सब कुछ है, बस अपना कोई नहीं
सब कुछ है, बस अपना कोई नहीं
सब कुछ है, बस अपना कोई नहीं
पहला भाग: सबसे खुशकिस्मत बच्चा?
"अरे अंश! ज़रा दौड़कर आना तो, देखना तेरे पापा ने तेरे लिए क्या मँगाया है!"
रसोई से मम्मी की आवाज़ सुनते ही दस साल का अंश हॉल में आ गया। वहाँ सोफ़े पर एक चमचमाता हुआ, महँगे टैबलेट का डिब्बा रखा था। पापा अपने फोन पर किसी से बिज़नेस की बात करते-करते हँसे और अंश के सिर पर हाथ फेरते हुए बोले, "लो बेटा, तुम्हारा नया टैब। अब आराम से गेम खेलना। पर हाँ, फाइनल एग्जाम आ रहे हैं, पढ़ाई में मुझे कोई बहाना नहीं चाहिए!"
अंश ने अपने छोटे-छोटे हाथों से वो भारी डिब्बा थामा और धीरे से सिर झुकाकर बोला, "थैंक यू पापा..."
पास ही बड़े भैया (अर्णव) और दीदी (रिया) अपनी किताबें फैलाए बैठे थे। अर्णव भैया ने तुरंत मुँह बनाते हुए ताना मारा, "भाई, इसकी तो पाँचों उँगलियाँ घी में हैं! घर का सबसे छोटा जो ठहरा। हमारे टाइम पर तो पापा से स्कूल प्रोजेक्ट के लिए पाँच सौ रुपये माँगने में भी पसीने छूट जाते थे, और यहाँ जनाब को बैठे-बैठे सीधा टैबलेट मिल गया।"
रिया दीदी ने अपना फोन साइड में रखकर हँसते हुए कहा, "सही कह रहे हो भैया, पापा-मम्मी के लाड-प्यार का सारा कोटा तो इसी ने ले रखा है। भला इसे किस बात की कमी है?"
घर के बाकी लोग इस बात पर मुस्कुराए और वापस अपने-अपने कामों में खो गए। मम्मी रसोई में वापस चली गईं, पापा फिर से फोन पर किसी क्लाइंट को समझाने में उलझ गए, और भैया-दीदी वापस अपने लैपटॉप और कानों में इयरफ़ोन ठूँसकर पढ़ाई में जुट गए।
अंश चुपचाप उस बड़े लिविंग रूम के एक सुनसान कोने में, अलमारी के पास फर्श पर बैठ गया। मम्मी रसोई से उसके मनपसंद समोसे और बिस्किट प्लेट में रखकर लाईं और बिना अंश के चेहरे को देखे, टेबल पर प्लेट रखते हुए बोलीं, "लो अंश, खाते-खाते नया टैब चलाओ।" पर किसी ने ध्यान नहीं दिया कि अंश का गला भूख से नहीं, बल्कि उदासी से रूंधा हुआ था।
उसने नए टैबलेट की पन्नी हटाई और स्क्रीन ऑन की। उसमें कई सारे महँगे गेम्स पहले से डाउनलोड थे, जिनकी चमचमाती रोशनी अंश के मासूम चेहरे पर पड़ रही थी। लेकिन अंश की उँगलियाँ स्क्रीन को छूने से पहले ही थम गईं।
उसे याद आया कि कल रात उसने पापा से टैब नहीं मँगाया था। एक भारतीय घर में पापा से सीधे बात करने में बच्चों को वैसे ही हिचकिचाहट होती है, फिर भी अंश ने बहुत हिम्मत जुटाई थी। वह दबे पाँव पापा के कमरे में गया था, उनके कुर्ते का कोना धीरे से पकड़ा और बहुत उम्मीद से अपनी तोतली आवाज़ में कहा था—"पापा, आज थोड़ी देर मेरे पास बैठोगे? स्कूल में आज वैन वाले भैया ने मुझे बहुत डांटा था, मुझे डर लग रहा है।"
और पापा ने अपने लैपटॉप की स्क्रीन से एक पल के लिए भी नज़रें हटाए बिना कह दिया था—"अभी ऑफिस की बहुत ज़रूरी मीटिंग चल रही है बेटा, डिस्टर्ब मत करो। तुम्हें जो गेम पसंद हो बता दो, मैं कल ही नया टैब मँगा देता हूँ, उसमें अपना दिल बहला लेना।"
अंश ने कोने में बैठे-बैठे अपनी नम आँखों से पूरे घर में नज़र घुमाई—पापा, भैया, दीदी, सब अपनी-अपनी स्क्रीन के पीछे छिपे हुए थे। घर में पैसों की, सुख-सुविधाओं की या पकवानों की कोई कमी नहीं थी। पर उस भरे-पूरे भारतीय परिवार में कोई एक भी ऐसा इंसान नहीं था, जिसके पास अंश बिना किसी फोन या लैपटॉप के, आमने-सामने बैठकर अपने दिल का डर कह सके।
घरवालों को लगता था कि वह दुनिया का सबसे खुशकिस्मत छोटा भाई है, पर सच तो यह था कि उस हँसते-खेलते डिजिटल परिवार में अंश से ज़्यादा अकेला कोई नहीं था। उसकी आँख से एक आँसू टपका और नए टैबलेट की ठंडी स्क्रीन पर बिखर गया।
