STORYMIRROR

KANTA

Abstract Children Stories Drama Action Others

4.5  

KANTA

Abstract Children Stories Drama Action Others

दादा - दादी का आख़िरी आंगन

दादा - दादी का आख़िरी आंगन

3 mins
185



अध्याय 1

आँगन की सुबह और दादी की पुकार

सुबह की पहली किरण जैसे ही गाँव रामपुर की मिट्टी पर बिखरी, हल्की-हल्की ठंडी हवा पूरे गाँव में फैल गई। खेतों से आती मिट्टी की खुशबू, पेड़ों पर चहचहाते पक्षियों की आवाज़ और दूर मंदिर की घंटियाँ हर रोज़ की तरह एक नई सुबह का स्वागत कर रही थीं।

गाँव के आख़िरी छोर पर एक पुराना लेकिन सजा-सँवरा घर था। उस घर की पहचान उसकी ऊँची दीवारें नहीं, बल्कि उसका बड़ा-सा आँगन था। वही आँगन जहाँ कभी बच्चों की खिलखिलाहट गूँजती थी, जहाँ हर त्योहार पर रंगोली बनती थी, जहाँ दादा-दादी की गोद कभी खाली नहीं रहती थी।

आज वही आँगन शांत था।

बरामदे में बैठी सावित्री देवी अपनी काँपती उँगलियों से ऊन का स्वेटर बुन रही थीं। उम्र लगभग सत्तर साल, चेहरे पर झुर्रियाँ, लेकिन आँखों में आज भी अपने परिवार के लिए उतना ही प्यार था।

उन्होंने घर के अंदर नज़र डाली और धीमे से आवाज़ लगाई—

"सुनते हो जी... चाय तैयार है।"

कुछ ही पल बाद सफेद कुर्ता-पायजामा पहने रामनारायण जी अपनी लकड़ी की छड़ी के सहारे बाहर आए। चेहरे पर मुस्कान थी, मगर आँखों में बरसों का इंतज़ार।

"आज फिर इतनी सुबह उठ गई?" उन्होंने मुस्कुराते हुए पूछा।

सावित्री देवी हल्का-सा मुस्कुराईं।

"नींद ही कहाँ आती है... आदत पड़ गई है।"

दोनों चाय लेकर आँगन में बैठ गए। कुछ देर तक दोनों बिना कुछ बोले बस उस खाली आँगन को देखते रहे।

रामनारायण जी ने गहरी साँस ली।

"याद है सावित्री... इसी आँगन में हमारे तीनों बेटे सुबह-सुबह दौड़ते रहते थे। एक गेंद के पीछे, दूसरा पतंग के पीछे और तीसरा तेरे पीछे रोटी माँगता फिरता था।"

सावित्री देवी की आँखें भर आईं।

"और हमारी पोती नंदिनी... कैसे पूरे आँगन में नाचती थी। कहती थी—'दादी, मैं कभी आपको छोड़कर नहीं जाऊँगी।'"

दोनों हल्का-सा मुस्कुराए, लेकिन अगले ही पल वह मुस्कान आँसुओं में बदल गई।

समय ने सब बदल दिया था।

तीनों बेटे पढ़-लिखकर शहर चले गए। वहीं नौकरी, वहीं घर, वहीं बच्चे...

धीरे-धीरे गाँव आना कम हुआ और फिर लगभग बंद ही हो गया।

अब महीने में कभी-कभार एक फोन आ जाता था।

"कैसे हो माँ?"

"दवा समय पर लेना।"

"अभी काम बहुत है, अगले महीने आएँगे।"

हर बार यही वादा...

हर बार वही इंतज़ार...

सावित्री देवी उठीं और घर के मंदिर में दीपक जलाने लगीं।

हाथ जोड़कर उन्होंने भगवान से सिर्फ़ एक ही प्रार्थना की—

"हे ठाकुर जी... धन नहीं चाहिए... बस इतना कर दो कि एक बार पूरा परिवार इस आँगन में फिर से हँसता हुआ दिखाई दे।"

उसी समय मोबाइल की घंटी बजी।

दोनों की आँखों में चमक आ गई।

रामनारायण जी ने जल्दी से फोन उठाया।

स्क्रीन पर बड़े बेटे विनोद का नाम लिखा था।

"हाँ बेटा... कैसे हो?"

दूसरी तरफ़ से जल्दी-जल्दी आवाज़ आई—

"पिताजी, अभी मीटिंग में हूँ। बस यह बताने के लिए फोन किया था कि इस बार भी शायद गाँव आना नहीं हो पाएगा। बच्चों की छुट्टियाँ खत्म हो रही हैं... बाद में बात करता हूँ।"

फोन कट गया।

सिर्फ़ पच्चीस सेकंड।

रामनारायण जी कुछ पल तक मोबाइल को देखते रहे।

फिर बिना कुछ बोले उसे मेज़ पर रख दिया।

सावित्री देवी समझ गई थीं।

उन्होंने कुछ नहीं पूछा।

बस चुपचाप चाय का खाली कप उठाकर रसोई में चली गईं।

रसोई में पहुँचते ही उनके आँसू छलक पड़े।

उन्होंने अपने आँचल से आँखें पोंछीं ताकि रामनारायण जी उन्हें रोता हुआ न देख लें।

लेकिन उधर बरामदे में बैठे रामनारायण जी भी पहली बार अपनी आँखों के आँसू छिपाने की कोशिश कर रहे थे।

उस दिन पूरे घर में अजीब-सी ख़ामोशी थी।

शाम ढलने लगी।

सूरज की आख़िरी किरणें आँगन में बिखर रही थीं।

तभी दरवाज़े पर किसी ने दस्तक दी।

"कोई है घर में...?"

दोनों एक साथ उठे।

दरवाज़ा खुला।

सामने लगभग बाईस साल की एक लड़की खड़ी थी।

उसकी आँखों में अपनापन था और हाथ में एक पुराना बैग।

वह मुस्कुराई...

"दादाजी... पहचान लिया मुझे?"

रामनारायण जी और सावित्री देवी एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे।

उनकी आँखों में हैरानी साफ़ दिखाई दे रही थी...

आख़िर यह लड़की कौन थी?

और इतने वर्षों बाद इस सूने आँगन में किस उम्मीद को लेकर आई थी?...


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi story from Abstract