Manoj Kumar Samariya “Manu"

Inspirational

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Manoj Kumar Samariya “Manu"

Inspirational

एक पाती शिक्षक के नाम

एक पाती शिक्षक के नाम

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प्रणाम गुरूवर,

मेरे शिक्षक, मेरे दिशा निर्देशक, आप मुझे भूल गए होगें कुछ - कुछ, परन्तु पूरी तरह नहीं। धुँधली - धुँधली अस्पष्ट याद मस्तिष्क के किसी कोने में निश्चित पड़ी होंगी। याद कीजिए वह सहमा - सहमा सा पीछे की कतार में बैठा हुआ बालक बेतरतीब बाल, अव्यवस्थित ड्रेस और बिना स्लेट के दुबका बैठा था। उस चेहरे को आप कभी नहीं भूल सकते जो आपका गृहकार्य कभी समय पर पूरा नहीं करता था। उस लड़के में मन में यह डर था कि वह नहीं पढ़ सकता। वह पढ़ने के लिये नहीं बना है। उसे अपने पापा की तरह गड़रिया( भेड़ - बकरियाँ चराने वाला ) ही बनना है लेकिन, लेकिन आपका विश्वास था कि वह लड़का पढ़ सकता है और जरूर पढ़ेगा। और देखिए ना आपका विश्वास आखिर जीत ही गया। आज मुझे ये स्वीकार करते हुए बहुत प्रसन्नता हो रही है कि गलत था। मैं उतना पढ़ाकू तो नहीं बन पाया हाँ मगर, औसत रहकर विश्वविद्यालय की शिक्षा पूर्ण कर शिक्षक प्रशिक्षण डिप्लोमा और डिग्री लेकर फारिग हो गया । साहित्य लेखन में रूचि के चलते दो पुस्तकें भी लिखी और संपादक भी बना मगर ऐसा लगता है कहीं कुछ छूट गया, कहीं न कहीं एक अधूरापन और खालीपन- सा महसूस होता है मुझे बस उसे भरने के लिये निरंतर स्वयं को कागजों पर खाली करता रहता हूँ। 

आज मैं एक निजी विद्यालय में शिक्षक हूँ। जब भी 5 सितंबर को बच्चे शिक्षक दिवस की शुभकामनाएँ देकर आशीर्वाद लेने आते हैं मेरे शिक्षकों के बारे में पूछते हैं तब मेरे जेहन में कॉलेज के लेक्चरर नहीं, शिक्षाविद् नहीं आपकी छवि हाँ वही छवि पेड़ के नीचे कक्षा वाली प्रत्यक्ष हो आती है। सोचता हूँ उसके बाद भी तो एक से एक विषय विशेषज्ञ मिले थे मगर उनमें सबसे प्रथम और स्पष्ट छवि प्राथमिक विद्यालय वाली ही क्यों हैं ? 

कितनी धृष्टता करता था मैं चिकनी माटी की तरह और आपने कोई कसर नहीं छोड़ी मुझे आकार देने में कुशल कुम्हार की तरह। आपको तंग करना, मुँह छिपाकर शोर करना, काम न होने के लाखों बहाने, घड़ियाली आँसू बहाना जहाँ तक मुझे याद है मैंने आपका प्रतिकार करने में कोई कमी नहीं रख छोड़ी थी,आज उन तमाम प्रतिकारों का दिल से पश्चाताप करता हूँ। आज समझ आ रहा है आपके ललाट पर चिंता की वो लकीरें आपकी अपनी नहीं थी वरन मेरे जैसे असंख्य शिष्यों की नादानी और भविष्य को लेकर थी। धन्य हो आप और धन्य है आपका संयम । आप एक मूर्तिकार की भाँति मुझसे अनगढ़ पत्थरों को आकार देते रहे। कुछ कमी थी तो बस हमारे समर्पण में। काश्हम सौंप देते स्वयं को आपके हाथों उस वक्त तो आज जो कुछ विकार शेष हैं वो भी मिट जाते शायद । फिर भी आपकी कुशलता का मैं कायल हूँ, हमारे इतने विरोध के बावजूद आपको क्रोध नहीं आया हाँ कभी कभार झुँझला जाते थे फिर जाने क्या सोचकर मुस्कुरा देते थे। आपकी उस रहस्यमयी मुस्कान का राज़ आज समझ आ रहा है। आज खुद को आपके स्थान पर रखा तब आपका दर्द समझ आया सच में सदा - सर्वदा के लिए नत हो गया आपके सम्मुख। 

कितना तप करना होता है किसी की गलती को माफ करने में यह मुझे पिता बनने के बाद महसूस हुआ। जब अपने ही अंश की गलती पर मैं भड़क जाता हूँ, फिर याद दिलाने पर कि मैं पिता हूँ तब उसे माफ कर पाता हूँ। मेरा रोम - रोम काँपने लगता है यह सोचकर कि आपने अनेक पुत्रवत् शिष्यों की गलतियों को कैसे माफ किया होगा। यह आपकी साधना का और तप का सुफल है। मैं कबीर जितना महान नहीं हूँ जो यह लिखकर इति श्री कर लूँ गुरू गोविंद दोऊ खड़े मगर हाँ यह जरूर कहूँगा आपकी एक खूबी जो आपको महान बनाती है वो है आपकी कर्तव्य निष्ठा। आपका मार्गदर्शन समाज को योग्य नागरिक प्रदान करता है। जिससे राष्ट्र निर्माण संभव हो रहा है। 

आज आपको हर रूप में अपने समक्ष और साथ पाता हूँ। माता - पिता रूप में, विद्यालय में साक्षात् गुरू रूप में, सहपाठी मित्र रूप में, ईश्वर रूप में और भी हर उस रूप में जो मुझे कुछ सिखा जाता है। आप सदैव मेरे साथ हैं। शिक्षण काल के दौरान मैंनें जो कुछ अर्जित - उपार्जित किया है उसे आपको समर्पित करते हुए त्रुटियों का प्रायश्चित करता हूँ। जानता हूँ आपको और माफ करने की आपकी आदत को इसलिए जानबूझकर माफी माँग रहा हूँ। आप जहाँ भी हैं मुझे देख रहे हैं महसूस कर रहे हैं क्योंकि आप मुझ बालक को कदापि अकेला नहीं छोड़ सकते। इसी उम्मीद के साथ आपका अपना ‘मनु’ यही नाम दिया था आपने मुझे।


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