दिन कैसा बीता
दिन कैसा बीता
सुबह उठते ही पता चला कि पानी नहीं आया है। बुरे दिन की शुरूआत तो वहीं से शुरू हो गई थी। जैसे - तैसे तैयार होकर घर से निकला तो देखा देर हो गई है। जल्दी दरवाजा बंदकर दौड़ता हुआ सीड़ियाँ उतर गया। स्कूटर के पास पहुँच जैसे ही चाबी निकालने को जेब में हाथ डाला तो चाबी नदारद।ओह! शिट! लेट के चक्कर में चाबी उठाना भूल गया।अब तो जितनी तेज़ी से नीचे आया था उससे से भी तेज़ी से ऊपर चढ़ा।
चाबी ले नीचे पहुँचा, स्कूटर स्टार्ट किया और स्पीड खींची। उफ़ ,अपनी गली के मोड़ पर बिल्ली रास्ता काट गई।शुक्र भगवान का कि स्कूटर के नीचे नहीं आई। अब ज़रूर बुरा होगा ,यह सोच मन पर हावी होने लगी। कोई और दिन होता तो छुट्टी कर लेता पर,आज बोर्ड मीटिंग है।
बेमन सा आगे बढ़ा तो स्पीड धीमी रखी। बिल्ली वाला डर मन में था। सिग्नल पर खड़े- खड़े बुरे विचार मन में आ रहे थे। सिग्नल ग्रीन होते ही स्पीड खींची तो सामने साइकिल वाला आ गया। इतनी तेज़ ब्रेक मारी कि गिरते- गिरते बचा। ख़ैर साइकिल वाला तो बच निकल गया पर मुझे पुलिस वाले ने रोक लिया। एक तो देरी और ऊपर से ये भी आज ही मिलना था। मैंने जल्दी से कहा ,सर हेल्मेट पहना है।
सने कहा ,मुझे दिख रहा है। उसने लाइसेंस माँगा। अपनी क़िस्मत पर विश्वास न करते हुए मैंने पर्स खोला ,लाइसेंस दिखाया। उल्ट पलट कर वह ऐसे देख रहा था मानो किसी और का दिखा दिया हो। मैंने जल्दी से पूछा ठीक है ? जाऊँ ? या कुछ और देखना है ?
पता नहीं किस मुहूर्त में निकला कि एक के बाद एक मुसीबत।
आज भाग्य में क्या बदा है, भगवान ही जानता है।लेकिन पुलिस वाले का चेहरा देखकर लग रहा था कि मेरा जाने का पूछना उसे भाया नहीं। अब तो उसकी आवाज़ ऐसी लगी मानों मैंने ख़ुद बैल को निमंत्रण दिया है कि आ भाई मुझे मार।
मरता क्या न करता। पूछा और क्या दिखाऊँ ? पी यू सी ? मुँह से तो निकल गया पर डर गया कि रिन्यू पता नहीं किया या नहीं। बस फिर क्या ! वही हुआ जिसका डर था। एक महीना पहले समाप्त हो गया था। मरता क्या न करता चालान भी कट गया।अफसोस इस बात का था कि इस परेशानी का कारण भी मैं ही था। खुद ही बैल को मारने का न्यौता दिया। इसके बाद सारा दिन कैसा बीता होगा यह तो सब समझ ही गए होंगें।
