Abhishek Mishra

Tragedy


3.9  

Abhishek Mishra

Tragedy


दिल :- एक घर

दिल :- एक घर

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 बरसात का दिन था, सावन का महीना। आकाश में सुनहरी घटाएं छाई हुई थीं। रह-रहकर रिमझिम वर्षा हो रही थी। अभी दूसरा पहर ही था, पर ऐसा मालूम हो रहा था कि शाम हो गई है। आमो के बाग में नर व नारियां स्वच्छंद विचरण कर रहे थे। कुछ नहीं आना नहीं चाहते थे पर मानो स्त्रियों के आकर्षण ने उन्हें खींच लिया हो। कुछ नारियां बगीचे के बीचों बीच में कजली गा रही थी, तो कुछ बारहमासा। बगीचे की कुछ ही दूरी पर एक नाला था और नाले के किनारे बसा एक गांव। गांव का नाम शरदपुर था, जिसमें दिलबहार नाम का एक आदमी रहता था। दिलबहार करीब 6 फीट लंबा था। गोल मुंह तथा घुंघराले बाल थे उसके। भुजाओं में इतनी दम कि बड़े-बड़े पहलवानों के दांत खट्टे कर दे, फिर भी भगवान में सच्ची निष्ठा रखता था। अभी भगवान ही उसके सब कुछ थे। वो ही माता, वो ही पिता, और वो ही दोस्त।

दोस्त होने के नाते भगवान के साथ कभी-कभी वह, हंसी के पल गुजार लेता था। कभी-कभी अपनी होने वाली प्रदर्शनी के बारे में जब कुछ लिखता तो उसे भगवान को जरूर पढ़ देता। शायद वा मेहरबान हो जाए और जल्दी शादी करा दे।

शेख साहब की बड़ी बेटी सुखदा शादी योग्य थी। बस भगवान की माया समझो ,अगली सुबह शेख बड़े ही सवेरे ,अपनी बेटी की शादी का प्रस्ताव लेकर आ गए। शेख शहर के बड़े महाजनो में से एक थे। अपनी बेटी को अपनी जान से भी ज्यादा प्यार करते थे। शादी की सारी सहमति बन गई मगर, एक बात दोनों पक्षों को खटक रही थी।

शेख बड़ी धूमधाम से अपनी इकलौती बेटी की शादी करना चाहते थे, और हो भी क्यों ना एक तो इकलौती बेटी, दूसरा पढ़ी-लिखी और तीसरा कुछ शेख जी का स्वार्थ। छोटे से गांव में अपनी बड़ी छाप छोड़ना चाहते थे। छोटे से गांव में अपनी बड़ी छाप छोड़ना चाहते थे।

वहीं दूसरी तरफ बाप-बेटों का कहना था कि शादी शांतिपूर्वक ढंग से, ज्यादा शोर शराबा ना करते हुए हो। खैर किसी तरह मामला सुलझा और शादी की तिथि निकली 26 अप्रैल। यह जानकर दिलबहार के दिल में प्यार की ऐसी बहार आई कि मानो सारे दुखों का सर्वनाश कर गई। उधर बेटी शादी के खबर पाकर ज्यादा खुश नहीं थी। उसे कहां वक्त है कि अपने होने वाले पति के साथ समय व्यतीत करें। और एक ही आदमी के पास रहते- रहते, बोर भी तो हो जाएगी ना। क्या पता शरद पुर में स्विमिंग पूल या अन्य सुविधाएं हो या ना हो? इसकी भी तो कोई गारंटी नहीं कि उसका होने वाला पति उसकी जरूरतों को पूरा कर सके।

आखिर वह दिन आ गया जिसको बाहर जी को बहुत बेसब्री से इंतजार था। शादी संपन्न हुई।

पहली बार जब उसने अपनी होने वाली पत्नी को देखा, तो वह उसे स्वर्ग की कोई देवी लगी। पर वह यह सोचकर घबरा गया कितनी सुंदर चेहरे को वह जिम्मेदारी के साथ रख पाएगा? धीरे-धीरे बाहरजी मानो अपनी गृहस्थी स्थापित कर ली पर सुखदा उससे खुश नहीं थी। वह अंदर ही अंदर घुट रही थी। वह सोच रही थी कि पापा ने यह मेरे गले में कैसा फाश पास डाल दिया है। यहां ना तो सही घर है। अगर लड़के को देखकर उन्होंने मेरी इससे शादी कराई होगी, तब भी मैंने उनसे अच्छे-अच्छे को को यूं ही नकार दिया था।

यह वातावरण सुखदा न झेल पाई और एक दिन बहार जी पर अंगारे उगलने लगी। उसने कहा," जरा सुनो! मैं इस घर में एक पल भी ना रुकूँगी। या तो मेरे लिए कोई घर बनवाओ नहीं तो मैं चली।

दिलबहार एक इज्जतदार इंसान था। यह बात सुनकर उसके रोंगटे खड़े हो गए। उसने सुखदा को समझाना चाहा। उसने कहा सुखदा घर बनवाने से पहले या तो जानो घर कहते किसे हैं? घर में रहने वाले लोग, उनके बीच परस्पर प्रेम, और प्रेम में अपनों के लिए कुछ भी कर जाने की हिम्मत से घर की जो दीवार खड़ी होती है उसे कोई भी नहीं तोड़ सकता। फिर चाहे वह तुम्हारा आलीशान महल हो या मेरी छोटी कुटिया। सुखदा मैंने तुम्हें दिल से चाहा है और अगर तुम घर में रहने के बजाय, मेरे दिल में रहो तो तुम्हें बहुत आराम होगा।अगर नहीं चाहता तो सीख चाचा की तरह आलीशान महल रिश्वत के दम पर खड़ा कर सकता था, पर मैं उस रिश्वत को हराम समझता हूं। इसे तुम अच्छाई समझो या बुराई। मुझे बुराई के मार्ग पर चलने के लिए विवश मत करो यह कहते यह कहते-कहते बहार जी के आंखों में आंसू आ गया और बाहर चले गए!



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