Chandni Bhardwaj

Drama Others


4.4  

Chandni Bhardwaj

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चांदनी की अमावस्या

चांदनी की अमावस्या

15 mins 241 15 mins 241

दिल की सिसक - हाँ मैं चुप हूँ।

हाँ मैं चुप हूँ ... ऐसा नहीं है की कहने को कुछ नहीं है 

लेकिन इस भीड़ में कोई अपना दिखता नहीं ... इसलिए चुप हूँ

दिल में मेरे भी उठती आवाज़ है ...सांझा करने को कई राज़ हैं

पररररररर मैं चुप हूँ

मन में तुमसे कहने को कई अरमान हैं...दिल में उठते बातों के कई तूफ़ान हैं...

पर मैं चुप हूँ...

ना शब्दों का अभाव है..... ना चुप रहना मेरा स्वभाव है ....

पर मैं चुप हूँ

लगता है कभी कभी.... लोगों से दिल की अपने मैं कहु ...

फिर लगता है यूँ ही खामोश चुप रहूं

साथी आज कोई साथ नहीं है ... किसी दोस्त का हाथ आज मेरे हाथ में नहीं है ..

इसलिए चुप हूँ चुप हूँ और बिलकुल चुप हूँ

“चांदनी” सिर्फ चाँद की चांदनी


चांदनी की अमावस्या


 "बहू उठी नहीं अभी तक ५:३० बज चुके हैं ? चूल्हा लीपा नहीं... ये सोचते हुए ससुर जी खांसते हुए बहू के कमरे के पास से निकल गए...

 "इतने में साथ होये पति ने भी टोक दिया चाँदनी उठी नहीं अभी ?"

 बहू के दिमाग में ये खांसने वाली आदत घर कर चुकी थी ... जैसे एक अलार्म बजता हो ...

बहू ने धीरे धीरे आँखें खोली और अपने सिरहाने रखे मोबाइल में समय देखा ५:३५ हुए थे ... "हाँ उठ रही हूँ ..." ये कह के धीरे धीरे करवट बदल बदल के और अपनी किस्मत के रंगों को कोसते हुए बिस्तर छोड़ा और चल पड़ी बाथरूम की ओर।


ये कहानी है हिमाचल के गाँव में बसने वाली हर उस औरत की जिसने पैदा होने से लेकर शादी होने तक लड़का और लड़की की परवरिश में फ़र्क़ महसूस किया है।

आईये मैं ले चलता हूँ ऐसी ही एक औरत की ज़िन्दगी में .... जिसे देखकर और महसूस करके मैं इस औरत को नमन किये बिना रह पाया और जाने कब मेरी आँख से आँसू गिर पड़े। उम्मीद है मैं ये लिखने में उस औरत के साथ सहानुभूति नहीं बल्कि उसके सहनशक्ति उसके साहस और मनोबल की सराहना ही करूँगा।


 चलिए चलते हैं वक़्त को पीछे लेकर ... क्योंकि औरत भी कभी लड़की थी और बहू भी कभी बेटी थी ...


 "मैंने कहा सुनो ... बेटी बड़ी हो रही है ...इसके लिए एक अच्छा रिश्ता आया है ... पास के गाँव से ... लड़का सरकारी नौकरी में है अच्छे ओहदे पर है और उसको सरकारी गाड़ी भी मिली हुई है ... पढ़ा लिखा अच्छा है ... थोड़ा उम्र में बड़ा है लेकिन दोस्त लोग बता रहे थे देखने में नहीं लगता बड़ा ... मुझे लगता है बात चला देनी चाहिए... तुम बेटी को देख लेना ज़रा तैयारी करवा लेना.... लड़के वाले देखने आएँगे अगले हफ्ते..." ... 


ऐसा ही होता है गाँव में हिमाचल के.... औरत को पूछा नहीं जाता बास बता दिया जाता है की ये सब हो रहा है “बस तुम घर में सम्भालो बाकी हम देख लेंगे”।

"शहनाई बजने के दिन भी आये और शादी भी हो गयी और बेटी भी पहुँच गयी अपने ससुराल एक बहू बन कर .... यही से शुरू होती है कहानी में नए रंग.... सास के रंग ससुर के रंग... और बहू देखती रह जाती है दंग होकर ... आइए जोड़ते हैं कहानी को शुरुआत के साथ ...


 "बहू उठी नहीं अभी तक ५:३० बज चुके हैं ? चूल्हा लीपा नहीं... ये सोचते हुए ससुर जी खांसते हुए बहू के कमरे के पास से निकल गए... "इतने में साथ होये पति ने भी टोक दिया चाँदनी उठी नहीं अभी ?"


चाँदनी झटपट मुँह हाथ धो कर और अपने कपड़ों को ठीक करती और अपना दुपट्टा सर पर ओढ़े रसोई पहुंची....इस वक़्त अगर कोई चाँदनी को देख ले तो उसको चाँदनी नहीं अष्टभुजा देवी ही दिखेंगी। चाँदनी ने एक तरफ दिन का खाना बनाने की तैयारी और दूसरी तरफ माखन बनाने के लिए उसने मशीन में लस्सी डाली और आवाज़ लगाई .... 

बेटा उठ जा .... स्कूल की बस आ जानी और तुम सोये रह जाओगे ... बेटी तू तो हॉस्टल से क्या आयी है जैसे यहाँ सोने को और हुक्म सुन ने को रह गए हम... उठ जा बेटी अब कभी मम्मी का काम में हाथ बंटवा दिया कर।

मन ही मन चाँदनी खुद से बात कर रही थी... "सो ले बेटी सो ले माँ के घर में चैन से सो ले...एक बार ससुराल गयी तो ये सब नसीब नहीं होना ..." .. यही सोचते और खुद से बातें करते हुए अष्टभुजा ने झटपट कढ़ाई गैस पे चढ़ाई और चूल्हे पर पानी का बड़ा पतीला चढ़ाया (ससुर जी चूल्हे पे किये गरम पानी से ही नहाते हैं आजकल के ज़माने के गीजर के पानी से नहीं) और चाँदनी ने पीतल की बाल्टी उठायी और चलते चलते अपने पति से कह गयी "सब्ज़ी देख लेना १५ मिनट के लिए मैं गाये के शेड में जा रही हूँ।

 ... दूध दूह के आती हूँ फिर नाश्ता बनाती हूँ" और आप भी थोड़ा रसोई में देख लेना बच्चों का टिफ़िन और चाय बना के रखना ...


 चलते चलते चाँदनी के पाँव ज़्यादा भार नहीं सह पा रहे थे क्योंकि चाँदनी के पाँव से लेकर उसके कूल्हे तक दर्द ने अपना घर बना लिया था और इस बीमारी का इलाज कराते कराते चाँदनी को दस साल हो चले थे .... अब तो चाँदनी ने दर्द के साथ जैसे दोस्ती ही कर ली थी ...

और चाँदनी के पास ये सब सोहने का वक़्त बस यही था।। चलते चलते खुद से बात कर लेती और खुद ही को तस्सल्ली भी दे लेती थी ...

शेड में पहुँचते ही सबसे पहले गाय की आँखें देखती हैं की कोई अजनबी तो नहीं आया ... क्योंकि इस शेड में परिवार के किसी आदमी ने कभी कदम नहीं रखा था... आदमी है न वह ...अजीब मानसिकता है...


 केवल प्रतिनिधित्व के लिए

"बहू नहीं आयी अभी तक दूध निकाल के " ये कहते हुए ससुरजी ने अपनी पत्नी से कहा मैंने चाय पीनी है ....फिर पूजा को बैठना है देर हो रही है पूजा के लिए..."लो आ रही है बहू कह दो उसी को चाय के लिए"...सास ने चैन की सास लेते हुए कहा ...

 चाँदनी ने ससुरजी को देखा और उसने दुपट्टा अपने सर पे ओढ़ते हुए कहा "पिताजी बनके लाती हूँ चाय अभी ५ मिनट में "...

बहू ने ससुरजी की आँखें पढ़ ली थी और ये उनकी रोज़ कई दिनचर्या थी। खैर चाँदनी पहुंची रसोई में और झटपट चाय रखी  और दूसरी तरफ बच्चों के नाश्ते की तैयारी और पति के दफ्तर जाने के लिए खाने की तैयारी। 


सासुजी, जिनकी ३ बेटियां हैं सबकी शादी हो चुकी है और सब अपने अपने घर में ठीक से गुज़र बसर कर रही हैं, वो सासुजी जिनको चाँदनी ने कभी हँसते हुए नहीं देखा था करीब २० साल हो चले शादी को .... चाँदनी जब नयी नयी बहु बना के लायी गयी थी, तभी से सास ने शायद कसम खा राखी थी की चैन से जीने नहीं देंगी क्योंकि जिस को जो मिलता वही तो वो सबको बाँटता फिरता ... शायद इसीलिए सास ने अपने जीवनकाल में कांटे ही कांटे देखे हैं इसीलिए बहु को जीवन में काँटों के उपहार ही देने को रह जाती... 

ये सास भी कैसी होती हैं न ...कैसे ये दोगले मुँह से अपनी बेटी को वो सारा प्यार दे जाती और बहु को पल भर को अपनी मर्ज़ी का जीने भी नहीं देती ... क्यों होती हैं ये औरतें ऐसी...

औरत ही औरत की दुश्मन क्यों बानी रहती...?

ससुरजी .... कैसे वो अपनी बेटियों को रोज़ हाल चाल पूछ लेते और अपनी इकलौती बहु के १० साल के दर्द को देख के भी अनदेखा कर जाते ??? क्यों ससुरजी को चार धाम की यात्रा में आनंद मिलता लेकिन उसका फल नहीं..... क्योंकि अंदर ही मंदिर है ....इसको समझने के लिए उम्र नहीं दिल से भाव चाहिए। जब बहु को अपनी बेटी तो क्या बेटी समान ही नहीं समझा तो ज़िन्दगी तो जानवर भी जी रहे है। 

खैर... आईये चलते हैं कहानी के मुख्य पात्र की और देखें बहु की दिनचर्या कैसे चल रही है...


चाँदनी ने सबको नाश्ता देकर और बच्चों को स्कूल भेजकर और पति को दफ्तर भेज कर थोड़ा आराम करने की सोची और अपना मोबाइल हाथ में लेकर बैठी ही थी की ससुरजी की आवाज़ आ गयी .. बहु २ चाय बना देना मेहमान आये हैं... और चाँदनी फिर से उठा कर चाय बनाके देके आयी और वापिस अपने कमरे में आ गयी थोड़ी देर आराम करने .... क्योंकि उसकी टांग में दर्द उठने लगा था और उस से चलने में तकलीफ हो रही थी...


 एक दर्द ही तो था जो उसको ज़बरदस्ती आराम करवा देता था ...

 वर्ना चाँदनी और आराम ... जैसे एक सिक्के के दो पहलु...

 नींद गहरी थी.... लेकिन नींद में लग रहा था की कोई आया हुआ है कुछ आवाज़ें आ रही थी ... चाँदनी जिसके अंदर अलार्म की घंटी तो सास ससुर ने कूट कूट कर भर रखी थी.... शादी की पहले महीने से लेकर आज तक... धीरे धीरे आँखें खोली और अपने ही बैडरूम की खिड़की से झाँका ... हे भग्गू मेरे (चाँदनी अपने भगवान को अपना दोस्त अपनी सहेली ही मानती थी और गुस्से और प्यार में ऐसे ही बुलाती थी) आज फिर से मेहमान ...उदासी झलक आयी थी एक बार तो ...लेकिन अगले ही पल उसने सब कुछ भुला दिया (क्योंकि उसको आदत हो चुकी थी दूसरों की मर्ज़ी में ही अपनी मर्ज़ी करने में....क्योंकि उसकी अपनी मर्ज़ी तो पति ने भी नहीं मानी।

झटपट दुपट्टा ओढ़ा और पहुंची बाहर आँगन में ...." नमस्ते जी नमस्ते प्रणाम भाई साब ... कैसे हैं आप सब ...बड़े दिन में आये आप तो ...क्या लेंगे चाय या दूध ?.... इतना सुनते ही ससुरजी ने बोल दिया "बहु चाय ले आओ ७ कप और नाश्ता भी लेती आना ".... 

इन शब्दों का मतलब था बहु तुम्हारी जगह रसोई में है तुम वही जाओ और काम करो ... ये मेहमान नवाज़ी हम कर लेंगे .... वाह रे वाह परिवार और परिवार के मुखिया


चाँदनी इनको चाय नाश्ता देकर आती है और फिर दोपहर के खाने का इंतज़ाम करने की तयारी में जुट जाती है ... क्योंकि दोपहर का खाना परिवार के सदस्य , जो मेहमान आये है उनके लिए और जो ८ कारीगर खेत में काम कर रहे हैं उनके लिए भी बनता है ...

मानते हैं परम्परा है आवभगत की ... अच्छी बात है ... लेकिन क्या इंसान को इंसान को समझना कही परंपरा में आता है ???

खैर चाँदनी ने चलते चलते ही अपने मोबाइल पर समय देखा और "ओफ्फो ११:१५ बज गए हैं और अभी इतना काम पड़ा है...


 रसोई में चाँदनी ने एक बार अष्टभुजा का रूप धारण कर झटपट खाना बनाना शुरू किया और फिर उसको न दर्द हुआ न थकान बस पानी पीती रही और एक तरफ दाल भात और दूसरी तरफ एक सब्ज़ी और साथ में तवे पे रोटियाँ सेकनी शुरू की और


 जाने कब १:३० बज गए की पता ही नहीं चला। "बहु खाना हो गया ? जी अम्माजी आ जाइये आप सभी... सास की आवाज़ में रूखापन साफ़ झलक रहा था और ये अंदाज़ बहु अच्छे से पहचानती थी ...हो भी क्यों न .... सास ने शादी के पहले महीने से ही अपने तेवर दिखा दिए थे .... चाँदनी ने खाना फटाफट से परोसा और इधर उधर की बातों में उसने अपने मोबाइल से एक नंबर लगा के कह दिया " आ जाओ बहादुर खाना त्यार है बाकी सबको भी बोलते आना "... परंपरा .... परिवार के सदस्यों को और मेहमानो को खिलाने के बाद चाँदनी ने बहादुर के साथ ७ और कारीगर को भी खाना दाल के दे दिया और उनको आँगन में ही बैठने का संकेत कर दिया.... क्योंकि वो हमारी जाति के नहीं है इसलिए वो रसोई में नहीं खा सकते .. परंपरा ....


चाँदनी ने सबके खाने के बाद सबके बर्तन साफ़ किये और उनको रसोई में ही सलीके से लगा दिए... अब तक उसके पेट में भी चूहे चिल्ला रहे थे...


 उसने कुकर और कढ़ाई में देखा और मन ही मन कुछ सोचती और उतरा हुआ चेहरा लेके लगी खुद को परोसने और रसोई में ही बैठ के खाने लगी.... अकेली नहीं थी .... उसके साथ थी उसकी सोचें ..... खैर खाना खाने के बाद और बर्तन साफ़ करने के बाद और रसोई साफ़ करने के बाद वो चली गयी अपने कमरे की तरफ .... शायद ये वक़्त उसका अपना सा था .... या यु कहिये की बाकी परिवार के सदस्य भी सुस्ता लेते थे तो चाँदनी को भी मौका मिल जाता था थोड़ी कमर सीढ़ी करने का ....


 अपने कमरे में पहुँचते ही उसने अपने एअरफोन्स कान से लगाए और मोबाइल से गाने सुनते सुनते और थोड़ा गुनगुनाते हुए एक करवट को लेट गयी और कब उसके चेहरे से थकान सरक के सारे बदन में फ़ैल गयी और वो गयी नींद के आगोश में ....

हाँ गाने चल रहे थे अपनी धुन में .... वही तो थे उसको लोरी सुनाके सुलाने वाले .... एक औरत के अंदर एक माँ के अंदर आज भी एक बच्चा था जो लोरी सुनके ही सोता...


 अच्छी खासी नींद आयी और पता भी नहीं चला कब ३:१५ बज गए .... फिर से एक बार वही आवाज़ों ने जगाया जो उसके अंतर्मन में बसी हुई थी.... वो थोड़ी हंसी वो ससुरजी का खाँसना वो सास का ज़ोर ज़ोर से बोलना .... ये सब बहु के लिए इशारा था ....

चाय का समय हो गया है... चाँदनी की नींद थोड़ी पूरी हो गयी थी और वो इस वक़्त तरोताज़ा महसूस कर रही थी..... हाथ मुँह धो के चाँदनी रसोई जाती है और चाय रख के बाहर आँगन में सबके बीच में जाकर बैठ जाती और साथ साथ में चाय की तयारी करती जा रही थी ...


 "और बहु ... कैसी हो तुम कभी पार को आना ".... चाँदनी ने कहना शुरू किया ही था "जी ज़रूर भाई साब लगाऊं ...." और उसकी बात को काट के ही सास ने सफाई देना शुरू कर दिया " अब तो हमसे काम नहीं होता अब अब तो बहु का ही घर है सब ज़िम्मेवारी इसकी है ये चाहे जैसे मर्ज़ी संभाले... हमारे बाद सब इसका तो है ...." ...

ये शब्द तो आप पढ़ने वालो को बी जाने पहचाने से लगे होंगे ना.... ये तो घर घर की कहानी है.... हमारे बाद तो सब इसका ही है...


लेकिन ये किसकी है ??? क्या खुद की ??? क्या खुद की कोई पहचान बाकी है २० साल बाद ??? शादी से पहले चाँदनी के साथ उसके पिता का नाम था और शादी के बाद ससुराल का.... लेकिन... परंपरा है परंपरा ....


 चाय पीते पीते ४ बज गए और मेहमानो नई विदाई ली.... चाँदनी सब बर्तन करते करते सोच रही थी ... "४:१५ बज चले और ५ इनके और बच्चों के आने का वक़्त हो गया है और आते ही खाना देना है ... अब क्या बनाएगी चाँदनी ... जल्दी से सोच और कर तैयारी "

एक बार फिर अष्टभुजा ने अपना रूप धारण किया और झटपा खाना तैयार किया और सब कुछ तैयार करके हाथ मुँह धो के खुद को आईने में देखती हुए बिंदिया सिन्दूर आदि ठीक करने लगी और साथ साथ में अंतर्मन में चलते हुए गाने गुनगुनाने लगी ...


चेहरे पे एक सुकून एक रोमांस का ख़याल और बालों को संवारते हुए वो वापिस आँगन की तरफ बढ़ चली....

बाहर सूरज पश्चिम की ओर ढलने चला था और सूरज की लाली उसको अपने सिन्दूर जैसी लग रही थी... मन ही मन बाहर की ठंडी ठंडी हवा को अपने में समेटते हुए गुनगुनाती सामने से आती अपनी कार को और उसमे सवार परिवार को देख रही थी....


 "मम्मी ... मम्मी.... ये कहते हुए बेटी कार से उतरी और मम्मी के गाल पे चूम डाला .... बेटी माँ में खुद को ही देखती है ना इसीलिए वो उसको चुप से वो सब प्यार दे देती जिसकी एक माँ को हमेशा ज़रुरत रहती... "

"बेटा अपने में शर्माता हुआ सा माँ के पाँव छु के अंदर को चला गया...."


पति को अपनी आँखों से निहारते हुए उसने दूर से देखा... कुछ पिछली शाम की शरारत कुछ उस से पिछले दिन की लड़ाई और बहस ... सब एक साथ मन में घूम गया ... सब्ज़ी का थैला उठाते हुए पति ने बाहर आँगन में ही थैला थमा दिया और अंदर चले गए मुँह हाथ धोने .... ये दिनचर्या रोज़ की है इसमें कुछ नया नहीं ढूंढिएगा


"चल चाँदनी रसोई में और खाना परोस" ... यह सोचते हुए चाँदनी खाना परोसने में लग गयी और तब तक बेटी ने आकर पीछे से माँ के गले लग गयी .... क्या बनाया आज" .... और फिर इधर उधर की बातें और खाना खाते हुए हंसी ठठा करते हुए धीरे धीरे सब अपने अपने मोबाइल में खो गए ...


  बच्चों के पिता ने रोज़मर्रा के सवाल करते हुए दोनों बच्चों के पढ़ाई और स्कूल का हाल जाना और फिर पत्नी को सम्भोधित करते हुए कहना लगे "मैंने अपनी बहनो से बात की थी आज की बच्चों को कहाँ और क्या पढ़ाया जाए तो सब बहनों ने यही कहा की हमने तो अपने बच्चों को ये कोर्स करवाया है और इस स्कूल में भर्ती करवाया है ...

तुम भी यही करवा लो भाई जी तो मैंने सोचा यही ठीक है" .... ये सुनते ही बेटे ने रोनी सी सूरत बना ली और चुप चाप से रसोई में चला गया ... सिर्फ माँ ही समझ सकी बेटे की नापसंद को .... ना दादी ना दादा ना पिता ... किसी को समझ में आया की वो क्यों उठ के चला गया.... "


 एक बार बेटे ने जिस स्कूल का ज़िक्र किया था उस स्कूल को भी देख लेते .. अच्छा स्कूल है वो और बेटे जिस सॉफ्टवेयर के कोर्स में दिचस्पी रखता है वो भी उसके लिए ठीक रहेगा "... चाँदनी ने ये बात कहते कहते पति के माथे पे पड़ती सिलवटें और आँखों का घूरना देख लिया था और सेहम भी गयी थी लेकिन माँ तो माँ होती ना ... बच्चों के भविष्य को कैसे नकार देती .... "अब मै अपनी बहनो की बात नहीं ताल सकता और


तुझे क्या पता है इसके भविष्य का ... वो स्कूल अच्छा है जहाँ बहिन के बच्चे पढ़े के अच्छे कॉलेज में भर्ती हो गए हैं... अब तो सोच लिया है मैंने ... एक दो दिन में जाकर फ़ीस जमा करवा दूँगा ... तुम चाय बना दो और फिर रात के खाने की तैयारी करो" ..

ये शब्द चाँदनी के लिए नए नहीं थे.... २० साल हो चुके थे उसको ये सब सुनते सुनते ....

ये रसोई वो गाय का दूध निकालना वो शेड की सफाई वो घास काट कर लाना गाय के लिए  और ...... जाने क्या क्या सुनती थी चाँदनी.....

आँखों में पानी की लकीर आ जाती थी शादी के शुरू के दिनों में ... लेकिन अब तो आँसू भी सूख चुके थे ....अब उसको अपनी औकात का मालूम था .... उसको सिर्फ सबकी मर्ज़ी में ही अपनी मर्ज़ी समझना था और सिर्फ हुक्म का पालन करना था"


इन्ही सब बातों को सोचते सोचते रात का खाना बनाकर चाँदनी थोड़ी देर टेलीविज़न के सामने जाके बैठ गयी .... शाम के ७:३० बजे थे

और यही वक़्त था जब वो थोड़ा अपने लिए सोच लेती थी ..... "कौन सी चलचित्र आ रही है बेटा "... बेटे के हाथ में रिमोट था ..... बेटे ने हिंदी पिक्चर का नाम बताते हुए कहा "मम्मी नाम सुना है इस पिक्चर का?" ... चाँदनी....जैसे वो कभी स्कूल गयी ही नहीं....

जैसे उसने ये दुनिया कभी देखी ही नहीं और वो तो अनपढ़ और गंवार ही रही ".... लेकिन आँखों में वो पानी की लकीर अब नहीं बनती थी..... बहुत साल से सब सूख चुका था आँखों में .....

रात के खाने के बीच ना कोई ख़ास बातचीत होती थी .... पति एक अच्छे बेटे की तरह अपने माँ बाप के साथ दिल खोल के सब बातें करते रहता था और उनके साथ सब बातें करते करते पता नहीं चलता था कब उनकी पत्नी वहां से उठ चुकी और सब बर्तन साफ़ करके अपने कमरे की ओर रूख कर चुकी थी ..... थोड़ी देर बाद पति भी शयन कक्ष में आ जाते हैं....कोई बातचीत नहीं ... बस अपने मोबाइल पर थोड़ा इधर उधर .....

और चाँदनी को पता ही नहीं चलता कब वो अपने पति के धर्म को निभा के कब नींद के आगोश में चली जाती है ..... सपनों की तो उसकी ज़िन्दगी में कोई जगह ही नहीं है ....क्योंकि सपने देखने का हक़ तो बहु को दिया यही नहीं कभी .....हक़ दिया तो सिर्फ एक " ये ससुराल में तुम्हें रोटी कपड़ा और अपने ऊपर खर्च करने के लिए जब जब पैसे मांगोगी तब तब मिल जाएँगे और माँ बाप की सेवा में कोई कमी नहीं रहनी चाहिए और शिकायत नहीं आनी चाहिए ....कभी मायके जाने की बात हो तो इजाज़त माँ बाप से लेनी है और अगर वो ना कहें तो ज़िद नहीं करनी है ... अब यही तुम्हारा घर है....

"ऐसे शब्द तो गाँव की हर एक औरत के ज़हन में दाल दी जाती है...


 

 


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