बाईस साल की धूल
बाईस साल की धूल
राजू यादव फैक्ट्री का एक जाना-पहचाना नाम था। पिछले 22 वर्षों से वह बिना छुट्टी, बिना बहाना, बिना शिकायत रोज़ सबसे पहले फैक्ट्री पहुंचता। न मशीन से डर, न गर्मी से परहेज। बस एक सपना – अपनी बेटियों को पढ़ाना और उन्हें एक बेहतर जीवन देना।
लाली, उसकी बड़ी बेटी, बारहवीं में थी। हर बार पूछती, "बाबू, क्या मैं इंजीनियर बन सकती हूँ?" राजू मुस्कुरा देता, "तू ठान ले, तो कुछ भी कर सकती है।"
पर वक्त ने करवट ली। एक दिन HR ऑफिस से बुलावा आया। नए HR मैनेजर, विकास त्रिपाठी ने ठंडे स्वर में कहा:
"राजू जी, आपका प्रदर्शन संतोषजनक नहीं है। आपको Performance Improvement Plan (PIP) में डाला जा रहा है।"
राजू के चेहरे की चमक फीकी पड़ गई। उसने कांपते स्वर में कहा, "साहब, मैं 22 साल से काम कर रहा हूँ। कभी गलती नहीं की। ये कैसा निर्णय है?"
विकास ने ठंडी मुस्कान के साथ जवाब दिया, "ये ऊपर का आदेश है। आप इस फॉर्म पर साइन कर दीजिए।"
राजू ने जब दस्तावेज़ पढ़े, तो उसमें लिखा था कि तीन महीने में प्रदर्शन में सुधार नहीं हुआ तो सेवा समाप्ति की जाएगी।
वह फैक्ट्री के कोने में पुराने साथी श्यामलाल से मिला, जिसे दो साल पहले इसी तरह निकाला गया था। श्याम बोला, "ये PIP बहाना है, भाई। अब पुराने कर्मचारियों को हटाकर सस्ते, ठेके वाले मज़दूर लाना चाहते हैं।"
घर लौटकर राजू चुप रहा। बेटियाँ पूछतीं, पर वह टाल देता। मां की दवाइयाँ, बेटियों की पढ़ाई, मकान का किराया – सब उसके दिमाग में घूमता रहा।
कुछ हफ्तों बाद उसे टर्मिनेशन लेटर पकड़ा दिया गया।
"आपका प्रदर्शन असंतोषजनक रहा, इसलिए सेवा समाप्त की जाती है।"
कोई सुनवाई नहीं। कोई मौका नहीं। बस एक कागज़ और 22 साल की मेहनत का तमाचा।
राजू टूट गया। पर रुका नहीं। उसने लेबर कमिश्नर से संपर्क किया। वहाँ उसकी मुलाकात बाबूलाल नाम के बुज़ुर्ग वकील से हुई। बाबूलाल बोले:
"बेटा, ये लड़ाई तेरी अकेली नहीं है। ये हर उस श्रमिक की लड़ाई है जिसे चुपचाप निकाल दिया जाता है। मैं तेरे साथ हूँ।"
मामला कोर्ट में गया। फैक्ट्री के HR और मैनेजमेंट को तलब किया गया। लाली भी कोर्ट में खड़ी हुई:
"मेरे पापा हर दिन मेरी किताबें खुद उठाकर स्कूल छोड़ते थे, ताकि गीली न हों। क्या ऐसा आदमी कामचोर हो सकता है?"
गवाही, सबूत और सच्चाई के सामने झूठ ज्यादा दिन नहीं टिकता। कोर्ट ने फैसला सुनाया:
"टर्मिनेशन अवैध है। फैक्ट्री को माफ़ी मांगनी होगी। राजू को बकाया वेतन, ग्रेच्युटी और एक सम्मानजनक विदाई दी जाए।"
कंपनी को शर्मिंदगी झेलनी पड़ी। उनका झूठा चेहरा, जो सोशल मीडिया पर "हम श्रमिकों को परिवार समझते हैं" कहता था, उजागर हो गया।
लेकिन राजू ने कहा:
"मैं वापस उस फैक्ट्री में नहीं जाऊँगा। जहाँ 22 साल की निष्ठा के बदले अपमान मिला।"
राजू ने समाज को एक संदेश दिया — श्रमिक की इज्जत सस्ती नहीं होती। उसकी मेहनत को धूल में मत उड़ाओ।
अंत
राजू कोर्ट में केस तो जीत गया... पर उससे भी बड़ी जीत ये थी कि उसने साबित किया — श्रमिक भी इंसान है, और उसका आत्मसम्मान सबसे ऊपर है। जब एक मजदूर आवाज़ उठाता है, तो पूरी व्यवस्था सुनने को मजबूर होती है।
Written By -Balaram Barik
