आंगन की चौखट
आंगन की चौखट
*स्टोरी का नाम: "आंगन की चौखट"*
1: आखिरी चाय*
गांव में मेरा घर अब पक्का बन गया था। शहर से AC, फ्रिज, सब आ गया।
पर दादी रोज सुबह 5 बजे मिट्टी के कुल्हड़ में चाय बनाकर आंगन की चौखट पर बैठ जातीं।
"बेटा, शहर की चाय में मिट्टी की खुशबू नहीं आती।"
मैं हंस देती। "दादी अब कौन कुल्हड़ धोएगा?"
दादी कुछ नहीं बोलतीं। बस चौखट सहलाकर रह जातीं।
2: खाली पलंग*
पापा ने कहा "माँ, अब शहर चलो। यहां अकेले क्या करोगी?"
दादी ने अपना पुराना पलंग देखा। जिस पर हमने तीनों भाई-बहन गर्मियों में सोते थे।
"इस पलंग को कौन झाड़ेगा बेटा? धूल जम जाएगी।"
उस रात दादी सोई नहीं। पूरे घर में दीया जलाकर घूमीं।
3: विदाई*
गाड़ी आई। सामान रखा।
दादी ने सबसे पहले आंगन में लगे तुलसी के पौधे को प्रणाम किया। फिर चौखट को।
"आंगन, हम जा रहे हैं। किसी का ध्यान रखना।"
मैंने देखा दादी के आंचल का कोना गीला था।
4: शहर का फ्लैट*
शहर में सब था। पर रात को नींद नहीं आती थी।
दादी 2 बजे उठकर पूछतीं "बेटा, झींगुर की आवाज आ रही है क्या?"
मैं कहती "दादी यहां झींगुर नहीं होते।"
दादी चुप हो जातीं।
5: फोन*
6 महीने बाद फोन आया गांव से।
"दादी, आपका घर बेच दिया।"
दादी ने फोन रख दिया। 3 दिन तक खाना नहीं खाया।
बस एक ही बात बोलतीं "आंगन की चौखट किसके पैरों से घिसेगी अब?"
6: आखिरी इच्छा*
एक साल बाद दादी बीमार पड़ीं।
डॉक्टर ने कहा "इन्हें गांव ले जाओ। मिट्टी की हवा चाहिए।"
हम गांव पहुंचे। घर बिक चुका था। नई दीवारें थीं।
दादी ने उस नई दीवार पर हाथ रखा और बोलीं "बेटा, मिट्टी की ठंडक नहीं है।"
उसी रात दादी चली गईं। आंचल में मिट्टी की एक पुड़िया थी।
7: सीख*
आज मेरा घर बहुत बड़ा है। पर आंगन नहीं है।
बच्चे पूछते हैं "दादी कहां है?"
मैं कहती हूं "जिन घरों में चौखट नहीं होती, वहां दादी नहीं रहतीं।"
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