Cha Khabo चाय दोस्ती और बंगाल
Cha Khabo चाय दोस्ती और बंगाल
ज़िंदगी के सफर में कुछ पड़ाव दिल में हमेशा के लिए बस जाते हैं। मेरे लिए पश्चिम बंगाल, ऐसा ही एक पड़ाव रहा—खास, यादगार और दिल के बेहद करीब। नौकरी के सिलसिले में मैंने सिलीगुड़ी में एक साल और डेढ़ महीना और दुर्गापुर में चार महीने बिताए। लेकिन इन महीनों ने जो अनुभव दिए, वो पूरी ज़िंदगी के लिए एक खजाना बन गए। सिलीगुड़ी में मेरा लंबा प्रवास रहा, और वहीं मेरा परिवार भी मेरे साथ था। मेरे बेटे ने यहीं जलपाईगुड़ी में स्कूल जाना शुरू किया। और मेरी बेटी का जन्म भी यहीं हुआ—जलपाईगुड़ी के एक अस्पताल में। बंगाल मेरे परिवार की यादों में बस गया। सड़क किनारे की चाय की दुकानें, फुचका, घुग्नी, आलू चॉप , मूढ़ी और रसगुल्ला जैसी चीज़ों ने हर शाम को एक उत्सव बना दिया। और फिर थी चाय—मैं तो खुद एक Hardcore Tea Lover हूँ। चाय के इतने वैरायटी वाले स्टॉल मैंने पहले कभी नहीं देखे। हर चौक, हर नुक्कड़ पर अलग स्वाद, अलग अंदाज़। मैंने तरह-तरह की चाय की चुस्कियाँ लीं—कभी कुल्हड़ में, कभी पतले गिलास में, तो कभी बस हाथ में पकड़े कागज़ के कप में। चाय के बागानों में जाना, उसकी प्रोसेसिंग देखना और खूबसूरत रिज़ॉर्ट्स में समय बिताना—हर एक अनुभव आज भी मेरी स्मृतियों में ताज़ा है। कोका-कोला में काम करते हुए मुझे बंगालियों के साथ काम करने का मौका मिला। उनके चेहरे की मुस्कान, भाषा की मिठास और मन का अपनापन—सबकुछ बेहद खास था। हम कहते हैं – "चाय पियोगे?" पर बंगाल में पूछा जाता है – “Cha Khabe? हम पूछते हैं – "पानी पियोगे?" वो कहते हैं – “Dada, Jaal Khabe?” यानि पीने की चीज़ों को भी खाने की तरह बोलना, उनके बोलचाल में भी मिठास होती है—रसगुल्ला जैसी। मैं ओडिशा से हूँ, और हम थोड़े-बहुत नॉनवेज खाते हैं। लेकिन बंगाल में तो नाश्ते से लेकर रात के खाने तक, स्नैक्स से लेकर त्योहारों तक, हर जगह माछ यानी मछली का स्वाद होता है। मछली वहाँ सिर्फ खाना नहीं, एक भावना है—एक sentiment! हर परिवार की थाली में, हर पूजा की थाली में—माछ की जगह तय होती है। बसंत पंचमी की बात न हो तो बंगाल अधूरा रह जाता है। उस दिन छोटी बच्चियाँ जब पीली साड़ी पहनकर स्कूल आती हैं, तो लगता है जैसे बसंत खुद सजी-धजी चलकर आ गया हो। वो नज़ारा मेरे दिल में आज भी जिंदा है। हम जहाँ किराये पर रह रहे थे, वहाँ के मकान मालिक ने कभी हमें बाहरी नहीं समझा। हमारे बच्चों से स्नेह, हमारे साथ उनका व्यवहार—मानो हम उसी परिवार का हिस्सा हों। दुर्गा पूजा और काली पूजा जैसे पर्वों में बंगाल एक नई ऊर्जा से भर जाता है। मैंने पहली बार वहाँ पूजा को इस तरह उत्सव और भावना के मेल में देखा। और हाँ, कोका कोला की रानीनगर फैक्ट्री में एक इंसान हमेशा याद रहेंगे—रतन दा। वे एक साधारण से ऑफिस बॉय थे, लेकिन उनकी चाय की सेवा असाधारण थी। हर दिन समय पर आकर पूछते थे—"Sir, Cha Khabo?" उनकी यह सरल बात दिल को छू जाती थी। ऑफिस के बाद चाय के साथी भी कम खास नहीं थे—अमितव दत्ता जी, जो जलपाईगुड़ी की खास दुकानों से मुझे बेहतरीन चाय पिलाते थे और नए-नए स्वाद से परिचित कराते थे। बंगाल ने मुझे रिश्ते, अपनापन, अनुभव और ढेर सारी चाय दी। और जब बंगाल छोड़ने का दिन आया... तो दिल भारी हो गया। चाय के बागान, रिसॉर्ट्स, गलियों की खुशबू, दोस्तों की हँसी—सब पीछे छूट रहा था। आज भी जब कभी कोई पूछता है—“चाय पियोगे?” तो मन कहता है—“Cha Khabo Dada!” बंगाल छोड़े लगभग दो साल हो गए हैं।" अगर मौका मिला… तो एक बार फिर जाना चाहूँगा बंगाल—और खो जाना चाहूँगा उन्हीं यादों में। 🖋️ बलराम बारिक
