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Debajyoti Abinash

Drama Tragedy Inspirational


4  

Debajyoti Abinash

Drama Tragedy Inspirational


देवी

देवी

15 mins 293 15 mins 293


मुझे याद है जब पिछले दिसंबर मैं बुर्ला गया था, अपनी पत्नी सारिका और 12 साल की बच्ची स्वधा को लेकर। वहाँ देवी भगवती महातारा जी का आश्रम था। वो बाकी सब लोगों के लिए बहुत बड़ी देवी उपासिका थीं, माँ काली की भक्त, जिन्हे लोग श्रद्धा से माताजी बुलाते थे। पर मेरे लिए तो वो मेरी चीनू बुआ ही थीं। उनके चिन्मयी दास उर्फ़ चीनू से माताजी बनने के बाद मैं उनसे फिर कभी नहीं मिला था। पर एक दिन अचानक गाँव से खबर आयी थी के उनकी तबियत बहुत ज्यादा ख़राब हो चुकी है और दिन व दिन बिगड़ती ही जा रही है। वो अब चल फिर भी नहीं पा रही। पता नहीं कब क्या हो जाये कुछ कह नहीं सकते। मुझे ये खबर सुन बहुत दुख हुआ, पता नहीं क्यों एक दम से रोना आ गया, जब के उनसे इतने सालों से मेरी बातचीत तक नहीं हुई थी, मिलना तो दूर की बात। बचपन के दिन याद आ गये थे शायद। ऐसा नहीं है के कभी मिलने का मौका नहीं मिला। मिला था बहुत बार। वो हर साल गाँव में एक बार जरूर आती थीं दर्शन देने और धर्म चर्चा करने। ऐसा बहुत बार हुआ है के मैं भी उस वक़्त गाँव में ही होता था। पर मैं ठहरा नास्तिक, इन सब चीज़ों से मुझे नफरत सी है। तो मैं कभी उनसे मिलने जाता नहीं था। 


चीनू बुआ मेरी सगी बुआ नहीं थीं। वो हमारे पड़ोस में रहती थीं। मेरे बाबा की कोई बहन ना होने के वजह से वो उन्हें राखी बांधती थीं। तो उनके और हमारे परिवार के बीच रिश्ता काफी मजबूत था। हम 4 भाई बहन थे, मैं तीसरा। पर चीनू बुआ को सबसे ज्यादा लगाव मुझसे ही था। मुझसे वो सबसे ज्यादा प्यार करती थीं। दिन भर मेरे पास रहती थीं, मेरा हर काम करती थीं,बचपन में नहला देती थीं,खाना खिला देती थीं, और पढ़ाती भी थीं। सब लोग तो ये बोलके मज़ाक उड़ाते थे के बिट्टू चीनू का बेटा है। मैं और मेरा छोटा भाई लगभग एक ही उम्र के थे। तो चीनू बुआ के वजह से मेरी माँ का काम भी हल्का हो जाता था। दो दो बच्चों की जिम्मेदारी उठाने से तो कहीं ज्यादा बेहतर था सिर्फ एक ही बच्चे के पीछे भागना। तो वो भी खुश थीं। मैं भी चीनू बुआ से बहुत प्यार करता था, शायद मेरी माँ से भी ज्यादा। पर वो हमेशा साथ थोड़े ही रहने वाली थी। उनकी शादी की उम्र हो चली थी। उनके लिए रिश्ते आने शुरु हो गये थे। मैं बिल्कुल भी नहीं चाहता था के चीनू बुआ शादी करके मुझे छोड़कर कहीं भी जाएं, पर हम जो चाहते हैँ वैसा हमेशा थोड़े ही होता है। वैसे भी चीनू बुआ के पिताजी यानी के मेरे छोटे दादा जी इतने ज्यादा पैसेवाले नहीं थे। तो उनको भी जल्दी थी बुआ की शादी की ताके उनके सर का बोझ हल्का हो। 


मुझे याद है तब में सातवीं कक्षा में था जब चीनू बुआ की शादी हुई थी। उनके विदाई के वक़्त में उन्हें पकड़ के बहुत रोया था। मैंने जिद्द पकड़ लिया था के मैं बुआ को जाने नहीं दूंगा। बुआ भी बहुत रोई थीं। सब लोग हँसे थे मुझे देखकर और चिढ़ाया भी बहुत था। उसके बाद बुआ शायद 1-2 बार ही घर आयीं थीं। मुझे याद है जब वो आखिरी बार आयी थीं, मुझे गले लगा के बहुत रोई थीं। शायद मेरी बहुत याद आती थी उन्हें। फिर दशहरा की छुट्टियां चल रही थीं जब बुआ के ससुराल से खबर आयी के बुआ के अंदर पिछले रात अष्टमी पूजा के वक़्त देवी माँ आयीं थीं और उन्होंने बुआ को सब कुछ त्याग कर जीवन भर उनकी पूजा और सेवा करने का आदेश दिया है। और उसके साथ साथ सारे गांव वालों से कहा है के अगले पूरनमासी से पहले गाँव के बाहर उनके लिए एक मंदिर और आश्रम बनवाएं, जहाँ चीनू बुआ रहकर उनकी सेवा करेंगी। उनका कहना था के देवी माँ ने चेतावनी दी है के अगर इस काम में ज़रा सी भी देरी हुई तो गाँव में बहुत बड़ी विपदा आएगी। फिर क्या अगले पूर्णिमा को मंदिर का उदघाटन हुआ, आश्रम की प्रतिष्ठा हुई, बहुत बड़ा यज्ञ हुआ और बहुत बड़ी मेला भी लगी। बुआ के घर वाले और मेरे घर वाले भी वहां गये थे। मुझे याद है माँ ने घर लौट कर बताया था के बुआ ने चिन्मयी या चीनू नाम त्याग कर नया नाम अपनाया है, देवी भगवती महातारा जी और अपने आपको देवी माँ की सेवा में समर्पित कर दिया है।  


धीरे धीरे ये बात आस पास के गाँवों में भी आग के तरह फैल गयी। लोग देवी माँ और बुआ के दर्शन करने के लिए आश्रम आने लगे। बुआ लोगों की दुविधा सुनकर देवी माँ से उनके लिए प्रार्थना करती थीं। और लोगों का मानना था के देवी माँ बुआ की हर बात सुनती थीं और भक्तों की हर दुविधा दूर कर उनकी झोली भर देती थीं। धीरे धीरे बुआ के भक्तों की संख्या बढ़ती गयी। दूर दूर से लोग बुआ से मिलने आने लगे, यहाँ तक के बड़े बड़े पैसेवाले लोग, नेता मंत्री,और अधिकारी भी। बुआ लोगों के बुलाने पर जगह जगह जाकर सभा करती थीं और देवी माँ के गुणगान करती थीं, लोगों को आशीर्वाद देती थीं। उन्हें लोग श्रद्धा से माताजी बुलाने लगे थे। वो हर साल हमारे गाँव भी में एक बार जरूर आती थीं। पर वो कभी किसी के घर नहीं आती थीं। उनके रहने और खाने पीने की मंदिर में अलग व्यवस्था होती थी। गाँव के सभी लोग उनके सभा में जाते थे, यहाँ तक के मेरी माँ, दादी और मेरे बाबा भी। मुझे तो ये देखकर हैरानी होती थी के वो लोग भी बुआ को माताजी कहकर बुलाते थे और मेरे बुआ बोलने पर मुझे टोकते भी थे। पर जैसे के मैंने पहले ही बताया है मैं नास्तिक हूँ। मैं ये सब भगवान, धर्म में यकीन नहीं करता। मुझे ये सब ढोंग लगते थे। इसीलिए बुआ को देखने के लिए मन में बहुत इच्छा होने के बाद भी में कभी उनके सभाओं में नहीं जाता था। 


फिर उसके बाद गाँव में मेरा रहना बस 3-4 साल ही हुआ। दसवीं के बाद पढ़ने के लिए मैं शहर चला आया हॉस्टल में। गाँव में सिर्फ छुट्टियों में ही जाता था। फिर पढ़ाई ख़तम हुई फिर नौकरी, फिर सारिका से शादी, फिर स्वधा का जन्म। इसी बीच दादी और फिर अभी कुछ साल पहले बाबा की भी मौत हो चुकी है। मेरा तब से कभी भी बुआ से मिलना नहीं हुआ था। पर पिछले दिसंबर जब माँ से बुआ की तबियत के बारे में सुना तो मुझसे रहा नहीं गया। माँ ने मेरे शादी के वक़्त भी और स्वधा के पैदा होने के वक़्त भी मुझसे बहुत कहा था के बुआ से मिल के उनका आशीर्वाद ले लूं। पर मैं जिद्द करके हमेशा बात को टाल देता था। पर तब पता नहीं क्यों मुझे लगा के मुझे सारिका और स्वधा को भी अपने साथ लेकर जाना चाहिए बुआ से मिलने जाने के वक़्त। तो हम तीनों सुबह सुबह निकल पड़े बुर्ला जाने के लिए। हम जब वहां पहुंचे तो सुबह के 9.30 बजे थे। वहां एक मंदिर था और आश्रम तो बहुत ही बड़ा और सुन्दर था। मेरी पत्नी ने मंदिर जाकर देवी माँ के दर्शन किये। फिर अपना परिचय देकर बुआ के बारे में पूछने पर नारंगी रंग की साड़ी पहनी हुई एक 18-19 साल की लड़की हम सबको लेकर बुआ के कमरे के पास छोड़ आयी। मेरी नज़र जब बिस्तर पर सोई हुई चादर में ढकी उस बीमार कमज़ोर औरत के ऊपर पड़ी तो मेरा दिल भर आया पर सारिका और स्वधा के वहां होने के वजह से मैंने अपने जज्बातों को काबू में रखा। 


मैंने बुआ के पैर छुए और गला साफ करके धीमी आवाज़ में बोला, "बुआ! मैं बिट्टू। आपसे मिलने आया हूँ। ये मेरी पत्नी सारिका और ये मेरी बच्ची है स्वधा।" एक एक करके सारिका और स्वधा के उनके पाँव छूकर प्रणाम करने के बाद बुआ ने कमज़ोर नज़रों से हम तीनों के तरफ देखा। मैं तब तक अपने आपको सम्हाले हुए खड़ा था पर जब मेरी नज़र बुआ के आँखों से बहती आंसूओं पर पड़ी, मैं अपने आपको रोक ना सका और उन्हें पकड़कर फुट फुट कर बच्चों के तरह रोने लगा और बुआ से माफ़ी माँगने लगा के इतने सालों में एक बार भी मैं उनसे मिलने नहीं आया। मुझे अब कोई परवाह नहीं थी के मेरी बीवी और बच्ची मेरे पास खड़े थे। कुछ देर बाद मैंने बुआ के कांपते हुए दाहिने हाथ को मेरे सर पर मेरे बालों को सहलाते हुए पाया। मुझे बचपन जे वो दिन याद आ गये जब बुआ ऐसे ही मेरे बालों को सहलाते हुए मुझे सुलाया करती थी, और हर सुबह स्कूल जाने से पहले मेरे हजार बार ना बोलने के बावजूद मेरे सर पर जबरदस्ती नारियल का तेल लगा दिया करती थी। मैं अब और भी जोर से रोने लगा। इतने समय में पहली बार मुँह खोलकर बुआ ने मुझे चुप होने को कहा। मैंने कुछ वक़्त बाद अपने आप को सम्हाला और बुआ के सर के पास एक कुर्सी डाल कर बैठ गया। बुआ ने सारिका और स्वधा को अपने पास बुलाया और पहले सारिका के सर पर हाथ रख कर उसे आशीर्वाद दिया। फिर स्वधा को सर झुकाने का इशारा करके उसके माथे को चूम लिया। मैंने सर उठाकर सारिका के तरफ देखा तो पाया के उसके आँखों में भी आँसू थे। 


बुआ ने मुझे मेरे बारे में, मेरे सेहत के बारे में, नौकरी के बारे में, और माँ और गाँव के बारे में ऐसे बहुत कुछ पूछा। ऐसा लग रहा था मानो इतने सालों से इन सारे सवालों को अपने सीने में दबाये बैठी थीं वो। मेरे इतने सालों तक उनसे मिलने ना आने का थोड़ा अभिमान भी जताया, डांटा भी पर मेरे माफ़ी माँगने पर बोली के मैं तो उनका बेटा हूँ और वो कभी मुझसे नाराज़ होती सकती हैं क्या? उन्होंने सारिका से भी कुछ सवाल पूछे, घर के बारे में, उसके परिवार वालों के बारे में, उसकी नौकरी के बारे में और फिर स्वधा से भी पढ़ाई और स्कूल के बारे में पूछा और ये भी के मैं उसे मारता तो नहीं हूँ ना? कुछ देर बाद वही लड़की जो हमें बुआ के पास छोड़ के गयी थी वो हमें खाने के लिये बुलाने आयी। बुआ ने हम लोगों से पहले जाकर खाना खा लेने को कहा क्यों के हम लोग इतने दूर से आये थे और इतने देर से उनके पास ही बैठे थे। हम लोग उठ के जाने ही वाले थे के बुआ ने मुझे रोक कर खाना खाने के बाद उनके पास आने को कहा। 


खाना खाने के बाद मैंने सारिका को कहा के स्वधा को आश्रम का बगीचा घूमा लाये और खुद बुआ के पास चला गया। बुआ ने मुझे अपने पास बिठा लिया और मेरा हाथ पकड़के बोली, "बिट्टू, यकीन कर मैं तुझसे बिल्कुल भी नाराज़ नहीं हूँ। मुझे पता है के तू मुझसे मिलने क्यों नहीं आता था। मैं जानती हूँ के तू ये सब भगवान, धर्म, पूजा पाठ में यकीन नहीं रखता। बचपन से ऐसा ही तो है तू। तूने शायद इस बारे में कभी सोचा ना हो, पर तेरे नास्तिक बनने के पीछे की वजह भी तो शायद मैं ही हूँ। मैं भी इन सब चीज़ों में बिलकुल यकीन नहीं रखती थी। अब भाभी ने तो तुझे पूरी तरह से मेरे हवाले छोड़ दिया था। हर वक़्त तो तू मेरे साथ ही रहता था। अब बच्चा जैसी संगत में रहेगा वैसा ही तो बनेगा,जो देखेगा वही तो सीखेगा, उसके दिमाग़ पर वैसा असर पड़ेगा। मैंने तुझे कभी भगवान की कथा नहीं सुनाई। तुझे सुलाते वक़्त कभी देवता और राक्षसों की कहानी नहीं सुनाई। तुझे कभी मंदिर लेकर नहीं गयी, ना पूजा करना सिखाया और ना ही परीक्षा के पहले तुझे कभी ये बताया के भगवान का आशीर्वाद लेकर जा या भगवान का नाम लेकर लिखना शुरु करना।" बुआ की बातें सुनकर मुझे भी कहीं ना कहीं यही सच लगा। मैं बचपन में हर वक़्त बुआ के साथ रहता था। पर मैंने कभी भी बुआ को मंदिर जाते, पूजा करते, व्रत या उपवास रखते नहीं देखा था। वो मुझे देवता राक्षसों की नहीं बल्कि बाहर के देशों की कहानियाँ सुनती थीं। शायद वो सच बोल रही थीं। इन सब का ही असर हुआ होगा मेरे दिमाग और विचारों पर। 


कुछ देर रुक कर बुआ ने फिर से बोलना शुरु किया। "तू अब सोच रहा होगा के मैं फिर ये कैसे बन गयी जो आज मैं हूँ, जो आज मेरी पहचान है। और क्यों? इसके पीछे भी मेरे अपने वजह हैं। तुझे तो हमारे परिवार के आर्थिक स्थिति के बारे में पता ही था। इतना पैसा कहाँ था पिताजी के पास। इसीलिए ही तो वो मेरी शादी को लेकर इतनी जल्दबाजी में रहते थे। अच्छा रिश्ता और कम दहेज़ का सुनकर ही उन्होंने मेरी शादी के लिए हाँ कर दिया था। अब तुझ से क्या ही छुपाना? सच कहूं तो शादी के बाद मैं दहेज़ में इतना कुछ लेकर नहीं गयी थी। पर ये उन लोगों ने ही तो कहा था के हमे बस लड़की चाहिए, चाहे सिर्फ दो जोड़ी कपड़े के साथ ही क्यों ना आये। सिर्फ इसी वजह से ही तो पिता जी शादी के लिए राज़ी हुए थे। पर शादी के बाद वो लोग तरह तरह ही मांग करने लगे और मुझपर दबाव डालने लगे पिताजी से बोल के वो सब चीज़ें मंगवाने के लिए।


मैं चुपचाप सब सुनती रहती थी पर पिताजी से कुछ नहीं कहती थी। पर एक दिन जब मेरी सास से मुझे अपने पति के लिए स्कूटर खरीदने के पैसे पिताजी से माँगने के लिए कहा तो मैंने साफ साफ मना कर दिया के मैं ऐसी मांग पिताजी से नहीं करुँगी। उस दिन ऑफ़िस से लौटने के बाद मेरे पति ने मुझे गालियां दे दे कर अपने बेल्ट से मारना शुरु कर दिया। मैं अपने आप को बचाने के लिए घर से बाहर भागी तो रास्ते पर मुझे सबके सामने मारा। सब वहां खड़े देख रहे थे पर कोई भी मुझे बचाने या मेरी मदद करने नहीं आया। उसके बाद वो रोज़ मुझे पैसे माँगने को कहता था। मैं मना करती रही और हर रात चुपचाप मार खाती रही कभी हाथ से, कभी पैर से, कभी बेल्ट से, कभी झाड़ू से। पर मैं तो अपने घर के हालात जानती थी ना। इसीलिए मैं पिताजी से कभी कुछ नहीं कहती थी। 


उन लोगों को पता चल गया था के चाहे वो लोग कुछ भी कर लें मैं घर से कुछ मांग नहीं करुँगी। तो एक दिन उन लोगों ने मुझे बाँध कर मेरे ऊपर मिट्टी का तेल छिड़क दिया और धमकी भी दी के इस बार कुछ नहीं किया पर जल्दी अगर स्कूटर ना मिली तो अगली बार आग भी लगा देंगे। मैं वहीँ पर पड़ी रोती रही। अगले दिन मेरा पति मुझे घर छोड़ आया ताके मैं पिताजी से स्कूटर के पैसे मांग सकूँ। तुझे याद तो होगा ही तू मुझसे मिलने भी आया था और मैं तुझे पकड़कर बहुत रोई थीं? मैंने पिताजी को सब कुछ बताया और विनती की के मुझे बचा लें। मैं वहाँ वापस नहीं जाना चाहती थी। मैंने पिताजी से कहा के मुझे घर रहने दें। पर पिताजी ना तो इस हालत में थे के मेरे ससुराल वालों को स्कूटर के पैसे दे सकें और ना ही उनके पास इतनी हिम्मत और इतना साधन था मुझे ज़िन्दगी भर के लिए घर पे बिठा सकें। उन्होंने मेरे पाँव पकड़ लिए और रोते हुए मुझसे माफ़ी माँगने लगे। मैंने उनको इतना लाचार कभी नहीं देखा था। मैं भी उन्हें पकड़ के बहुत रोई। 


मैं पूरी रात रोते हुए सोचती रही के मैं क्या करूँ? मेरी गलती क्या है जो मुझे ये सब सहना पड़ रहा है? एक बार तो सोचा के खुदखुशी कर लूं। वैसे भी तो वो लोग मुझे मार ही ड़ालते। पर पता नहीं क्यों मुझे ऐसे लगा जैसे कोई मेरे अंदर से मुझे मना कर रहा हो। मैंने खुदखुशी का ख्याल अपने दिमाग से निकल फेंका और अपने मन को मजबूत बनाया। मैंने सोच लिया था के मुझे क्या करना है। दो दिनों के बाद मैं अपने ससुराल चली आयी। वहां पहुँचते ही वो लोग मेरे पीछे पड़ गये। मैंने उनको बताया के पिताजी ने 15 दिन का वक़्त माँगा है। उन लोगों ने मुझे और मेरे पिताजी को गाली दी पर ज्यादा कुछ नहीं किया या कहा। और मैं दो दिन तक इंतज़ार करती रही। उस दिन दुर्गाष्टमी थी। मैं पूरी तरह से तैयार थी। रात को जब देवी मंडप में ढ़ोल बजने शुरु हुए तो मैं अपने बाल खोलकर, माथे पर सिंदूर मलकर मंडप के तरफ भागी। मेरी सास ने जब मुझे देखा तो वो भी चिल्लाते हुए मेरे पीछे पीछे भागी और उसके बाद बाकी के घर वाले और आस पड़ोस के लोग भी।


मैं जाकर सीधा माँ की मूर्ति के सामने घुटनों के बल बैठ गयी और ढोल की आवाज़ के साथ ताल मिलाकर झूमने लगी। मेरी हरकतें, लाल साड़ी, खुले हुए बाल और माथे पर लगा सिंदूर देखकर पुजारी जी को क्या हुआ है समझने मैं बिलकुल भी वक़्त ना लगा। और कुछ ही पल में हर तरफ हल्ला मच गया के मेरे अंदर देवी माँ आयीं हैँ। पुजारी जी ने माँ के मूर्ति के गले से मंदार का हार निकाल कर मेरे गले मैं पहना दिया। ढ़ोल नगाड़े और जोर से बजने लगे। चारों तरफ लोगों के जयजयकारे गूंजने लगे। कुछ देर झूमने के बाद सही वक़्त देखकर मैंने सबको बताया के मैं देवी माँ हूँ और मुझे ये बच्ची यानी के मैं पसंद आ गयी हूँ। मैंने सबसे कहा के ये आज से मेरी सेविका है और जीवन भर मेरी आराधना के लिए मैंने इसका चयन किया है। आज के बाद से इसका इस संसार में कोई नहीं और ये किसी की कुछ भी नहीं। ये सिर्फ मेरी दासी है। 


फिर मैंने पुजारी जी के तरफ देख के उनसे कहा के गाँव के बाहर जो नीम का पेड़ है वहीं पर मुझे रहने की इच्छा है और सारे गांव वाले मिलकर मुझे अगले पूर्णिमा से पहले वहां पर मेरा एक मंदिर बनवायें और पास ही मैं मेरी सेविका के लिए एक आश्रम का निर्माण करें। मैं उसके जरिये सबकी विनती सुनूंगी और दुख दर्द दूर करुँगी। पर अगर ऐसा नहीं हुआ तो फिर सब को मेरे क्रोध का सामना करना पड़ेगा और गांव के ऊपर बहुत बड़ी विपदा आएगी। इसके बाद क्या क्या हुआ ये तो तुम्हें पता ही है। मुझे अपने आपको बचाने के लिए ये सब करना ही पड़ा। क्यों के यहाँ लोग देवी की पूजा तो करते हैं पर नारी की की कोई नहीं सुनता। तो मैंने सोचा शायद ये लोग देवी की ही सुन लें। ये सब मैंने आज तक किसी को भी नहीं बताया। अपने घर वालों को भी नहीं। पर आज तुझे बता रही हूँ।" 


इतना कहकर बुआ चुप हो गयीं। मैं ये सब सुनने के बाद एक दम हक्का बक्का हो गया था। मुझे समझ नहीं आ रहा था के क्या कहूं। मैंने एकबार बुआ के चेहरे के तरफ देखा और पाया के बुआ मुस्कुरा रही थीं। मुझे उनके आँखों में एक अलग चमक दिखी। उनके चेहरे पर एक अलग सा तेज़ था। मेरे आँखों में आँसू थे पर मेरे होठों पर एक मुस्कान खिल गयी। बुआ के चेहरे को देख पता नहीं क्यों मुझे अपने अंदर भी और अपने आस पास भी एक शक्ति के अस्तित्व का अनुभव हो रहा था। ऐसा मैंने पहले कभी महसूस नहीं किया था। मैं अपने कुर्सी से उठा और बुआ के पैरों को दोनों हाथों से पकड़कर अपने माथे से लगा लिया। 



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