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SUDHA SHARMA

Drama Inspirational Tragedy


2.5  

SUDHA SHARMA

Drama Inspirational Tragedy


दुआ का फल

दुआ का फल

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दिसंबर-जनवरी की कड़ाके की ठंड थी। ऊँची-नीची पहाडियों के बीच घने जंगल में एक मोटर साइकिल सवार कभी इस दिशा, कभी उस दिशा गाड़ी की हेन्डिल घूमा-घूमाकर अपनी मंज़िल तलाशने की कोशिश कर रहा था। गर्म काले कोट, सफ़ेद शर्ट, काली पैन्ट और लंबी-सी गर्म टोपी लगाए, तेज़ हवा के झोकों का सामना करने में फिर भी मुश्किल नज़र आ रहा था। साथ में कोई नहीं अकेली जान, भयानक जंगल उस पर भयानक काली रात।

वह अपने गाँव से निकला था। पास वाले गाँव में किसी मित्र के यहाँ दावत में बुलाया गया था, जो कि उसके गाँव से पूर्व की ओर मात्र बारह-पंद्रह किलोमीटर की दूरी पर था। वहाँ कुछ कार्यक्रम था। वैसै पहले भी वह वहाँ कई बार जा चुका था। पूरा जंगली इलाका था। आज जाने कैसे वह रास्ता भटक गया था।

तीस-बत्तीस वर्ष का वह युवक एक सरकारी चिकित्सा अधिकारी था। उसका छोटा सा परिवार था। एक प्यारा-सा बेटा राजू और ख़ूबसूरत-सी पत्नी। वह अपने कार्य में कुशलता के साथ-साथ, मृदुभाषी और व्यवहार कुशल इन्सान था। अपने कार्य और व्यवहार से वह लोगों का मन बहुत जल्दी ही जीत लेता था। यही वजह है कि उसे सिर्फ़ तीन वर्ष हुए यहाँ आए और परिचितों का दायरा बढ़ गया था, इसलिए उन्हें परदेश में भी अपनेपन की कभी कमी महसूस नहीं हुई। उसकी पत्नी भी मिलनसार युवती थी।

यूँ तो उसे सपरिवार आमंत्रित किया गया था, पर उसकी पत्नी ने शाम होने की वजह से जाने में मना कर दिया था। सो वह अकेला ही चला गया था। एक घंटे का ही रास्ता था। शाम चार बजे वह घर से निकला था। अब छह बजने को आया था, समझ नहीं आया रास्ता कहाँ पर छूट गया। जब तक समझ पाता रात होने को आई थी। उसी जंगली इलाके में, बीहड़ में खो गया। कभी इस ओर कभी उस ओर राह तलाशता, पर कुछ दूरी के बाद फिर रास्ता बंद हो जाता। आसपास कोई इन्सान तो क्या, कोई परिंदा भी दिखाई नहीं पड़ रहा था। जंगल का रास्ता, कच्ची पगडंडियाँ, कुछ दूर जाकर बंद होतीं, तो उसे पुन: गाड़ी मोड़ लेना पड़ता। यूँ ही चार-पाँच घंटे बीत गए होंगे। उसे वक़्त का अंदाजा नहीं हो पा रहा था। प्यास भी लग आई थी, वह बुरी तरह से थक भी चुका था, अत: गाड़ी बंदकर कुछ देर यूँ ही सोचता रहा। क्या करुँ, किधर जाऊँ ? आगे का रास्ता कौन सा है ? पर परेशानी में कुछ समझ नहीं आ रहा था। आस-पास दूर-दूर तक कहीं रोशनी या इन्सानी चेहरा देखने की गुंजाइश न थी। अलबत्ता अब रात के साथ ही कुछ जंगली जानवरों की आवाज़ें व पेड़ों की सरसराहट सुनाई देने लगी थी।

“हे भगवान मैं कहाँ फँस गया, कुछ राह दिखा प्रभु”, वह बुदबुदाया।

अचानक उसे एहसास होने लगा कि वह नितांत अकेला है, घने जंगलों के बीच। अगर अंधेरे में कोई जानवर आ गया तो ? नहीं ! नहीं ! कोई चोर-डाकू आ गए तो ? नाना प्रकार की कल्पनाओं से कल्पित मन घबराने लगा। सोचा इन्सान आए तो निपट भी ले, पर जानवर, यह सोचकर उसकी रुह काँप उठी।

फिर सोचा, नहीं-नहीं मुझे गाड़ी बंद नहीं करनी चाहिए। पेट्रोल खत्म होने की आशंका से उसने गाड़ी बंद कर दी थी, किंतु उसे पुन: स्टार्ट कर दिया और हेड लाइट के साथ टेल लाइट भी जला दिया। ताकि जानवर आदि के पास आने की संभावना न रहे। पर ये क्या ! हेडलाइट जलाते ही देखा उसके कुछ गज की दूरी पर एक तेंदुआ किसी शिकार को मुँह में दबाए खड़ा था। ज्यों ही प्रकाश उसके चेहरे पे पड़ा, वह गुर्रा उठा। इधर युवक की भी घिघ्घी बँध गई, पर भय की पराकाष्ठा भी इन्सान में कभी-कभी शक्ति का संचार करा देती है। जहाँ जीवन-मृत्यु का प्रश्न हो, तो अंतिम कोशिश तक आदमी हिम्मत करता है। यही बात लागू हुई उस युवक पर। शायद वह तेंदुआ झपट ही पड़ता कि युवक ने गाड़ी गेयर में डाली और जोर-जोर से हैंडल घुमाने लगा, साथ ही वह गाड़ी का हार्न भी बजाता जा रहा था। कुछ पलों बाद ही तेंदुआ भाग खड़ा हुआ। युवक ने चैन की साँस ली, पर कब तक ? वह मोटरसाइकिल को विपरीत दिशा में एक पगडंडी पर दौडा दिया। सामने एक चौराहा था। सोचने लगा अब क्या करूँ ? जल्दी निर्णय लेना था। अभी-अभी घटी घटना ने उसे सतर्क के साथ-साथ भयभीत भी कर दिया था। अचानक उसे अपने बेटे की याद आई, जो साथ आने की जिद कर रहा था। रात होने की सोचकर ही जिसे नहीं लाया था। वह सोचने लगा, “अच्छा ही हुआ अगर बेटा और पत्नी साथ आते, तो मुसीबत दुगुनी हो जाती। अपने साथ-साथ दो और जान की फ़िक्र होती। पर अब मैं क्या करूँ ?”

तब तक शायद रात के ग्यारह बज चुके थे। उसने हेडलाइट में अपनी कलाई घड़ी पर नज़र डाली, पर वह पौने ग्यारह पर बंद हो चुकी थी। संभवत: रात ग्यारह से अधिक हो चुकी थी। गाड़ी में भी पेट्रोल धीरे-धीरे खत्म होता जा रहा था। पर मंज़िल की दूरी तय नहीं हुई थी। उसने सोचा गाड़ी यहीं छोड़ पैदल ही चला जाए। ये चौराहा पहचान के लिए ठीक रहेगा। किसी भी राह पर चलूँ तो सही। ये सोच उसने गाड़ी लॉक किया और मन-ही-मन ईश्वर को याद करते हुए एक ओर पगडंडी पर चल पड़ा।

चलते-चलते जाने कितनी दूर निकल आया। रात की घनी स्याही में रास्ता तय करना मुश्किल था। पर वक़्त का अंदाजा हो गया। शायद दो घंटे हो गए उसे चलते हुए, जब रास्ता बंद हुआ, तो सामने एक बड़ा-सा पहाड़ मुँह बाएँ खड़ा था। वह हड़बड़ा गया। वह सोचा पुन: वापस हो जाऊँ, उसी चौराहे पर से शायद दूसरा रास्ता कहीं ले जाए। ये सोच वह पलटा, पर थकावट, प्यास, अनजान पथ, अनजानी जगह और भयानक वातावरण के कारण वह उस पथ को भी भूल गया, जहाँ से वह आया था। अब उसकी हताशा बढ़ने लगी। इतने में ही कहीं आसपास किसी जानवर के चिल्लाने की आवाज़ आई। वह एक बारगी काँप उठा। उस कड़कड़ाती ठंड में भी उसे पसीना आ गया। उसने अपने सारे गर्म कपड़े उतार दिए। भूख तो भाग गई थी, पर प्यास के मारे बुरा हाल था। अब उस पर भय हावी होने लगा। उसका गला सूखने लगा। अब उसे अपनी गाड़ी की भी उम्मीद नहीं थी।

अकेला हाथ-पैर लिए भटकता, जाने किस-किस देव को याद करने लगा, “हे भगवान, अगर मैंने कोई पुण्य का काम कभी किया हो, तो उसका वास्ता मुझे रास्ता बता प्रभु। मेरे बेटे, मेरी पत्नी पर रहम कर भगवान। वे परदेश में अनाथ हो जाएँगे। हे जीवनदाता मुझे राह बता।”

वह फूट-फूटकर रोने लगा। फिर जैसे किसी अनजानी शक्ति ने उसे पुन: सक्रिय किया। वह यंत्रचालित-सा खड़ा हुआ और उसी पहाड़ पर जो सामने रास्ता रोके खड़ा था, पर चढ़ने का मन बना लिया और बिना पगडंडी के वह चढ़ने लगा। पगडंडी हो भी तो उसे उसके छोर का पता न था, अत: वह यूँ ही झाड़ियों को हटाता छोटे-छोटे पौधों को पकड़ चलता रहा। अब उसका भय कम हो रहा था। उसे कीड़े-मकोड़े का भी डर नहीं था। इस प्रयास में वह कई बार पुन: नीचे गिरा। कहीं किसी चील-कौवे के उड़ने की, पंख फड़फड़ाने की आवाज़ आती तो वह रुक जाता। पुन: अपना सफ़र जारी रखता, जिसके मंज़िल की कोई संभावना नहीं थी। उसके हाथ-पैर छिल गए, पर उसने हिम्मत नहीं हारी। चलता ही रहा। इस तरह आधे पहाड़ की चढ़ाई वह लगभग दो घंटे में पूरा कर लिया। तब कहीं चाँद निकल आया। जिसकी दुधिया रोशनी में उसे थोड़ी दूर पर पगडंडी दिखाई पड़ी। वह सोचा उस राह पकड़ लूँ, अत: उस ओर बढ़ने लगा, पर ये क्या ? जगह-जगह गड्डे थे, घुटने-घुटने तक। वह कई बार गिरते-गिरते बचा। शायद तीखुर खोदा गया था। जो जंगली इलाके में बहुतायत पाया जाता है।

स्थानीय लोग इसका व्यापार करते हैं। इससे युवक को कुछ उम्मीद बँधी कि शायद आसपास कोई गाँव हो। यह सोच उसने राहत की साँस ली और नए जोश से पुन: आगे बढ़ने लगा। कुछ दूर चढ़ने पर उसे दूर दीये की रोशनी दिखाई दी। वह उत्साहित हो उस ओर बढ़ा। शायद कोई झोपड़ी या घर हो। इन्सानी आवास की उम्मीद लिए वह वहाँ तक पहुँचा। पर ये क्या ? शायद कोई मजार थी जहाँ पर दीया जल रहा था। आसपास कोई झोपड़ी तो क्या, कोई इन्सानी साया भी न था। उसने महसूस किया कि वह व्यर्थ यहाँ तक आया। अब लौटना भी संभव नहीं, इतनी दूर आ चुका है कि अब वापस गाड़ी तक भी नहीं पहुँच पाएगा और चलने की ताकत भी न थी।

उसने सोचा कि शायद उसकी मृत्यु निश्चित ही इन बीहड़ों में होगी। आठ-नौ घंटे की इस भटकन और चढ़ाई में वह पस्त हो चुका था। गले में काँटे पड़ गए थे पर सहसा उसके दिमाग में यह बात बिजली की तरह कौंधी कि दीया जलने का मतलब आस-पास गाँव तो होगा ही। ज्यादा दूर कौन दीया जलाने आएगा पर पता कैसे लगे कि किस ओर गाँव है।

अब उसने भगवान को याद कर उस दीपक के आगे जाकर मस्तक झुकाया, “हे अग्नि देव आप मेरे पथ प्रदर्शक बनें, मेरी सहायता करें।”

फिर जाने उसे क्या सूझा कि वह एक पेड़ पर जाकर चढ़ गया और आसपास नज़रें दौड़ाया। देखा उसकी बाईं ओर कुछ दूर रोशनी दिखाई पड़ रही है। उसके चेहरे पर चमक आ गई। जैसे मरुस्थल में पानी मिल गया हो। वह ईश्वर को धन्यवाद देने लगा। अगर पेड़ पर न चढ़ता तो वह सीधा उतरता और दाईं ओर का रास्ता पुन: भटक जाता। उसने उस मजार पर पुन: सिर झुकाया और वह बाईं ओर मुड़ गया। कुछ देर पश्चात् वह बड़ी तेज़ी से एक पगडंडी पर बढ़ रहा था, क्योंकि अब वह नीचे की ओर उतर रहा था।

वह एक गाँव ही था। उसका रास्ता किसी घर के पिछवाड़े जाकर खुला। वह एक खलिहान था। आसपास बहुत सारे खलिहान संलग्न थे। वह जहाँ पहुँचा वह बाड़ीनुमा था। जहाँ एक-दो औरतें धान मिंजाई के काम में व्यस्त थीं। कुछ लोग वहाँ पर अँगीठी ताप रहे थे। शायद उनके बच्चे थे। वह बड़ी आस लिए वहाँ पहुँचा। उन्हें आवाज़ लगाया। वे औरतें आपस मे खुसुर-फुसुर करने लगीं। इस तरह आधी रात को शायद किसी अजनबी का यूँ चले आना उन्हें नागवार लगा। वे उसे चोर-डाकू, जाने क्या समझ बैठे और स्थानीय भाषा में बोलने लगीं।

“तुम यहाँ कैसे चले आए ?” भाषा तो नहीं वह उनके चेहरे की भंगिमा को समझ रहा था। उसने इशारे से कहा कि मुझे पानी चाहिए। वह अपने को बोलने में असमर्थ पा रहा था, पर शायद वे औरतें भयभीत हो गईं या उसकी बात को समझ नहीं पाईं और एक-दूसरे का मुँह देखने लगीं। युवक ने पुन: इशारे से कहा और कुछ शब्दों से भी कि मैं रास्ता भटक गया हूँ। दया करके मुझे पानी पिलाओ। शायद वह बेहोश होने के कगार पर था और औरतें अब भी असमंजस में थीं।

उन्होंने अँगीठी तापते बैठे बच्चों को आवाज़ दे अपने मर्दों को बुलवा लिया। तब तक युवक अर्धमुर्छित-सा निढ़ाल हो गिर पड़ा। औरतें चीख़ने लगीं। इतने में ही चार-पाँच व्यक्ति डंडा-लाठी ले आ पहुँचे। जो आसपास ही काम कर रहे थे। “क्या हुआ कौन है ?”

युवक ने जवाब दिया, “मैं रास्ता भटक गया हूँ। मैं एक डॉक्टर हूँ। कृपा कर मुझे पानी पिला दो। किसी को विश्वास नहीं हुआ। आधी रात ये व्यक्ति इन बीहड़ों से होकर कैसे आया। सब अविश्वनीय नज़रों से देखने लगे।

“भैया कम से कम मुझे पानी तो पिला दो।”

इस पर किसी ने कहा, “पानी तो दे दें, फिर बात करेंगे। एक औरत पानी ले आई। वह गटागट चार-पाँच गिलास पानी पी गया और मुँह भी धोया। सब उसे घेरे खड़े थे। फिर उसने जेब से सिगरेट निकाली, माचिस ढूँढ़ा, जो कि जेब में नहीं था। शायद रास्ते में गिर गई थी। बीच-बीच में जलाकर राह परखते आया था, अत: उसने निवेदन किया, “एक माचिस देंगे ?”

किसी ने माचिस दे दी। उसने एक सिगरेट सुलगाई, कश लिया और कुछ राहत की साँस ले अपने बारे में बताया। फिर पूछा, “ये कौन सा गाँव है।”

गाँव वालों ने बताया, “कट्टापार।”

वह चौंक पड़ा, “अरे !”

वह तो जाने कितना दूर आ गया। ये नाम तो उसने अपने गाँव के आस-पास सुना ही नहीं था। पर जो हो अब कुछ तो राहत मिली। सोच उसने कहा, “भैया क्या आप लोग मुझे ठहरने का आश्रय देंगे। सुबह निकल जाऊँगा।”

सब चुप एक-दूसरे का मुँह ताकने लगे। वह सबके चेहरे के भाव समझकर बोला, “अच्छा यहाँ कोई सरपंच तो होगा।”

“हाँ है।”

“क्या कोई उससे मिलवा सकता है।”

“वो यहाँ नहीं दूसरी बस्ती में रहता है, जो एक किलोमीटर दूर है।”

“क्या समय हुआ होगा।”

किसी ने कहा, “दो बज रहे हैं।”

“ओह ! अच्छा आसपास कोई पटेल या किसी डॉक्टर का घर है ?”

“डॉक्टर तो नहीं, पर हाँ पटेल का घर है।”

अब इतनी बातचीत के बाद शायद उन्हें लगा कि युवक फ़रेब नहीं कर रहा है, अत: किसी ने उसे पटेल के घर ले जाने की सलाह दी। पटेल का घर दस कदम की दूरी पर था। वहाँ जाकर पटेल को उठाया गया। युवक ने अपना परिचय दिया। इस बीच तीन बज गए थे। पटेल का चेहरा युवक को कुछ जाना-पहचाना लगा पर थकान और परेशानी में वह सोच नहीं पा रहा था कि कहाँ देखा था। पटेल को भी लगा कि यह व्यक्ति कौन है। कहाँ देखा हुआ है, पर वह भी याद नहीं कर पाया।

जब उसने अपना परिचय एक डॉक्टर के रूप में दिया और गाँव का नाम बताया, तो पटेल उसके पाँवों में गिर पड़ा। डॉक्टर आश्चर्यचकित रह गया और साथ के लोग भी विस्मित से, अवाक होकर, आश्चर्य से एक-दूसरे को देखने लगे।

इधर पटेल कह रहा था, “अरे, डॉक्टर साहब आप यहाँ कैसे ? बड़े पुण्य किए थे आपने, जो उस जगह से यहाँ तक सही सलामत आ गए।”

पटेल की आँखों में ख़ुशी और दुख के आँसू निकल पड़े। दुख इस बात का कि डॉक्टर को इतना भटकना पड़ा। आगे वह बोला, “अभी कुछ दिन पहले एक व्यक्ति का कत्ल हुआ और पता भी नहीं चला कि कौन व्यक्ति था। मेरे धन्य भाग जो आप की सेवा का मौका मिला।”

युवक का आश्चर्य बढ़ता जा रहा था, पटेल के व्यवहार से। डॉक्टर के आश्चर्य को भाँपकर पटेल बोला, “शायद आपने मुझे पहचाना नहीं डॉक्टर साहब। मैं दयाराम हूँ। जिसकी आपने जान बचाई थी।”

और पटेल बताता गया।

डॉक्टर की आँखों के सामने दो वर्ष पूर्व की घटना का चित्र घूम गया। उस समय वह नया-नया आया था। वर्ष भर हुए थे वह अपने अस्पताल में बैठा था कि एक बैलगाड़ी में चार व्यक्ति किसी घायल को लेकर आए। पता चला कि वे किसी रिश्तेदार की शादी में जा रहे थे कि सामने से किसी जानवर के आ जाने से बैलगाड़ी पर जुते बैल बिदक गए और गाड़ी किसी खाई में जा गिरी। बाकी को तो कम चोटें आई थीं, पर दयाराम का सिर बुरी तरह फट गया था। घर का एकलौता चिराग था। उसके बचने की उम्मीद नहीं थी। उसका बाप दहाड़े मार-मारकर रो रहा था। आसपास गाँव में दूर-दूर तक कोई डॉक्टर नहीं था, अत: यही डॉक्टर का सहारा था, इसलिए वे लेकर आए थे।

उसका बाप डॉक्टर के पैरों में गिर पड़ा था, “बचा लो डॉक्टर साहब, किसी भी तरह मेरे बच्चे को बचा लो।”

डॉक्टर ने उसे सांत्वना दी। चूँकि गाँव जंगली इलाका था, अत: अस्पताल में सारी सुविधाएँ तो नहीं थीं, फिर भी डॉक्टर ने आनन-फानन में पर्दे चारों ओर लगाए और उसका ऑपरेशन कर टाँके लगा दिए। डॉक्टर के कुशल हाथों ने तीस-बत्तीस टाँके सिर में लगाए। इंजेक्शन दिया। अपने ही घर के बरामदे में खाने-पीने की व्यवस्था कराई। चौबीस घंटे बाद उसे होश आया, पर एक सप्ताह रखना ज़रूरी था। अत: डॉक्टर ने वही ठहरने की व्यवस्था भी करवा दी। एक सप्ताह बाद टाँके खोलने के पश्चात् उसे आवश्यक निर्देश देकर छुट्टी दे दी।

उसके बाप ने जब डॉक्टर की फीस और दवा के खर्चे के बिल के बारे में पूछा तो डॉक्टर का जवाब था, “तुम्हारे बेटे की ज़िंदगी बच गई मेरा प्रथम ऑपरेशन सफल रहा। यही मेरी फीस है।” उसका बाप दुआएँ देते चला गया था।

दयाराम अब भी उसके चरणों में गिरा पड़ा था। डॉक्टर ने उसे उठाया और ख़ुश होते बोला, “अरे वो तुम हो और तुम्हारे माता-पिता ?”

“वो तो स्वर्ग सिधार गए डॉक्टर साहब।” पटेल का गला अभी भी भरा-भरा सा था।

गाँव वालों के मन में श्रद्धा के साथ पश्चाताप के भाव थे कि इस देवता स्वरूप इनसान को पहचानने में भूल किए थे। तब तक सुबह हो चुकी थी। पटेल ने कुछ लोगों को भेजकर डॉक्टर की मोटरसाइकिल मँगवाई। स्थानीय होने की वजह से वे उस चौराहे तक आसानी से पहुँच गए। फिर सरपंच ने अपने घर डॉक्टर के खाने-पीने की व्यवस्था की।

कुछ देर पश्चात डॉक्टर को लोगों ने गाँव से बाहर जाने के रास्ते तक छोड़ भाव-भीनी आँखों से विदाई दी और डॉक्टर कुछ घंटों बाद अपनी पत्नी और बच्चे के पास था। रास्ते भर वह सोचता रहा कि सेवा और दुआ का फल कभी व्यर्थ नहीं जाता। इसी दुआ का परिणाम था कि वह सकुशल अपने परिवार के पास लौट आया था।


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