अब लगता है कि उन्हें सहेजकर आगे बढ़ना चाहिए।"

दोनों के बीच एक गहरी चुप्पी थी, लेकिन यह चुप्पी अब किसी बोझ की तरह महसूस नहीं हो रही थी। अब यह एक समझ का हिस्सा बन चुकी थी। कृष्ण ने धीरे से कहा, "अगर तुम चाहो तो, हम फिर से दोस्त बन सकते हैं, क्या तुम तैयार हो?"

अर्पिता ने हल्की मुस्कान दी और सिर हिलाते हुए कहा, "हां, दोस्त। मुझे भी लगता है कि हम दोनों को एक-दूसरे को समझने का समय चाहिए।" "तो क्या हम फिर से शुरुआत कर सकते हैं?" कृष्ण ने पूछा, उसकी आवाज़ में एक हल्की सी उम्मीद थी।

अर्पिता ने सिर झुकाकर कहा, "मुझे लगता है, यह सबसे सही होगा। हम दोनों ने बहुत कुछ खोया है, लेकिन अब जो भी है, वही सबसे अहम है।"

कृष्ण ने उसकी तरफ बढ़कर हाथ बढ़ाया। "तो, एक नयी शुरुआत?"

अर्पिता ने उसका हाथ थामा, और हल्की सी मुस्कान के साथ कहा, "हाँ, एक नई शुरुआत।" दोनों एक-दूसरे को देखकर मुस्कराए। इस मुस्कान में कुछ था, जो उनके बीच के पुराने रिश्ते और प्यार की निशानी था। अब, दोनों एक-दूसरे को समझते हुए, पुरानी गलतियों को पीछे छोड़कर नए रास्ते पर चलने के लिए तैयार थे। पार्क से बाहर निकलते हुए, कृष्ण और अर्पिता अब दोस्त बन चुके थे। एक-दूसरे के पास बैठकर, पुराने रिश्ते की जगह एक नया विश्वास था, एक नया समझ। यह नयी शुरुआत थी, और दोनों अब पूरी तरह से नये नजरिए से अपनी ज़िंदगी को देख रहे थे।

अर्पिता और कृष्ण पार्क में एक बेंच पर बैठे थे। सूरज की हल्की किरणें उनके चेहरे पर पड़ रही थीं, लेकिन उनके बीच एक अजीब सी शांति थी। न कोई जल्दबाजी थी, न कोई जरूरी बात कहने की चाह। दोनों के पास सिर्फ यही था—एक-दूसरे के साथ चुपचाप मौजूदगी। जैसे समय अपने आप ठहर गया हो। इस पल में न कोई शब्द जरूरी थे, न कोई सवाल। बस, एक-दूसरे को समझने की खामोश कोशिश थी, जो दोनों के दिलों में चल रही थी।

कृष्ण की नजरें अर्पिता पर टिक गईं। वह उसे इस बार अलग नजर से देख रहा था, जैसे हर बात को नए तरीके से समझने की कोशिश कर रहा हो। कुछ देर पहले वह अर्पिता से जो कुछ भी कह चुका था, उससे अब उसे एक हल्की राहत मिल रही थी। यह राहत कुछ हल्की थी, लेकिन साथ ही बहुत गहरी भी। अर्पिता की चुप्पी का मतलब था कि वह उसकी बातों को समझ रही है, या शायद अपने पुराने दर्द को धीरे-धीरे सुलझा रही है। 

अर्पिता ने हल्के से सिर घुमाकर कृष्ण की तरफ देखा। उसकी आँखों में एक अजीब सा संयम था। वह जानती थी कि कृष्ण ने जो कुछ भी कहा था, वह उसकी कड़वी सच्चाई और अफसोस का परिणाम था। लेकिन क्या वह सचमुच उन सब बातों को भूल सकती थी? क्या वह वह सब कुछ माफ कर सकती थी, जो कभी उसके दिल को तोड़ चुका था?

कृष्ण ने अपनी आँखों से अर्पिता के चेहरे को पढ़ा, और फिर धीरे से बोला, "मैं जानता हूँ, अर्पिता, मैंने बहुत कुछ गलत किया था। तुमसे दूर होकर मुझे यह अहसास हुआ कि जो कुछ भी मैंने किया, वह सिर्फ तुम्हारे लिए ही नहीं, मेरे लिए भी गलत था। मैं खुद को कभी माफ नहीं कर पाया, और शायद यही सबसे बड़ी गलती थी।"

अर्पिता ने गहरी सांस ली, लेकिन उसने कुछ नहीं कहा। उसकी आँखों में कुछ पुरानी यादें थीं, लेकिन वह उन्हें शब्दों में नहीं बदलना चाहती थी। वह चुप थी, लेकिन उसकी चुप्पी में बहुत कुछ था। कृष्ण ने उसकी चुप्पी को गलत नहीं माना। उसे पता था कि यह एक ऐसा पल था जब शब्दों से ज्यादा दोनों के दिलों में छिपे अहसास मायने रखते थे। कुछ देर बाद, अर्पिता ने धीरे से कहा, "तुमने जो किया, वह कोई छोटी बात नहीं थी। मुझे तुम्हारे जाने के बाद बहुत कुछ सहना पड़ा। बहुत दिनों तक मुझे यही लगता रहा कि हमारी कहानी वहीं खत्म हो गई थी।"

कृष्ण की आँखों में अफसोस था, लेकिन वह अब समझ चुका था कि यह सब अर्पिता की कहानी थी, और उसकी अपनी भी। "मैं समझता हूँ," उसने कहा, "लेकिन क्या तुम कभी इस बारे में सोच पाई हो कि हम दोनों ने एक-दूसरे को कभी पूरी तरह से समझा ही नहीं था? मैं अपने तरीके से तुम्हें खो बैठा, और तुमने अपने तरीके से मुझे। पर अब, क्या हम दोनों इसे एक नए सिरे से शुरू कर सकते हैं? क्या हम अपने पुराने गिले-शिकवे पीछे छोड़ सकते हैं?"

अर्पिता ने उसकी बातों को ध्यान से सुना। उसने अपनी आँखें झुका लीं, और फिर धीरे से कहा, "हम दोनों ने अपनी-अपनी दुनिया बनाई थी, और उसमें हम एक-दूसरे को समझ नहीं पाए थे। लेकिन क्या हम इसे फिर से ठीक कर सकते हैं? क्या अब भी कोई रास्ता है?" यह सवाल अर्पिता के दिल में था, लेकिन उसे जवाब नहीं मिला था। कृष्ण ने उसकी आँखों में देखा और धीरे से कहा, "हमने जो कुछ भी किया, वह अब अतीत बन चुका है। मैं चाहता हूँ कि हम फिर से शुरुआत करें, लेकिन इस बार वह शुरुआत सच्चे दोस्त की तरह हो, जहाँ कोई झूठ न हो, कोई धोखा न हो।"

अर्पिता ने एक हल्की सी मुस्कान दी, जो अब पहले से ज्यादा सच्ची लग रही थी। "मैं भी यही चाहती हूँ। अगर हम दोस्ती से शुरुआत करें तो शायद वह सबसे अच्छा रास्ता हो।" कुछ देर के लिए दोनों चुप रहे, जैसे यह समझते हुए कि उनके पास समय था, और अब उन्हें वह समय सही तरीके से बिताना था। कृष्ण ने धीरे से अर्पिता की तरफ देखा, और फिर कहा, "क्या तुम मुझसे कुछ पूछ सकती हो?"

अर्पिता ने सिर झुकाया, और फिर उसने धीरे से कहा, "क्या तुम मुझे कभी भी उस पल को माफ कर सकोगे? जो तुमने किया, वह मुझे इतना तकलीफदेह था कि कभी-कभी मुझे लगता था कि मैं इस दर्द से बाहर नहीं निकल पाऊँगी।"

कृष्ण ने उसे सुना, और उसकी आँखों में एक हल्की सी नमी आई। "तुम्हारा दर्द मेरा भी दर्द है, अर्पिता," उसने कहा। "जो हुआ, वह मैं कभी नहीं बदल सकता, लेकिन मैं जानता हूँ कि मैं तुम्हें कुछ नहीं दे सका। अब अगर कुछ दे सकता हूँ, तो वह है सिर्फ मेरा विश्वास, और मेरी पूरी कोशिश कि मैं तुम्हारा विश्वास फिर से पा सकूँ।"

अर्पिता की आँखों में हल्की सी नमी थी, लेकिन वह मुस्कराई। "तुमसे बात करके अच्छा लगा, कृष्ण। तुमने अपनी गलती मानी, और मुझे लगता है कि अब मैं उसे धीरे-धीरे स्वीकार कर सकती हूँ।"

कृष्ण ने उसकी आँखों में देखा, और फिर बोला, "हम दोनों की ज़िंदगी में अब तक बहुत कुछ बदल चुका है, अर्पिता। लेकिन मुझे लगता है कि अब हमें एक-दूसरे को समझने का समय मिल रहा है।" दोनों के बीच यह बातचीत अब तक की सबसे गहरी थी, और उन्होंने महसूस किया कि इस रिश्ते का सबसे सुंदर पहलू यह था कि वे एक-दूसरे को फिर से जानने की कोशिश कर रहे थे। अब तक जो गलतियाँ हो चुकी थीं, वे शायद कभी ठीक नहीं हो सकतीं, लेकिन दोस्ती की एक नई शुरुआत की उम्मीद थी। कुछ देर बाद, अर्पिता ने गहरी सांस ली और बोली, "क्या हम अब अच्छे दोस्त बन सकते हैं?"

कृष्ण ने उसकी तरफ देखा, और फिर हल्की सी मुस्कान के साथ कहा, "हमें अब एक-दूसरे को फिर से जानने का मौका मिल रहा है, और मुझे लगता है कि हम इस दोस्ती को बिना किसी डर के बढ़ा सकते हैं।" दोनों पार्क से बाहर निकले, और उनके बीच अब एक नई समझ बन चुकी थी। न कोई दोष था, न कोई डर। बस एक दूसरे को समझने की एक नई शुरुआत थी, जो दोनों के दिलों में हल्के-हल्के बढ़ रही थी। वे दोनों जानते थे कि यह दोस्ती अब एक सच्चे रिश्ते की ओर बढ़ सकती है, लेकिन अभी इसके लिए समय था।

अब, पार्क के बाहर निकलते हुए, उनकी आँखों में एक नया आत्मविश्वास था। वे दोस्त बन चुके थे, और यह दोस्ती अब एक नई शुरुआत की ओर बढ़ रही थी, जहां पुराने जख्म धीरे-धीरे भर रहे थे, और दोनों एक-दूसरे के साथ जीने के नए तरीके खोज रहे थे।

अर्पिता और कृष्ण की दोस्ती अब एक नए मोड़ पर पहुँच चुकी थी। यह पहले जैसे हल्की-फुल्की बातचीत और औपचारिक मुलाकातों से कहीं आगे बढ़ चुकी थी। दोनों एक-दूसरे के बारे में गहरे तरीके से जानने की कोशिश कर रहे थे और हर मुलाकात में कुछ नया हासिल कर रहे थे। उनका रिश्ता अब उस बिंदु पर था, जहाँ शब्दों से ज्यादा कुछ बिना कहे समझा जा रहा था। लेकिन, इस बढ़ती दोस्ती में कहीं न कहीं एक चुप्पी भी थी, जो दोनों के भीतर एक-दूसरे के लिए बढ़ते हुए भावनाओं को ढकने की कोशिश कर रही थी। क्या यह दोस्ती से कहीं आगे बढ़ेगा? या फिर यह वैसे ही रह जाएगा, जैसा पहले था—बस एक शांति और भरोसे का रिश्ता?

पहले के मुकाबले अब अर्पिता और कृष्ण दोनों एक-दूसरे को बहुत अच्छे से समझने लगे थे। उनके बीच कोई औपचारिकता नहीं थी। वे दोनों अब अपनी छोटी-छोटी आदतों, पसंद-नापसंद, हंसी-मजाक, और पुराने दिनों के बारे में खुलकर बात करते थे। अर्पिता को अब कृष्ण के साथ अपने अनुभवों को साझा करने में कोई संकोच नहीं था। वह कभी न कह सकने वाली बातों को कृष्ण से कह पाती थी, क्योंकि वह जानती थी कि कृष्ण उसे जज नहीं करेगा। कृष्ण के लिए भी यही स्थिति थी। उसने अपनी ज़िंदगी में इतने सालों से जो कुछ भी छिपा रखा था, वह अर्पिता से साझा करने में अब कोई डर नहीं महसूस करता था।

कृष्ण ने देखा था कि अर्पिता अब पहले की तरह चुप नहीं रहती। वह अपनी भावनाओं को व्यक्त करने लगी थी, और उसे यह महसूस होने लगा था कि वह अब अपनी जिन्दगी में एक नयापन महसूस कर रही थी। अर्पिता ने कृष्ण से अपनी परेशानियों और डर को खुलकर साझा किया। वह उसे बताती कि किस तरह से उसने अपनी ज़िंदगी को हमेशा दूसरों के हिसाब से ढाला, और कैसे वह खुद को कभी पूरी तरह से नहीं जी पाई। कृष्ण ने उसकी बातें सुनीं, उसे समझा, और बिना किसी तर्क के उसकी बातों को स्वीकार किया। यह विश्वास का वह बंधन था, जो दोनों के बीच समय के साथ विकसित हुआ था।

अब उनकी मुलाकातें और बातें अधिक गहरी होती जा रही थीं। वे एक-दूसरे के विचारों को समझने लगे थे, और यह दोस्ती अब उस बिंदु पर पहुँच चुकी थी जहाँ शब्दों से ज्यादा उनकी मौजूदगी एक-दूसरे के लिए मायने रखने लगी थी। दोनों को अब इस बात का अहसास होने लगा था कि उनका रिश्ता केवल दोस्ती तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि कुछ और बन सकता था, कुछ खास।

कृष्ण के दिल में अब कुछ बदलने लगा था। वह पहले तो केवल एक मित्र के रूप में अर्पिता के साथ मिलता था, लेकिन अब उसे महसूस हो रहा था कि वह उससे कहीं ज्यादा चाहता है। उसने अर्पिता के प्रति अपनी भावनाओं को धीरे-धीरे पहचाना। पहले वह अपनी जिदगी में इस तरह के बदलाव से बचता रहा था, क्योंकि उसे डर था कि अगर कुछ गलत हुआ, तो उसका दिल टूट जाएगा। लेकिन अब वह यह महसूस कर रहा था कि अर्पिता के साथ बिताए हुए पल उसकी जिंदगी के सबसे अच्छे पल थे।

कृष्ण की यह अहसास धीरे-धीरे उसके दिल से बाहर आने लगा था। पहले वह यह नहीं जानता था कि अपनी भावनाओं को कैसे जाहिर करे, लेकिन अब उसे यह समझ में आने लगा था कि अगर वह अपनी भावनाओं को अर्पिता के सामने लाता है, तो इसका मतलब यह नहीं कि वह उसे किसी दबाव में डालने की कोशिश कर रहा है, बल्कि इसका मतलब यह था कि वह अपनी सच्चाई को स्वीकार कर रहा है और उसे सामने लाने का साहस रखता है।

कृष्ण ने कभी नहीं सोचा था कि वह किसी महिला के लिए इतनी सच्ची भावनाएँ रखेगा। उसकी ज़िंदगी में हमेशा कुछ न कुछ कमी महसूस होती थी, और अब वह जानता था कि वह कमी अर्पिता के साथ पूरी हो सकती है। वह उसे कुछ समय से देख रहा था—उसकी मुस्कान, उसकी हँसी, और उसकी आँखों में वह चमक, जो कभी उसके अंदर भी थी। अब कृष्ण को एहसास हुआ कि वह उस ख़ुशी को फिर से महसूस करना चाहता है।

अब जब कृष्ण और अर्पिता के बीच दोस्ती गहरी हो रही थी, तो कुछ अनकहे इशारों और भावनाओं ने अपनी जगह बनानी शुरू कर दी थी। दोनों की मुलाकातों में अब एक हल्की सी अंतरंगता आ गई थी। यह शारीरिक संपर्क की शुरुआत नहीं थी, बल्कि एक नई समझ की शुरुआत थी, जो बिना शब्दों के हो रही थी।

एक दिन, जब वे एक कैफे में मिले, तो बातचीत के दौरान अर्पिता कुछ ज्यादा भावुक हो गई। उसने अपने दिल की बातें कृष्ण से साझा करते हुए अपनी पुरानी दुखों को महसूस किया। कृष्ण ने उसे देखा, और उसकी आँखों में एक हल्की नमी महसूस की। उसने बिना कुछ कहे, बस उसका हाथ अपने हाथ में ले लिया। यह एक हल्का सा संपर्क था, लेकिन इसने अर्पिता को यह एहसास दिलाया कि वह अकेली नहीं है। कृष्ण की पकड़ में कुछ था—एक सुरक्षा का अहसास, जो उसे अंदर तक महसूस हुआ।

कृष्ण ने धीरे से कहा, "तुम बिल्कुल ठीक हो, अर्पिता। मैं यहाँ हूँ, और तुम्हारे साथ हूँ।" यहां दोनों के बीच शारीरिक संपर्क सिर्फ एक एहसास था, जो उन्हें अपनी भावनाओं को और गहरे तरीके से महसूस कराने में मदद करता था। यह हल्का सा, मगर बेहद अर्थपूर्ण था, जैसे एक दोस्त अपने दूसरे दोस्त को दर्द में सहारा दे रहा हो।

कृष्ण अब अर्पिता के लिए केवल एक दोस्त नहीं था। उसका दिल अब उसे कुछ और महसूस कर रहा था। वह नहीं जानता था कि अर्पिता के साथ अपनी भावनाओं को कैसे व्यक्त करे, लेकिन वह जानता था कि वह उसे खोना नहीं चाहता। कृष्ण ने धीरे-धीरे अर्पिता से अपनी भावनाओं के बारे में सोचना शुरू कर दिया। वह अब हर समय उसकी परवाह करता था, और उसे यह महसूस होता था कि अगर वह किसी भी वजह से उससे दूर हुआ, तो उसकी ज़िंदगी में कुछ बहुत जरूरी कमी हो जाएगी।

कृष्ण की भावनाएँ अर्पिता के लिए अब उसकी तरफ से सच्ची थीं। उसने कभी किसी से इतने खुले दिल से प्यार नहीं किया था। उसके मन में अर्पिता के लिए एक सच्ची चाहत थी—एक इच्छा कि वह उसकी ज़िंदगी का हिस्सा बने।

हालांकि अर्पिता कृष्ण के प्रति अपनी भावनाओं को पूरी तरह से पहचानने लगी थी, लेकिन वह अभी भी एक तरह के द्वंद्व से गुजर रही थी। उसकी ज़िंदगी में बहुत कुछ था जो उसने पहले कभी नहीं महसूस किया था। कृष्ण के साथ बिताए समय में वह धीरे-धीरे अपने डर और असुरक्षाओं को दूर करती जा रही थी, लेकिन फिर भी उसका दिल यह सोचने से नहीं रुकता था कि क्या वह कृष्ण के साथ अपने पुराने रिश्ते को फिर से शुरू कर पाएगी?

अर्पिता ने हमेशा अपने दिल के फैसलों को नज़रअंदाज़ किया था। वह हमेशा दूसरों के लिए जीती रही थी, और अब जब कृष्ण उसके सामने था, तो वह नहीं जानती थी कि उसे अपनी भावनाओं के बारे में क्या करना चाहिए। क्या वह अपने डर को पार कर पाएगी और कृष्ण के साथ एक नई शुरुआत करेगी? या फिर वह खुद को फिर से खोने का डर महसूस करेगी?

उसका मन इस सवाल से जूझ रहा था। वह चाहती थी कि वह अपनी भावनाओं को समय दे और कृष्ण के साथ जो कुछ भी हो, उसे धीरे-धीरे समझे।

कृष्ण और अर्पिता के रिश्ते में अब एक नया मोड़ आ चुका था। समय के साथ, दोनों के बीच का विश्वास और दोस्ती गहरी हो गई थी। वे एक-दूसरे को समझने लगे थे, एक-दूसरे के ख्यालों और मनोभावों में हल्की हलचल महसूस कर रहे थे, जो कभी दूर थे, अब करीब थे। और अब, उन दोनों के बीच एक ऐसी घड़ी आ चुकी थी, जब कृष्ण को अपनी भावनाओं को अर्पिता के सामने रखने का साहस जुटाना था। एक नई शुरुआत की संभावना सामने थी, और कृष्ण अब चाहता था कि वह अपने रिश्ते को आगे बढ़ाए, एक कदम और बढ़े। यह कदम एक ऐसा था, जिसे उसने पहले कभी नहीं उठाया था, लेकिन अब उसे विश्वास था कि यह कदम जरूरी था।

एक शांत रविवार की सुबह, मंदिर की सीढ़ियों से उतरते हुए कृष्ण का मन पूरी तरह से अर्पिता पर केंद्रित था। पिछले कुछ हफ्तों में वह बहुत कुछ महसूस कर चुका था, और अब उसका दिल यह कहने के लिए तैयार था, जो उसने कभी नहीं कहा था। वह अर्पिता से बहुत प्यार करता था, और अब उसने यह ठान लिया था कि वह उसे अपना जीवनसाथी बनाएगा।

मंदिर का वातावरण आज भी वही था — धूप, हवा, और पवित्र शांति। कृष्ण और अर्पिता की मुलाकात का यह पांचवां रविवार था, और आज कृष्ण ने अपने दिल में यह तय किया था कि वह अर्पिता से अपनी जिंदगी का सबसे अहम सवाल पूछेगा। दोनों हमेशा की तरह मंदिर के आंगन में बैठे थे। अर्पिता ने हल्का सा मुस्कान दी और कृष्ण की ओर देखा, जो आज कुछ और ही लग रहा था।

"क्या बात है, कृष्ण?" अर्पिता ने धीरे से पूछा, उसकी आँखों में हल्का सा सवाल था। "कुछ नहीं," कृष्ण ने उत्तर दिया, लेकिन उसकी आवाज़ में एक गहरी गंभीरता थी। वह पल भर को चुप रहा, जैसे कि वह अपने विचारों को सही तरीके से व्यक्त करने की कोशिश कर रहा हो। फिर अचानक, उसने कहा, "अर्पिता, तुम मेरी ज़िंदगी का वो हिस्सा बन चुकी हो, जिससे मैं कभी अलग नहीं होना चाहता। मुझे लगता है कि मैंने काफी समय गंवा दिया है, और अब मैं नहीं चाहता कि कोई और दिन बर्बाद हो।"

अर्पिता ने उसकी आँखों में देखा, कुछ समझते हुए और कुछ संकोच के साथ। कृष्ण की आवाज़ में कोई हलचल नहीं थी, बस एक ठहरी हुई, ठोस शांति थी।

कृष्ण ने धीरे से कहा, "क्या तुम मेरे साथ अपना बाकी का जीवन बिताना चाहोगी? क्या तुम मुझसे शादी करोगी?" यह सवाल अर्पिता के लिए अचानक था। वह चौंकी, और उसकी आँखों में एक हल्की सी असमंजस दिखी। कुछ देर तक चुप रही, जैसे वह अपने भीतर के विचारों से जूझ रही हो। उसे विश्वास नहीं हो रहा था कि यह पल आ चुका है।

अर्पिता के मन में कई सवाल थे। वह चाहती थी कि कृष्ण उसका प्रस्ताव स्वीकारे, लेकिन वह डर रही थी। उसका मन और आत्मा अभी भी एक बड़े द्वंद्व से गुजर रहे थे। क्या वह इस रिश्ते को स्वीकार करने के लिए तैयार थी? क्या वह फिर से किसी से इतना जुड़ सकती थी कि वह अपने पुराने डर और खौफ को पीछे छोड़ सके?

वह चाहती थी कि यह पल सही हो, और कृष्ण के साथ उसकी ज़िंदगी की शुरुआत एक नये रूप में हो, लेकिन क्या यह सही समय था? क्या वह खुद को पूरी तरह से कृष्ण के साथ जोड़ने के लिए तैयार थी?

"कृष्ण..." उसने धीरे से कहा, "तुमसे बहुत कुछ सीखा है मैंने। तुम मेरे लिए बहुत खास हो। लेकिन... मुझे अभी थोड़ा समय चाहिए।" उसकी आवाज़ में कुछ अजीब सा था, जैसे वह स्वयं से ही जवाब मांग रही हो। "मुझे खुद से यह समझना होगा कि क्या मैं यह कदम उठा सकती हूँ या नहीं।"

कृष्ण ने उसकी बातों को ध्यान से सुना। उसने महसूस किया कि यह कोई आसान जवाब नहीं हो सकता था। अर्पिता को समय चाहिए था, और वह जानता था कि उसे उसका इंतजार करना होगा। लेकिन उसकी आँखों में कोई निराशा नहीं थी, क्योंकि वह जानता था कि अगर अर्पिता को समय मिलेगा, तो वह उसे सही जवाब दे पाएगी।

"ठीक है, अर्पिता," कृष्ण ने धीरे से कहा, "तुम जितना समय चाहो, उतना ले सकती हो। मैं हमेशा तुम्हारे साथ हूँ, और मैं इंतजार करूंगा। लेकिन एक बात याद रखना — तुम मेरे लिए सिर्फ एक दोस्त नहीं हो, तुम मेरी ज़िंदगी हो।"

अर्पिता ने उसकी बातों को सुना और उसके अंदर एक हल्की सी राहत महसूस हुई। कृष्ण का प्यार सच्चा था, और यह समय उसके लिए एक नई शुरुआत की तरह महसूस हो रहा था।

कुछ दिन और बीते, और अर्पिता ने खुद से यह सवाल किया कि वह कृष्ण के साथ अपना भविष्य क्यों नहीं देख सकती। उसके भीतर अब एक विश्वास था, एक भरोसा था कि वह कृष्ण के साथ अपने पुराने दर्द को पीछे छोड़ सकती थी।

एक हफ्ते बाद, कृष्ण और अर्पिता फिर उसी मंदिर में मिले। यह वही स्थान था जहाँ उनकी मुलाकातें शुरू हुई थीं, और अब यह वही स्थान था जहाँ उनके रिश्ते की दिशा तय होनी थी। अर्पिता ने धीरे-धीरे कृष्ण की ओर देखा, और उसकी आँखों में अब कोई संकोच नहीं था, बल्कि एक गहरी समझ और आत्मविश्वास था।

"कृष्ण," उसने कहा, "मैंने बहुत सोचा। तुम सही थे। मैं तैयार हूँ। मैं तुमसे शादी करने के लिए तैयार हूँ।"

कृष्ण की आँखों में खुशी की लहर दौड़ गई। वह जानता था कि यह निर्णय अर्पिता के लिए आसान नहीं था, लेकिन अब वह जानता था कि वह उसे पूरी तरह से स्वीकार कर सकती थी। अर्पिता का यह जवाब उसकी ज़िंदगी का सबसे खुशी का पल था।

दोनों ने वही मंदिर चुना, जहाँ से उनकी मुलाकातें शुरू हुई थीं। यह वही स्थान था जहाँ उन्होंने एक दूसरे से अनकहे शब्दों में बहुत कुछ सीखा था, और अब वही स्थान उनकी शादी का गवाह बनने जा रहा था।

शादी का दिन बेहद खास था। मंदिर में हल्की सी पूजा हो रही थी, और वातावरण में एक शांतिपूर्ण माहौल था। कृष्ण और अर्पिता दोनों ने एक-दूसरे को देखा और मुस्कुराए। आज उनकी ज़िंदगी का सबसे महत्वपूर्ण दिन था। मंदिर के पवित्र वातावरण में, कृष्ण ने अर्पिता से वचन लिया, "मैं हमेशा तुम्हारे साथ रहूंगा, तुम्हारा साथ कभी नहीं छोड़ूंगा।"

अर्पिता ने भी वचन लिया, "मैं तुम्हारे साथ हूँ, तुम्हारी ज़िंदगी के हर कदम पर, हर मुश्किल में।" उनकी शादी के बाद का पल न केवल उनके जीवन का एक नया अध्याय था, बल्कि यह उस विश्वास और प्यार का परिणाम था जो उन्होंने एक-दूसरे के प्रति महसूस किया था।

आखिरकार वह पल आ ही गया, जब अर्पिता और कृष्ण उस घर में वापस लौट रहे थे, जहाँ से अर्पिता ने पाँच साल पहले बिना लौटने का वादा किया था। यह घर अब अर्पिता और कृष्ण के लिए एक नया अध्याय था, जो प्यार, विश्वास और समझ से भरा हुआ था। जब वे घर पहुंचे, तो घर में स्वागत के लिए कोई था नहीं, क्योंकि अब यह उनका घर था, और यहाँ उन्हें खुद ही एक नई शुरुआत करनी थी। अर्पिता के चेहरे पर हल्की सी मुस्कान थी, जो किसी आत्मविश्वास और सुकून से भरी थी। उसकी आँखों में एक अदृश्य चमक थी—शायद वह उन अंधेरे दिनों को पीछे छोड़ रही थी, जो कभी उसे घेर चुके थे।

कृष्ण ने अर्पिता का हाथ पकड़ा और उसके चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान आई। वे दोनों घर के भीतर गए। घर में अब वह पुरानी सी खामोशी नहीं थी, बल्कि एक नयी उम्मीद और प्यार की हलचल थी। अर्पिता ने घर की दीवारों को देखा, जैसे वह सब कुछ फिर से महसूस करना चाहती हो। कृष्ण ने उसे देखा, और उसकी आँखों में एक गहरी समझ और सम्मान था।

रात को, जैसे ही वे एक-दूसरे के साथ समय बिता रहे थे, दोनों के दिलों में एक नई शुरूआत का अहसास था। कृष्ण ने कमरे के बत्तियाँ बुझा दीं, से ही कमरे की हल्की सी रोशनी बुझी और चारों ओर खामोशी छा गई, अर्पिता और कृष्ण एक-दूसरे के पास खड़े थे। कमरे में सर्दी की हल्की सी ठंडक थी, लेकिन उनके बीच का गर्माहट धीरे-धीरे बढ़ रही थी। कृष्ण ने अर्पिता को धीरे से अपनी ओर खींचा और उसका हाथ अपने हाथों में लिया। उनकी उंगलियां आपस में जुड़ गईं, जैसे यह दोनों एक-दूसरे से कभी जुदा न होने का वादा कर रहे हों।

अर्पिता की धड़कन तेज़ हो गई, और कृष्ण ने उसकी नज़रें पढ़ी। उनके बीच एक अदृश्य पुल बन गया था, जिसमें कोई शब्द नहीं थे, केवल महसूस करने की ताकत थी। कृष्ण ने उसका चेहरा धीरे से अपनी ओर घुमाया और उसकी आँखों में वही गहरी, शांति और विश्वास भरी चमक देखी, जो अर्पिता के लिए हमेशा एक आकर्षण रही थी।"तुम ठीक हो?" कृष्ण की आवाज़ में एक हल्का सा खौफ था, जैसे वह अपनी सबसे बड़ी कमजोरी को देख रहा हो, लेकिन साथ ही उसमें एक अडिग विश्वास भी था, जो अर्पिता ने उसकी आँखों में देखा।

"हां," अर्पिता ने धीरे से कहा, उसकी आवाज़ में हल्की सी घबराहट थी, लेकिन साथ ही एक उम्मीद भी, "अब मुझे डर नहीं है।"

कृष्ण ने धीरे से उसकी बांहों को पकड़ा और उसे अपनी ओर खींच लिया। उनका शरीर अब एक दूसरे से बहुत करीब था। अर्पिता ने अपनी सांसों को थोड़ा गहरा किया, जैसे वह अपने दिल की धड़कन को पकड़ने की कोशिश कर रही हो। कृष्ण ने अपनी आँखों में अर्पिता के चेहरे की हर रेखा को महसूस किया, जैसे वह उसे न केवल शारीरिक रूप से, बल्कि पूरी तरह से समझना चाहता हो।

अर्पिता ने धीरे से अपनी गर्दन मोड़ी, और कृष्ण के चेहरे के पास आते हुए, उसकी नज़रों में कोई सवाल नहीं था, बल्कि एक समझ और सुकून था, जैसे वह इस पल को जीने के लिए तैयार हो। कृष्ण ने उसकी नज़रें पकड़ लीं और फिर दोनों के बीच एक सांस की खामोशी छा गई।

"तुम मुझसे कभी दूर क्यों चली गई?" कृष्ण ने हल्के से पूछा, लेकिन उसकी आवाज़ में कोई दबाव नहीं था। यह सवाल एक लंबे समय से उसके दिल में दबा हुआ था, जिसे वह आज पूछने को मजबूर था।

अर्पिता ने उसे देखा और अपनी उंगलियों से कृष्ण के गाल पर हल्का सा स्पर्श किया, जैसे वह इस सवाल का कोई जवाब देना चाहती हो, लेकिन साथ ही यह भी महसूस कर रही थी कि अब कोई फर्क नहीं पड़ता। "कभी कुछ बातें हल नहीं हो पाई थी," वह धीरे से बोली, "पर अब शायद... शायद हम दोनों बदल गए हैं।"

कृष्ण ने अपने होंठों को अर्पिता के चेहरे के पास लाया और धीरे से उसकी नज़रों में देखा। फिर, एक गहरी सांस लेते हुए, उसने अपने होंठों को उसके माथे पर हल्का सा चूमा। यह एक सुकून और विश्वास का प्रतीक था, जिसे उन्होंने साझा किया था। अर्पिता ने भी अपनी आँखें बंद कर लीं, और उसकी सांसें तेज़ हो गईं।

"अब हम जो हैं, वह सबसे ज्यादा मायने रखता है," कृष्ण ने धीरे से कहा, और फिर उसने अर्पिता के कंधे पर अपने हाथ को रखा।

अर्पिता ने अपने सिर को उसकी छाती पर रख दिया, और दोनों ने एक दूसरे की सांसों का ग rhythm महसूस किया। यह शारीरिक मिलन नहीं था, बल्कि एक भावनात्मक मिलन था, जिसमें दोनों की आत्माएं एक-दूसरे में समाहित हो रही थीं।

धीरे-धीरे, कृष्ण ने अर्पिता के शरीर को अपनी बांहों में समेट लिया, और उसकी नज़रों से वह शांति महसूस की, जो हमेशा अर्पिता के साथ थी। दोनों ने अपनी आँखें खोलीं और एक-दूसरे के चेहरे को देखा। कृष्ण ने अर्पिता की बांहों को हल्के से अपनी ओर खींचा और उसकी नज़रों में एक गहरी चाहत थी, जो शब्दों से कहीं ज्यादा थी।

अर्पिता ने कृष्ण की आँखों में देखा, और फिर धीरे से उसकी गर्दन को महसूस किया। इस पल में दोनों के बीच कोई झिझक नहीं थी, केवल विश्वास था। कृष्ण ने धीरे से अर्पिता की बांहों को ऊपर उठाया और उसके शरीर को हल्के से अपनी ओर खींच लिया। यह धीरे-धीरे एक और स्तर तक पहुंच रहा था। कृष्ण ने धीरे से अर्पिता के बालों को अपनी उंगलियों से छुआ और उसकी गर्दन पर हल्का सा स्पर्श किया।

अर्पिता ने हल्के से अपनी आँखें बंद कीं, और फिर अपने हाथों से कृष्ण की छाती को महसूस किया। दोनों का शरीर अब पूरी तरह से एक-दूसरे से जुड़ा हुआ था। यह शारीरिक संपर्क नहीं, बल्कि एक गहरी आत्मीयता और प्यार की अभिव्यक्ति थी। इस पल में, जो कुछ भी था वह सिर्फ वे दोनों थे। कोई भी शब्द अब आवश्यक नहीं था। उनके बीच की खामोशी अब प्यार की एक भाषा बन चुकी थी, जो किसी भी शब्द से अधिक गहरी और सटीक थी।

इस पल में, जो कुछ भी था वह सिर्फ वे दोनों थे। कोई भी शब्द अब आवश्यक नहीं था। उनके बीच की खामोशी अब प्यार की एक भाषा बन चुकी थी, जो किसी भी शब्द से अधिक गहरी और सटीक थी। उनके शरीर के बीच का हल्का-सा स्पर्श, एक-दूसरे की सांसों की आवाज़, और यह नज़दीकी — ये सभी संकेत थे कि उनका प्रेम शब्दों से कहीं ऊपर था।

अर्पिता ने धीरे से कृष्ण के सीने पर सिर रखा, उसकी धड़कन को महसूस करते हुए, जैसे वह उसी धड़कन में खो जाना चाहती हो। कृष्ण ने उसे अपनी बाहों में लपेट लिया, उसकी उंगलियाँ अर्पिता के बालों में खो गईं, और वह उसे अपने पास महसूस करने लगा। धीरे-धीरे, उनका शरीर एक दूसरे से पूरी तरह जुड़ गया, जैसे यह सब स्वाभाविक था। न कोई विरोध था, न कोई घबराहट। बस दो आत्माओं का मिलन था, जो पहले से कहीं अधिक गहरे थे।

कृष्ण ने अपनी आँखें बंद कीं, और अर्पिता को अपनी पूरी ताकत से महसूस किया। उसके शरीर के हर हिस्से में वही सुरक्षा और प्यार था, जो उसने हमेशा चाहा था। अर्पिता ने भी अपनी आँखें बंद कीं, और कृष्ण की पकड़ में खुद को पूरी तरह छोड़ दिया। इस मुलायम रात में, दोनों का दिल और आत्मा एक दूसरे में खो गए थे, जैसे हर दूरी और हर भ्रम गायब हो गया हो।

कृष्ण ने धीरे से अर्पिता की तरफ अपना चेहरा घुमाया और फिर उसे हल्के से चूमा। यह एक चुम्बन था, जो केवल शारीरिक नहीं था, बल्कि एक गहरी भावना का प्रतीक था। वे दोनों एक दूसरे से जुड़ने का हर तरीका महसूस कर रहे थे — उनके होंठ, उनकी आँखें, उनका सांसों का आदान-प्रदान, और उनकी छुअन।

रात जैसे-जैसे गहरी होती गई, वे दोनों एक दूसरे के साथ सुकून से सो गए। कृष्ण ने अर्पिता को अपनी बाहों में लपेटते हुए उसे अपने पास रखा। अर्पिता ने अपना सिर कृष्ण की छाती पर रखा, उसकी सांसों का तालमेल उनके बीच एक गर्माहट का अहसास बना रहा था। उनकी शरीर की हलचल धीरे-धीरे कम हुई, और वे दोनों गहरी नींद में डूब गए, जैसे दुनिया का हर बोझ और तनाव अब खत्म हो गया हो।

यह रात उनके लिए सिर्फ एक शारीरिक मिलन नहीं थी, बल्कि एक दूसरे को समझने, महसूस करने और स्वीकार करने का एक तरीका बन गई थी।

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