अमन सिंह

Drama Romance Thriller


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अमन सिंह

Drama Romance Thriller


डॉरबेल

डॉरबेल

12 mins 49 12 mins 49

कहते हैं ज़िंदगी में ईश्क़ तब होता हैं जब दिल के दरवाज़े पे किसी के दस्तक़ देने से दिल की घंटी बजे और महसूस हो की कोई सारी उम्र साथ रहने के लिए आ गया हैं।

मेरी कहानी भी कुछ ऐसी ही हैं,मैं मोहित कुछ ज़्यादा मनमोहित उसपर से बनारसी ईश्क़ न करे ऐसा हो नहीं सकता हैं।

मेरे पापा ऑफिस एम्प्लॉयी हैं इतना कमा लेते हैं की मेरी और मेरे माँ की ख़्वाहिश पूरी कर सकें।मेरी माँ बड़ी सीधी इतना की अग़र पापा घर पे हो छुट्टी में तो सारा का सारा काम पापा ही करे,माँ और मैं बैठकर दिनभर टीवी देखें।ऐसा कुछ भी नहीं हैं,जितना काम मेरी माँ अकेले कर लेती हैं, उतना काम तो मैं औऱ पापा मिलकर भी ना कर पाए।

तो हुआ कुछ ऐसा था उस दिन। मैं घर से ऑफिस के लिए निकल ही रहा था,सीढ़ियों से उतरते वक़्त एक आंटी मिलती हैं उनके हाथ में थैला था भारी सा शायद! कुछ ज़्यादा ही थक गयी थी वो,इसीलिए मैंने उनकी मदद की सोची

"अरे आंटी लाइए मैं पहुँचा देता हूं"इतना कहते ही सामान मेरे हाथों में दे वो सीढ़ियों पे ही बैठ जाती हैं।

"आंटी फ़्लैट नंबर क्या हैं?"मैंने उनसे पूछा

"34 हैं बेटा मेरी बेटी होगी दरवाज़ा लॉक होगा बेल बजाओगे तो खोल देगी"इतना कह आंटी पल्लू से ही हवा देने लगती हैं ख़ुद को औऱ मैं ऊपर आ जाता हूं।

घंटी बजाते ही दरवाजा खुला औऱ मुझें बिना देखें ही बोली वो "अरे मम्मी आ गयी आप इतनी देर क्यों लगा दी आने में" जैसे रिपोर्टर 100 खबरें 100 मिनट में पढ़ता हैं,बिल्कुल वैसे ही। क़सम से ज़िंदगी में घंटी बजाने का मज़ा बचपन के बाद अब आया था,लेक़िन एक फ़र्क़ भी हैं बचपन में बजाकर भाग जाते थे औऱ आज रुके ही रहने का मन किया।

"अरे मैं मोहित आपके सामने वाले फ़्लैट में रहता हूं,मैं नीचे जा रहा था तभी आंटी मिली तो मैंने मदद कर दी वो थक गयी थी थो,वो आ रही हैं अभी"इतनी सारी बातें मैं ऐसे कह रहा था जैसे मुझें कोई सवाल पूछा गया हो।

"ओह थैंक यू सो मच" इतना कह वो अंदर चली गयी क्योंकि मैं कुछ ज़्यादा ही सधी नज़रो से उसे घूरे जा रहा था।

तभी मेरी अक्ल खुलती हैं की मैं तो घर से ऑफिस के लिए निकला था,फटाक से मैं एक दो सीढियां डाका ही था आंटी ऊपर आ रही मिल गयी।

"सामान पहुंचा दिया आंटी आपका" मैंने उनसे कहा

"थैंक यू बेटा ख़ुश रहो हमेशा" सर पे हाथ फेरते हुए उन्होंने कहा।

"औऱ हां आंटी कोई भी जरूरत हो या दिक्कत हो सामने मेरा ही फ़्लैट हैं बता दीजिएगा मैं तो अभी ऑफिस जा रहा माँ हैं घर पे मैं उनसे कॉल करके कह दूंगा" ये कह मैं ऑफिस के लिए निकल लिया उस दिन मैं ऑफिस 30 मिनट लेट पहुंचा तो बॉस की हल्की सी वार्निंग वाली डांट सुननी पड़ी। तभी मुझें ख़्याल आया की माँ को कॉल करना हैं।

"हेल्लो मां"

"हां बेटा बोल"

"वो सामने वाले फ़्लैट में नए किरायदार आये हैं ज़रा उनकी मदद कर देना ठीक हैं अब मैं जा रहा काम हैं लव यू"

इतना कह मैं अपने ऑफिस के कामों में लग गया मग़र मन कहां लगने वाला था मेरा उसके चांद से चेहरे पे उसके लहराते ज़ुल्फों को जो देख लिया था। उसकी छोटी सी नाक,ग़ुलाबी होठ औऱ भूरी नज़रे हाय! मेरा दिल पिघलाने के लिए एकदम काफ़ी थे। 

जैसे तैसे करके मेरा दिन बीता मैं ऑफिस से सीधे घर के लिए निकला वैसे तो मैं बिना चाय पिये नहीं जाता था मग़र आज कुछ ज़्यादा ही जल्दी थी घर जाने की न जाने क्यों!

शाम को घर पहुंचकर मैंने घंटी बजायी तभी तुरंत दरवाज़ा खुल गया।

"अरे उधर क्या देख रहा वो लोग समान सेट करके सो रहें हैं औऱ दोपहर का खाना दे आई थी मैं" माँ बोली

अंदर आ मैं सोफे पे बैठा ही माँ बोली,

"जा हाथ मुहं धूल ले खाना लगाती हूं औऱ उसके बाद चाय बनाती हूं उनके यहां भी जाके दे दे"

"अरे माँ खाना वाना छोड़ो तुम चाय बनाओ जल्दी मैं हाथ मुहं धूल के आता हूं" उधर जाने के नाम पे सारे दिन की थकान औऱ भूख मिट ही गयी हो।

मैं हाथ मुहं धूल वापस आता हूं,

" ला माँ चाय दे औऱ टोस्ट भी दे दे उनके यहां दे आऊं तो आकर चाय पीयू" मैं कुछ ज़्यादा ही उतावला हो रहा था,

"तू कब से लोगों को चाय देने लगा इतने मन से तबियत तो ठीक हैं न तेरी अच्छा हां सुरभि को बुला लेना थोड़ा काम में मदद मिल जाएगी" माँ मुझें शक़ के निग़ाह से देखते हुए थरमस और टोस्ट थमाया।

"अरे नहीं माँ कुछ नहीं आके बात करता हूं ठीक हैं बोल दूंगा" मैं हंसते हुए बाहर आ गया।

फ़िर से घंटी बजायी इस बार भी वही थी मानो मेरी एक ही ख़्वाहिश रह गयी हो की ये वक्त यही रुक जाए।

"ये माँ ने चाय औऱ टोस्ट भिजवाया हैं सबके लिए औऱ तुम्हें बुलाया हैं किचन में मदद के लिए" इस बार मैं नज़रे फेर रहा था।

"ठीक हैं मम्मी पापा को चाय देकर आती हूं मैं"

उसके इतना कहते मैं चाय औऱ टोस्ट दे वापस चला आता हूं औऱ चाय लेके माँ से पूछता हूं "माँ तुझे कैसी बहु चाहिए!?"

"सुरभि जैसी"माँ का जवाब सुन मैं चौक जाता हूं।

"ये कौन सुरभि माँ?"मैं अनजान बनकर उनसे पूछता हूं।

"अरे वही सामने वाली जिसपर तेरा दिल आ बैठा हैं" माँ हंसते हुए बोली।

"माँ तू भी न पता नहीं कैसे जान लेती हैं सब"मैंने कहा।

इतने में घंटी फ़िर बजती हैं शायद सुरभि थी दरवाजे पर

"जा खोल दे दरवाज़ा तेरा प्यार तेरे घर आया हैं" माँ मेरा बाल सहलाते हुए बोली।

मैं दरवाज़ा खोला तो देखा पापा थे,

"अरे माँ मेरा नहीं आपका प्यार आया हैं पापा हैं आ गए ऑफिस से" मैं माँ से हंसते हुए बोला।

"कोई औऱ भी आने वाला हैं क्या भई!?"पापा हम दोनों के तरफ़ देखते हुए बोले औऱ जाकर सोफे पे बैठ जाते हैं,

इतने में सुरभि भी आ जाती हैं दरवाज़ा खुला ही था।

"नमस्ते अंकल" सुरभि पापा का पैर छूते हुए बोली।

"आप कौन बेटा" पापा सुरभि से बोले मेरा तो मन हुआ की बोल दे आपकी होने वाली बहु इतने में माँ बोली।

"अरे सामने रहने आये हैं आज ही नए हैं तो आज का खाना अपने यहां ही" मां पापा से कहती हैं।

लेक़िन मेरा ध्यान उनकी बातों पे कम औऱ सुरभि पर ज़्यादा था।

"चलो बेटा सुरभि आओ चलते हैं किचन में"माँ सुरभि को लेकर किचन में चली जाती हैं,मैं औऱ पापा हॉल में बैठे रहते हैं।अब मेरा मन उड़ाता,दौड़ाता,भागता हुआ किचन की तरफ़ ही जा रहा था।

तभी "अरे बेटा ज़रा एक ग्लास पानी पिलाने का कष्ट करेगा अपने बाप को" पापा के इतने कहते मैं किचन में घुस गया।फ़्रिज को ना देख बल्कि सुरभि को देख रहा था कमर पर दुप्पट्टा बांधे सब्जी काट रही थी। इतने में माँ को देखता हूं तो वो मुझें ही देख रही होती हैं मैं झट से पानी निकाल कर जाके पापा को दे देता हूं।

अब हॉल में बैठे मन लगे तब ना इतने में पापा से पूछता हूं,

"पापा कुछ खाएंगे लाऊं आपके लिए" पापा का ध्यान टीवी पे रहता हैं मेरे 3 बार दोहराने के बाद कहते हैं।

"नहीं प्रभु हमे कुछ नहीं खाना आप कष्ट न करे" बोले ऐसे जैसे उनको क़भी कुछ दिया ही नहीं।

कुछ वक्त पड़े पड़े गेम खेला मोबाइल पे तभी माँ औऱ सुरभि बाहर आ जाते हैं।

"बेटा आप नाहा लो औऱ आ जाओ खाने मम्मी पापा के साथ" माँ सुरभि से बोलती हैं।

"ठीक हैं आंटी" कह चली जाती हैं।

बस तब क्या कुछ देर बाद घंटी बजती हैं फ़िर 

"जा मोहित खोल दे" मैं झट से उठ जाता हूं।

"इसे कुछ हुआ हैं क्या जो इतना सुन रहा" पापा माँ से कहते हैं।

मैं दरवाज़ा खोलता हूं सामने अंकल आंटी औऱ सुरभि रहते हैं।

"नमस्ते अंकल आइए न अंदर आइए"मैं उनके अंदर आने के बाद दरवाज़ा बंद कर देता हूं। सुरभि के बाल खुले थे और भीगे भी क्या ग़ज़ब लग रही थी।

"नमस्कार भाईसाब-भाभीजी आइये चलिए खाना खाते हैं मोहित की मम्मी खाना लगाओ"

सब खाने बैठ जाते हैं तो सुरभि कहती हैं,

"आंटी और मैं बाद में खा लेंगे पहले आप लोग खाइये"

तभी सब लोग बैठ जाते हैं खाने मेरी नज़र तो सुरभि से हट ही नहीं रही थी,इतने में आवाज़,

"अरे मोहित बेटा ध्यान कहां हैं कब से पूछ रही कुछ चाहिए कुछ चाहिए सुन ही नहीं रहे" माँ मुझसे बोली।

"नहीं माँ कुछ नहीं चाहिए" मैंने जवाब दिया।

सब खाना खा चुके थे,अंकल आंटी औऱ पापा जाकर सोफ़े पे बैठ गए। माँ औऱ सुरभि खाना खाने लगे मैं अब भी सुरभि को ही देख रहा था। थोड़ी देर में वो दोनों भी खाना खा लेते हैं। फ़िर वो लोग अपने फ्लैट में वपास चले जाते हैं। मैं भी सोने चला जाता हूं अपने रूम में पर नींद कहां आने वाली थी आज,रात भर करवटें बदलता रहा बड़ी देर से आज सुबह हुई और तो औऱ मैं रात भर सोया ही नहीं था।

"अरे महाराज आपको कोई तकलीफ़ इतनी सुबह कैसे उठ गए" पापा हंसते हुए बोले इस बार उनके भाव थोड़े बदले थे शायद! माँ ने सब कुछ बता दिया था।

इतने में घंटी बजती हैं,

"मोहित ज़रा देख कौन हैं सुबह-सुबह" माँ बोली।

दरवाज़ा खोला तो देखा आंटी जी थी सामने,

"मोहित बेटा आज ज़रा सुरभि को शहर घुमा देगा वो अनजान हैं जान जाएगी तो अच्छा रहेगा और आज संडे भी हैं तो तुम्हारी छुट्टी भी होगी" आंटी मुझसे बोली इतने में पीछे से माँ कहती हैं,

"जरूर भाभीजी क्यों नहीं जरूर जाएगा" 

"ठीक हैं आंटी मैं नहा के तैयार होकर आता हूं सुरभि से कह दीजिए तैयार रहे" मैंने कहा।

थोड़ी देर में तैयार होकर में जाकर घंटी बजाता हूं,

सुरभि ही दरवाज़ा खोलती हैं,

"रुको आ रही एक मिनट" सुरभि बोली।

मैं गेट पर ही खड़ा रहा तभी सुरभि आती हैं और हम निकलते हैं। उस दिन हम सारा शहर घूमे आइसक्रीम खाये,

डोसा खाये,कॉफी पी औऱ पूरा शहर घूमे अब सुरभि थोड़ा घुल मिल गयी थी। पहले सिर्फ़ बातों पे बात करती थी अब ख़ुद से भी कुछ कहने लगी,

हम शाम में पानी पूरी खाकर घर लौटे अब सुरभि इस शहर से और मुझसे वाकिफ़ हो गयी थी। हम घर लौटे तो घर में जाते वक्त मैंने सुरभि से कहा की "खाने के बाद 10 बजे छत पे मिले?"

"हां ठीक हैं" इतना कह दोनों दोनों अपने अपने फ्लैट में चले गए।

फिर रात को मैं 9:40 पर छत पर पहुंचकर सुरभि का इंतेज़ार करने लगा इतने में सुरभि आ जाती हैं,

"औऱ खाना खा ली" मैंने पूछा ।

"नहीं ख़ाली पेट आयी हूं तुम भी न अरे खाकर ही आऊंगी न" सुरभि हंसते हुए बोली।

"अच्छा चांद देखो कितना खूबसूरत हैं न बिल्कुल तुम्हारी तरह" मैंने एक घटिया सी लाइन दे मारी।

"हां खूबसूरत तो हैं मग़र मेरी तरह नहीं" सुरभि बोली।

इधर उधर की बात हो ही रही थी की मेरे अंतर्मन से रहा नहीं गया औऱ वो कह दिया जिसे कहने लिए चूल मची हुई थी,

"सुरभि आई लव यू सो मच जबसे से तुम्हें देखा हैं तबसे ख़ुद को खो बैठा हूं" मैंने अपने इज़हार में बस इतना ही कहा,

"मोहित तुम बहुत अच्छे लड़के हो मग़र मैंने तुम्हें क़भी प्यार की नज़र से नहीं देखा औऱ रही बात प्यार मोहब्बत की तो मुझें इन सब चीजों पे विश्वास नहीं बुरा लगा तो सॉरी" इतना कह वो जाने लगी औऱ मैंने उसका हाथ पकड़ लिया,फ़िर क्या था गाल पर खींच के चांटा मारा उसने मेरा सारा ईश्क़ सर से उतर गया। वो नीचे चली गयी मैं भी नीचे चला आया। उस दिन के बाद हमारी 2 महीनों तक बात नहीं हुई लेक़िन उसे देखता जरूर रहता था मग़र वो मुझसे नज़रे चुराती थी। फ़िर एक दिन रात के वक्त घर की घंटी बजती हैं मैं उस दिन हॉल में ही सोया था उठकर दरवाज़ा खोला तो देखा आंटी थी घबराई हुई,

"मोहित बेटा सुरभि गिर गयी बाथरूम में उसके सर पे और पैर में चोट आयी हैं ज़्यादा औऱ उसके पापा भी घर पे नहीं हैं" आंटी मेरा हाथ पकड़ के बोली।

"रुकिए चाभी औऱ कार्ड ले लूं" मैंने उनसे कहा औऱ घर में जा चाभी ली औऱ मम्मी पापा को जगाया और कहा की सुरभि को चोट लगी हैं मैं हॉस्पिटल जा रहा आप घर अंदर से लॉक करले कॉल करके बात बताऊंगा सारी बात",

इतना कह मैं उनके फ्लैट में गया और सुरभि को देखा बेहोश थी उसे गोद में उठाया उसके सर से ख़ून अभी भी बह रहा था मैंने एक कपड़े से सर बांध दिया और आंटी से बोला "आप लॉक कर घर कार के पास आओ जल्दी"

मैं फ़टाफ़ट सुरभि को लेकर कार के पास आया औऱ उसे पीछे लिटा दिया और आंटी भी आ गयी थी,हम तुरंत हॉस्पिटल के लिए निकले 10 मिनट में हॉस्पिटल पहुंच भी गए। उसे गोद में उठाया औऱ इमरजेंसी वार्ड की तरफ़ भगा डॉक्टर औऱ नर्स वो सुरभि को लेकर ऑपरेशन थिएटर चले गए। कुछ देर बाद वो बाहर निकले औऱ बताया की "अब ठीक हैं वो बस सर पे ज्यादा चोट हैं औऱ पैर फ़्रैक्चर हैं,ब्लड लॉस ज़्यादा नहीं हुआ लेकिन अब ठीक हैं,ये कुछ दवाइयां हैं इसे मंगा लीजिए"

आंटी को वही बैठा मैं दवा लेने चला जाता हूं औऱ लेकर आ जाता हूं औऱ सारी रात वही रहता हूं,सुबह ही अंकल जी आ जाते हैं।

"सुरभि कैसी हैं बेटा अब" उन्होंने आते ही पूछा।

"अब ठीक हैं अंकल आप चिंता मत करिए" मैंने उनके कंधे पे हाथ रख के बोला।

"बेटा तुम्हारा शुक्रिया कैसे करुं तुमने मेरे कलेजे के टुकड़े को बचाया हैं मैं तुम्हारा ये एहसान क़भी नहीं भूलूंगा" इतना कह उन्होंने हाथ जोड़ लिया।

"अरे अंकल मैं भी तो आपका ही बेटा हूं" मैंने उनका हाथ नीचे करते हुए कहा।

कुछ दिन तक सुरभि हॉस्पिटल ही रही सुबह ऑफिस जाते टाइम उसके लिए घर से खाना लेकर जाता था रोज़ और शाम में टिफ़िन लेने के टाइम उसके लिए रसगुल्ले लेकर जाता था उसे काफ़ी पसंद थे रस्गुल्ले। रात का खाना भी मैं ही लेकर जाता था रोज़ एक दो दिन माँ औऱ पापा लेकर गए थे। पूरे 3 हफ़्तों बाद सुरभि घर लौटी थी अब बिस्तर पर ही रहती थी प्लास्टर लगा था। मैं ऑफिस से आने के बाद उससे मिलने जाता था रोज़ उसे कहानी सुनाता था उसका ख़्याल रखता था औऱ तो औऱ उसे मेरे साथ वक्त बिताना अच्छा भी लगता था।

एक दिन वो बोली "सॉरी मोहित उस दिन के लिए लेक़िन मैं प्यार व्यार पर भरोसा नहीं रखती"।

"अरे कोई नहीं मैं तो कब का भूल गया था" मैंने उससे कहा। मैं ऑफिस से आते उसके लिए हमेशा रस्गुल्ले लेकर आता था,वो बहुत ख़ुश होती थी। क़भी कभी तो वो मुझें ख़ुद से कह देती थी रस्गुल्ले लाने के लिए जब उसका मन होता था। फ़िर धीरे धीरे सुरभि ठीक हो जाती हैं,फ़िर एक दिन शाम में मैं सुरभि से मिलने ही जा रहा था।

मैंने घंटी बजायी तो आंटी ने दरवाज़ा खोला सुरभि भी सामने ही सोफे पे किसी लड़के के बग़ल में बैठी थी औऱ भी कुछ लोग आये थे,किसी शादी के तारीख की बात हो रही थी।

"अरे आओ बेटा अंदर आओ" आंटी बोली।

"नहीं आंटी अभी नहीं बाद में आता हूं" इतना कह मैं अपने फ़्लैट में आ जाता हूं,औऱ दरवाज़ा बंद कर रोने लगता हूं क्योंकि मुझें लग गया था की सुरभि की शादी तय हो चुकी हैं। मैं यही सोच ही रहा होता हूं तभी घंटी बजती हैं औऱ उठकर दरवाज़ा खोलता हूं तो सामने सुरभि रहती हैं औऱ कसकर मुझें गले लगा लेती हैं।

"गधे रो क्यों रहे मेरी शादी नहीं हो रही उल्लू वो भईया थे मेरे बड़े पापा के बेटे उनकी शादी फिक्स हुई हैं मेरी नहीं" मेरे गाल पे हाथ रखकर कहती हैं।

"मुझें लगा ही था तुम ग़लत समझ लिए हो इसीलिए मैं आई,पागल तुम्हारे जितना कोई औऱ प्यार कर सकता हैं मुझें नहीं न" मेरे आंखों में देखकर कहती हैं।

इतने में माँ पापा पीछे से आ जाते हैं,

"अरे ये क्या हो रहा भई हम रिश्ते की बात करने आ रहे औऱ तूम लोग पहले ही तय कर लिए" पापा हम दोनों से कहते हैं,इतना सुनते ही हम दोनों हंसने लगते हैं।

मेरे ज़िन्दगी में जितनी दफ़ा दरवाज़े की घंटी बजी हर दफ़ा मेरे ईश्क़ को मेरे क़रीब खींच लायी। आख़िर में एक लाइन इस बात के लिए की जब एहसास दिलाओगे तभी प्यार मिल पायेगा। 

"इश्क़ तबतक क़ामिल नहीं होता,

जबतक एहसास शामिल नहीं होता"।


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