Neeraj pal

Drama


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गुरु भक्त शबरी

गुरु भक्त शबरी

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भारत की तपोभूमि में अनगिनत संतो के क्रम में मीराबाई, सहजोबाई, बेगम राबिया आदि जैसी महान विभूतियों के आत्म -प्रकाश से जन-मानस ही नहीं बल्कि भारतीय नारी भी गर्व से प्रतिष्ठा की पात्र है।

ऐसी ही एक भारतीय अबला जो पूर्ण रूप से अशिक्षित, जाति की भीलनी, गरीब व निर्धनता के वशीभूत "शबरी" के नाम से भारत के भू-मण्डल पर आज भी "भक्ति" की प्रतीक रूप में नक्षत्र बनकर प्रकाशित है।"शबरी" स्वयं में भक्ति और गुरु विश्वास की अद्भुत पराकाष्ठा की महिमा थी, जो प्रभु राम की दया -कृपा से उनका मोक्ष प्राप्त करने में सफल रहीं थी। उसका ईश्वर प्रेम अद्वितीय था, जिसके कारण प्रभु की कृपा से उसे एक समर्थ सद्गुरु संत "श्री मतंग जी "का सानिध्य और आशीर्वाद प्राप्त हुआ था।

उसके कष्टमय जीवन में गुरु की कृपा होने के कारण उसका अध्यात्म -मार्ग सुलभ हो गया। गुरु की छाया व सानिध्य में रहकर वह ईश्वर की भक्ति में विलीन हो गई और गुरु आश्रम में रहकर,

गुरु की सेवा में अपना जीवन व्यतीत करने लगी। वह गुरु की आज्ञा का अक्षरशः पालन करना व उनकी सेवा करना, अपना धर्म समझती थी। इसके कारण उसका गुरु प्रेम, समर्पण व विश्वास सराहनीय ही नहीं बल्कि उदाहरण का प्रतीक बन चुका था। गुरु का प्रेम व भक्ति उसमें हर क्षण चरम सीमा पर प्रतिष्ठित थी जिसके कारण वह हर क्षण गुरुमय रहती थी। अपने आचरण व व्यवहार से वह गुरु कृपा व गुरु प्रसाद पूर्ण रूप से प्राप्त कर चुकी थी।

समय चक्र के अनुसार शनै शनै महर्षि मतंग जी का शरीर वृद्धावस्था की ओर बढ़ने लगा तथा जीवन का अंतिम क्षण निकट आने लगा। उन्होंने शबरी को बुलाकर अनमोल वचन, दिशा- निर्देश तथा उपदेश देते हुए कहा," तुम मेरे शरीर में ना रहने के पश्चात इसी आश्रम में रहकर जीवन व्यतीत करना। यहीं पर तुम्हें अयोध्या नरेश राजा दशरथ के पुत्र भगवान "राम "के साक्षात दर्शन होंगे। प्रभु राम यहां पर सीता माता की खोज में अपने अनुज भ्राता लक्ष्मण के साथ इसी आश्रम में पधारेंगे और उनके दर्शन लाभ से तुम्हारा कल्याण होगा।

तुम उनकी सेवा -सत्कार के उपरांत उनके समक्ष अग्नि में प्रवेश करके, अपने इस नश्वर शरीर को भस्म कर देना। यह उपदेश गुरु मतंग जी के अंतिम शब्द थे और उनका नश्वर शरीर समाप्त हो गया। तत्पश्चात वह अपने निजधाम सिधार गए।

गुरुदेव के अंतिम उपदेश ही शबरी के जीवन की आधारशिला थी। यही एकमात्र शेष जीवन का उद्देश्य भी था। वह इसी आश्रम में रहकर, गुरु स्मरण में अपना जीवन यापन करने लगी। धीरे-धीरे समय व्यतीत होता गया। शबरी अपने गुरु प्रेम व समर्पण के सहारे रहकर राम भक्ति के शिखर पर पहुंच चुकी थी। उसका ह्रदय अत्यंत द्रवित व निर्मल हो चुका था। वह ईश्वर भक्ति में इतनी विलीन हो चुकी थी कि उसे अपने शरीर का आभास नहीं रहता था, यह स्थिति भी भक्ति -मार्ग की एक उत्तम दशा होती है। गुरु वाणी पर उसका अटूट विश्वास था, जिसके फलस्वरूप वह उसे ईश्वर की ओर से प्रेषित भविष्यवाणी समझती थी। इसी को वह सत्य वचन मानकर हर पल प्रभु श्रीराम के आगमन की प्रतीक्षा करने लगी और उसके नेत्र सदैव राम आगमन की ओर लगे रहते थे।

समयानुसार एक दिन वह समय भी उसके जीवन में आ गया।

प्रभु श्री राम सीता की खोज करते-करते वन में जा रहे थे और वह महर्षि मतंग जी के आश्रम पहुंचे। इधर नित्य की भांति प्रभु आगमन की शबरी पलके बिछाए प्रतीक्षा कर रही थी। उसका व्याकुल मन प्रभु के स्मरण में सदैव विलीन रहता था। उसकी अंतरात्मा में प्रभु आगमन की झलक स्पष्ट होने लगी।प्रभु आगमन का आभास होते ही वह अपने आश्रम मार्ग को पुष्पों से सजाने लगी, ताकि मार्ग में प्रभु के चरणों में कष्ट ना हो। कितना प्रेम भाव स्पष्ट हो रहा था? बहुत देर से अपनी बोझिल आंखों से उसने प्रभु को कुटिया की ओर आते हुए देखा। धीरे-धीरे प्रभु के चरण पुष्पो पर पड़ने लगे। अब क्या था ?

शबरी प्रेम के भवसागर में डूबने लगी और भाव विह्वल होकर रुद्ध गले से प्रभु का स्वागत करने को आगे बढ़ी। उसके प्रेम अश्रु थमने का नाम नहीं ले रहे थे। प्रभु के समीप आते ही वह उनके चरणों में लिपट कर फूट-फूट कर रोने लगी। आज उसके गुरु का वचन यथार्थ में बदल गया था। भक्तवत्सल भगवान राम के चरण उसके आंसुओं से भीग गए थे। प्रभु ने अपने दोनों हाथों से अपने भक्त को उठाकर उसके आंसुओं को पौंछा और स्वयं भी भाव विभोर हो गए।

प्रभु को अपने समक्ष पाकर वह बेसुध -सी हो गई थी,उसे अपने तन -मन का आभास भी नहीं था। उसके नेत्र प्रभु प्रेम रस का रसास्वादन कर रहे थे। उसके इस अनुपम हृदय की दीनता से प्रभु राम के नेत्रों से अश्रु छलकने लगे। उस समय भक्त और भगवान के मिलन का सुन्दर दृश्य देखते ही बनता था। एसा प्रतीत होता था कि युग -युगान्तर से बिछड़े दो हृदय आपस में मिल रहे हों। प्रभु अपने इस भक्त की भक्त वत्सलता को देखकर अपने निज स्वरुप को भक्त में चमकते सूर्य की भाँति देख रहे थे। दोनों ही धीरे-धीरे सामान्यतः की ओर अग्रसर होने लगे।

"शबरी "प्रभु राम लक्ष्मण को अत्यंत सम्मान पूर्वक कुटिया में अंदर लायी और दोनों भाइयों के पग -पखारकर उच्च आसन पर सुशोभित किया। उनकी अर्चना आदि करके अपने भूखे प्रभु के समक्ष जंगल से तोड़कर लाये बेर रखें और एक -एक बेर चखकर मीठे बेर दोनों भाइयों को दिए। लक्ष्मण जी ने शबरी के जूठे बेर लेकर वहीं फेंक दिए, लेकिन प्रभु राम ने उन बेरों को बहुत स्वाद से खाया, क्योंकि उसमें शबरी के प्रेम भाव स्पष्ट झलक रहे थे। इसके अतिरिक्त भीलनी के पास प्रभु को अर्पित करने के लिए कुछ भी तो नहीं था।

प्रभु राम ने उन प्रेम रस से डूबे मधुर बेरों को अत्यंत मुस्कराते हुए खाया और शबरी की ओर निहारते रहे। बस उस कुटिया में भक्त और भगवान के बीच प्रेम भक्ति का सागर उमड़ रहा था। शबरी निहाल हो चुकी थी और उसको गुरु वचन याद आने लगे।

अपने प्रभु के आदर सत्कार के उपरांत शबरी ने उन्हें अपने गुरु महाराज महर्षि मतंग जी द्वारा बताया गया उपदेश विस्तार पूर्वक कहा। उसने कहा कि यद्यपि वह आपके दर्शन न कर सके, लेकिन उनकी दया कृपा से मेरा जीवन धन्य हो गया। मैं अभागिनी निम्न कुल में जन्मी समाज से तिरस्कृत, भीलनी जाति की निर्बल अवला, इस योग नहीं थी कि मुझे गुरु का सानिध्य प्राप्त होता और उनके आशीर्वाद व दया कृपा से साक्षात प्रभु का दर्शन पा सकती। अब शबरी पूर्णरूपेण राम मय हो चुकी थी।

उसकी भक्ति भावना, प्रेम व गुरू आस्था, विश्वास से प्रभावित होकर प्रभु ने कहा -

" स्त्री -पुरुष, जाति धर्म, नाम और आश्रम आदि कोई भी मेरे भजन का कारण नहीं होता। मेरी अनन्य भक्ति करना ही कारण है अर्थात मेरी प्राप्ति का सहज व सरल उपाय मेरी भक्ति करना है। मेरी भक्ति से विमुख व्यक्ति यज्ञ, ज्ञान, तप अथवा वेदों से प्राप्त ज्ञान आदि विभिन्न कर्म करने के उपरांत भी मुझको नहीं प्राप्त होता। मनुष्य केवल उक्त साधनों को करके अपने संस्कार, आचार -व्यवहार तथा सद्गुणों का संचय करता है। मुझे प्राप्त करने का एकमात्र साधन मेरी भक्ति ही है।

अंत में भगवान श्रीराम ने कहा, शबरी तुम तो नवधा भक्तियो के सभी प्रकार के साधनों से पूर्ण हो। निश्चय ही तुम परम गति की स्वामिनी हो। अतः मैं तुम्हें वही गति प्रदान करता हूं जो योगियों को भी उपलब्ध नहीं होती। मेरी दर्शनों का परम अनुपम पल यही है कि जीव अपने निज स्वरुप को प्राप्त कर मोक्ष प्राप्त करने का अधिकारी हो जाता है।

मम दर्शन फल परम अनूपा, जीव पाव निज सहज सरूपा।


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