एक सफ़र ऐसा भी
एक सफ़र ऐसा भी
निकला था उस दिन में बहुत दूर निकल जाने को। दुनिया के तमाम झंझटों को छोड़ उस जगह चला जाना चाह रहा था। जहां सिर्फ शांति ही शांति हो, कोई झंझट उलझन ना हो असल में थक गया था एक ही जगह बैठे -बैठे कुछ नया चाहता था मैं ...एक दिन निकल गया घर से चला जा रहा था सुकून की तलाश में, बहुत आनन्द ले रहा था प्रकृति के अद्भुत नजारों का वृक्षों की पंक्तियां। हरियाली पक्षियों की चहचहाहट इतनी शांति कि मैं स्वयं की आवाज़ भी सुन पा रहा था। शहर के शोर-शराबे में अपनी आवाज़ सुनना भी नामुमकिन होता है। मन को बड़ा सुकून और शांति मिल रही थी।
तभी एक पार्क में एक वृक्ष के नीचे हरी भरी घास के कालीन पर पैर रखकर मैं बैठ गया सर्दियों की गुनगुनाती हल्की धूप तन को सहला रही थी।
चलते चलते ना जाने कब मैं पहुंच गया बादलों के उस पार चंदा की पालकी पर सवार चमकीली परियों की दुनिया में परियों के हाथ में सुनहरी जादू की छड़ी जो मांगो हो जाती थी हमारी मुराद पूरी ।
मैंने भी मांगा कुछ कुछ दिन वही चाँद पर घर जाने को सब कुछ दे वहां कोई ग़म नहीं था, सारा माहौल खुश नुमा ही खुश नुमा ....ऐसी ही दुनिया का सपना देखता था मैं हमेशा अब लौट के जाने का ना था कोई इरादा। तभी एक परी मेरे पास आयी और बोली तेरे चेहरे पर निराशा है क्यो छाई ,धरती तुम मनुष्यों के लिए बनाई और तुम मनुष्यों ने ही इस धरती का हाल बुरा कर दिया अपने स्वार्थ के लिए धरती पर कोहराम मचा दिया धरती का हाल बुरा कर दिया ।
मैं बोला परी दीदी मैं नहीं जाने वाला धरती पर वापिस मुझे बना लो चाहे अपना नौकर ...परी माँ बोली यहां सब ही हैं अपने मालिक यहां नहीं कोई किसी का नौकर तुम मनुष्य हो तुम्हें धरती पर जाना होगा अपना फर्ज़ निभाना होगा जाओ धरती पर जाओ और धरती को ही स्वर्ग बनाओ तुम अपनी सच्चाई से धरती को स्वर्ग बनाओ। तुम अच्छे बनोगे तो सब तुम को देखकर अच्छे बनने लगेंगे अपने इरादों पर अटल रहना कभी किसी का अहित ना करना।
कुछ क्षण बात मेरी आँख खुली और स्वयं को मैंने हरी घास के कालीन पर सोते पाया। परियों की बात समझ धरती को ही मैंने स्वर्ग बनाने का सपना सजाया।
