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nida Siddiqui

Abstract Inspirational Children

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nida Siddiqui

Abstract Inspirational Children

हिसाब और सपने

हिसाब और सपने

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हिसाब और सपने"
तुम्हारी हर उंगली थामकर
मैं उन्हीं रास्तों पर चलता रहा,
जिन्हें तुमने मेरे लिए चुना था...
अपने हर छोटे-बड़े ख्वाब को
मैंने तुम्हारी खुशी के पीछे ही भुना था।
पर जब भी थोड़ी सी थकान महसूस हुई,
तुमने अपनी कुर्बानियों का खाता खोल दिया।
"हमने तुम पर कितना खर्च किया, तुमने क्या किया?"
बस एक लाइन में मेरी हर कोशिश को तोल दिया।
रिपोर्ट कार्ड के कुछ सूखे अंकों पर
तुमने मेरी रातों की नींद नीलाम कर दी,
जिस बच्चे ने तुम्हारी ही ख़ातिर खुद को भुला दिया,
उसी की वफ़ा पर तुमने उंगली उठा दी।
जब मैंने सहमे दिल से कहा—
"माँ, मुझे शब्दों को कागज़ पर उतारना है, मुझे लिखना है,"
तो तंज़ कसकर कह दिया गया—
"जाओ, पहले खुद अपने दम पर कुछ बनकर दिखाओ।"
जब मैंने रंगों से भरा कैनवास दिखाया,
और कहा कि मुझे पेंटिंग से प्यार है...
तो हुक्म आया— "रंग छोड़ो,
जाओ और इस दुनिया की रेस में टॉप करके दिखाओ।"
मैंने तो कभी अपनी मर्जी का आसमान भी नहीं माँगा,
मैं तो बस तुम्हारे दिखाए रास्ते का ही मुसाफ़िर था।
फिर क्यों हर मोड़ पर अहसास दिलाया जाता है,
जैसे मैं तुम्हारे एहसानों का एक छोटा सा कर्ज़दार था?


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