चालीस साल बाद
चालीस साल बाद
चालीस साल बाद
रीना और बाबा पुराने मित्र थे। वे प्राथमिक पाठशाला में साथ जाया करते थे और एक ही मोहल्ले में रहते थे, इसलिए उनके परिवारों में भी आत्मीय संबंध थे। शालांत परीक्षा तक रीना ने गर्ल्स स्कूल में पढ़ाई की, जबकि बाबा उसी मोहल्ले के स्कूल में रहा।
बारहवीं तक वे फिर साथ पढ़े, लेकिन विज्ञान स्नातक की पढ़ाई के लिए दोनों अलग-अलग शहरों में चले गए। बाद में स्नातकोत्तर शिक्षा के दौरान वे फिर एक ही संस्थान में मिले। पढ़ाई पूरी होने के बाद, करियर बनाने के लिए दोनों अलग दिशाओं में निकल पड़े और फिर कभी मिल नहीं पाए। इस दूरी का दुःख दोनों के मन में था, पर रीना ने इसे बहुत गहराई से महसूस किया।
भाग्यवश, चालीस साल बाद एक मित्र पुनर्मिलन कार्यक्रम में वे आमने-सामने आए। रीना भीतर से बहुत दुखी थी, लेकिन बाबा ने उसे समझाने और उसकी गलतफहमी दूर करने का प्रयास किया। धीरे-धीरे उनके बीच की दूरी पिघलने लगी और बातचीत सामान्य हो गई।
अगले दिन, जब वे कुछ पुराने मित्रों के साथ चाय-नाश्ते पर मिले, तो रीना और बाबा की गलतफहमी पूरी तरह दूर हो गई। वर्षों की दूरी के बाद उनकी मित्रता फिर से जीवंत हो उठी। दूसरे दिन जब वे चाय नाश्ते पर कुछ पुराने मित्रों के साथ मिलते है । उनकी गलतफॅमि कैसे दूर होती हैं?
रीना: तुझे ये रिश्ता कैसे आया था? बाबा: अरे रीना, मत पूछो। इसके लिए उसे सोलह सोमवार का "शोले वाला" व्रत करना पड़ा था। सब हँसने लगे। सहेली: अरे बाबा, मजाक मत करो। आज हम सच जानकर ही रहेंगे। बाबा: ठीक है, सुनो उसकी दर्द भरी दास्तान।
वह छुट्टियों में भोपाल से गाँव आया था। पिताजी की तबीयत खराब थी—हार्ट की समस्या हो गई थी। अचानक पलंग से गिर पड़े थे, डॉक्टर को तुरंत बुलाया गया और सही समय पर इलाज हुआ, तभी बच पाए। डॉक्टर ने कहा था कि किसी बड़े हार्ट स्पेशलिस्ट को दिखाना पड़ेगा। इलाज चल रहा था, लेकिन पिताजी चिंतित थे। उन्होंने उससे कहा, "सबकी शादी हो चुकी है, बस तेरी रह गई है। तू भी कर लेता तो अच्छा होता।"
उसने समझा कि पिताजी चाहते हैं कि उनकी मौजूदगी में ही उसकी शादी हो जाए। लेकिन उसकी इच्छा उस समय बिल्कुल नहीं थी। उसने भोपाल लौटने का टिकट भी कर लिया था। तभी एक मौसेरा भाई रिश्ता लेकर स्टेशन पर लड्की के बाप के साथ मिलने आया था। उसने प्रस्ताव को सुना था। और कहा, कल शाम को वह भोपल लौट रहा हुं । फिर उसने और लडकी के पिताजी ने कहा था। आप कल दोपहर लड्की देख लो। वह मौसेरे भाई को मना नहीं कर सका था। दुसरे दिन वह ,उसका बडा भाई, और बाला लडकी देखने गये थे। लडकी देखने के बाद,उसने बाला से मजाक किया, कैसी लगी तुझे लड्की।
बाला : अरे तुझे सही में शादी करनी है क्या? करनी होगी। तो लडकी अच्छी है। मना करने लायक नहीं है। फिर भोपाल चला गया था। लेकिन पिताजी के खत आते रहते थे। अरे परदेश में रहता है। बाहर का खाना अच्छा नहीं रहता। लडकी पसंद हो तो बात पक्की कर लेते है। नाजुक परिस्थिती को देखते हुयें उसे आखीर में हां करना पडा था। इस बदमाश दोस्त ने उसे शहीद कर दिया था।
सहेली: अरे बाला, तु तेरे बारे में बता। उसकी कहानी सुनकर क्या करेंगे! वो किसी तरह बात को टालना चाहता था। उसकी मदत करने के लिये बाबाने मजाक किया था। धनुष्य बाण से तीर तो कभी का निकाल चुका है।अरे बाबा ये तु कैसी बात कर रहा है। बाबा :अरे ये क्या बतायेगां। इसने तो भाभी को फिल्मी स्टाईल में पटायां है। सीधी सरल भाभी इसके चकर में फस गई थी। ये उसका दोस्त बहुंत बदमाश है। खुदने मस्त हेड मास्टर्नी को पटा लिया था। अरे उसे लुटा दिया है। तब तक हम सभी का नाश्ता हो चुका था।
रीना के अन्य सहेलीयों को कुछ परिचीत परिवारों से मिलना था। उन्हे बाला छोडने गया था। बाबा और रीना वही रुके थे। शायद हम दोनों इसी बात का इंतजार कर रहे थे। रीनी: अरे बाबा , आना इधर आराम से बैठ के टाईम पास करते है। अच्छा हुआ, इस बहाने हम सभी कि एक दुसरे से फिर मुलाखात हुंई है। एक दुसरे के परिवार से मुलाखात हुई है। कुछ भ्रम भी टुटे। शायद बाबा की कहानी सुनकर उसका गुस्सा थंडा हुआ था। लेकिन उसे बाबा की कहानी आधी अधूरी लग रही थी। वह मन और दिममाग से कुछ सोच रही थी। उसका मन कुछ और कह रहा था। दिमाग कुछ और सोच रहा था। उसकी यह हालत देखकर, बाबा फिर बोला था। बाबा : अरे रीना तुम कैसी हो? अपने बारे में कुछ खास बताव।
रीनी: ऐसा कुछ खास तो नहीं है। तेरे जैसे उसने भी शादी कर ली थी। दो बच्चे है। दोनो की शादीयां हो चुकी है।बाते चल रहा थी। एक –दुसरे को देखते रहे। दोनो एक-दुसरे से यह उम्मीद कर रहे थे कि पुरानी बातों को कोई तो छेडेगा !
रीना : अचानक बोली । उसे उसके ,न जाने बातों पर यकीन नहीं, हो रहा है। वह कुछ उससे छुपा रहा है । उसे ऐसा क्यूँ लग रहा है। उसकी दिल को छू लेनी वाली सच्चाईने ,बाबा को सच बताने को लाचार कर दिया था। फिर उसने सच बताने शुरू किया था। वह बोला कि अंतिम परीक्षा के बाद हम दोनों एक-दूसरे से मिल नहीं सके थे। हम दोनों जॉब ढूढने में व्यस्त हो गए थे। उसे परीक्षा के कुछ महीने बाद जॉब मिला था। वह नौकरी करने भोपाल चला गया था। अकेला था। अकेला पण सता रहा था। जहां वह रह रहा था। वही एक महाराष्ट्रीयन परिवार रह रहा था। परिवार का मुखिया सेवानिवृत्त हो चुका था। ईमानदार होने के कारण वह सेवा काल में अपना खुदका मकान नहीं बना सका था। इसलिए किराएं के मकान में रहा करता था। परिवार में कुल छ सदस्य थे। लेकिन बड़ा लड़का अपघात में मारा गया था। परिवार दुखी था। उस परिवार में एक बड़ा भाई और तीन बहने थी। किसी कारण उनकी शादियाँ नहीं हुई थी। परिवार में सबसे सुंदर छोटी लड़की उम्र में उससे बड़ी थी। उसकी और उनकी भाषा एक होने के कारण उनके बिच में मधुर रिश्ता बन चुका था। सयोग से उनकी माऊसी नागपुर की थी। इसलिए अच्छी जान पहचान हो चुकी थी। वे अकसर उसे किसी त्योहार पर खाना खाने बुलाते थे। छोटी लड़की कुछ उसके साथ जादाही मिलनसार थी। पूरे परिवार के साथ उसकी अच्छी जम रही थी। उसे भी उस परिवार से लगाव हो चुका था क्यूंकि वह भी अपने दोस्त यारों और परिवार से अलग हो चुका था। फिर भी वह कभी किसी मित्र को खत जरूर लिखता था। एक दिन वह बहूँत रोमांचीत मूड में था। तब उसने अपने मित्र को खत लिखा था। उसने उस पत्र में शहर और अपने नयें मित्रों का वर्णन किया था। उस पत्र में उन तीन लड़कीयों के कुछ रोमांटिक बातें युही दिल और मजाक के त्योर पर लिखी थी। और वह सबकुछ भूल चुका था। लेकिन उस मित्र ने उस बात का बतंगड़ बना दिया था। बाला को वह पत्र भी दिखायां था। उसने भी उस पत्र में ऐसा कुछ भी नहीं पढ़ा था। और उस दोस्त ने पुरे मोहल्ले में आग लगा दी थी कि बाबा भोपाल के लड़की से शादी करनेवाला है। यह बात परिवार तक पहुँच चुकी थी। पिताजी और परिवारवाले परेशान होने लगे थे। इंतज़ार करते-करते बाला पहुँच चुका था। रीना हमारे साथ वर्धा तक आने वाली थी। हम सबने अपना-अपना सामान गाड़ी की डिक्की में रख दिया।
बाबा: अरे बाला, तू रीना के साथ बैठ जा। मैं ज़रा ड्राइवर के पास बैठता हूँ। अभी तक मैंने उसे बोर किया है, अब तेरी बारी है।
रीना: अरे बाबा, सुन रहे हो कि नहीं?
बाबा: अरे मैडम, सुन भी रहा हूँ और चोरी-छुपे देख भी रहा हूँ।
रीना: ये नया क्या शुरू कर दिया है? "मैडम, मैडम"… मेरा नाम भूल गए क्या? क्यों, "रीना" नहीं कह सकते? अगर बात करनी है तो सीधे नाम लेकर करो।
बाबा: जी मैडम… अब से सिर्फ कहूँगा, "मैडम रीना, ज़रा सुनो।"
रीना: लगता है, तुम ऐसे नहीं सुधरोगे।
बाबा: कितने सालों बाद मिले हैं। समय के साथ सब बदल जाता है। विचार भी बदल जाते हैं। लेकिन यादें वही रहती हैं। आज हमारा व्हाट्सऐप ग्रुप बने महीनों हो गए, पर तुमने कभी कोई टिप्पणी नहीं की, न चैटिंग की, न फोन किया।
रीना: ये सब तुम भी कर सकते थे। हर पहल हमेशा लड़की ही क्यों करे? उसका कोई कर्तव्य नहीं होता क्या?
बाबा: सही कह रही हो। अगर मैं सक्षम होता तो बाला जैसी भाभी पटाने की कोशिश करता। सब हँस पड़े।
बाला: अबे, तू मुझे आज पूरा नंगा करके छोड़ेगा। तुझे किसने रोका था पहल करने से? लड़कियाँ तो तुझसे ही इश्क लड़ाती थीं।
रीना : बाला तु सही बात कह रहा है। कोई लडकी क्या हमेशा खुद ही पहल करेगी। अरे तुझे कोई पसंद करता। इसका मतलब कि उसे अपना आत्मसम्मान नहीं है क्या?
बाबा : आप सही फर्मा रही है। मॉडम, सॉरी, रीना, उसी का तो खामियाजाना भुगत रहा हुं कि इस हसीन जींदगी में किसे से प्यार नहीं कर सका। ना किसी के कोई भावनायें को समझ सका, ना किसी से अपनी भावनायें बांट सका। अभी तो इश्क का समय निकल चुका है ना, रीन!
रीना : अरे ये सवाल तु उससे क्यों पुछ रहा है? उसका मानना है कि किसी से प्यार करने के लिए ना कोई उम्र का बंधन होता है, ना समय की समय सीमा। अगर, कोई हमसे प्यार करे,या ना करे, या हमसे कोई रिश्ता बने या ना बने,हम जीसे चाहते है। उससे प्यार करते रहे। एक दिन आयेंगा। हम जीससे प्यार करते है। उसे एक दिन इस बात का एहसास हो जायेगा! जीस दिन ये एहसास हो जायेगा, उस दिन प्यार जीत जायेंगा! इसलिए जीससे प्यार करते हो , करते रहो। इस तरह चालीस साल बाद दोनों के बिच में की बर्फ पिघली थी।
